Spirit of a Fighter – Chapter 223
रोने की आवाज़। बहुत धीमी। दबी हुई। ऐसी जैसे कोई रो रहा हो और मुँह पर तकिया रख लिया हो ताकि कोई सुन न ले।
वीर रुक गया।
उसने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। गली सूनी थी, बस दूर एक कुत्ता भौंक रहा था। पर आवाज़ साफ़ थी — अखाड़े की उस ऊँची मिट्टी की दीवार के उस पार से।
दीवार के उस पार शहर से आए उस पुराने मकान का पिछला हिस्सा था, जहाँ रणवीर सिंह और मीरा ठहरे थे। वीर को पता था — उसने एक बार मीरा को उस खिड़की से देखा था, जब वो सुबह-सुबह पत्तों को पानी दे रही थी।
वो दीवार के पास गया।
दीवार लाल मिट्टी से लिपी थी, और उसमें एक जगह ईंट टूटी हुई थी — छोटा-सा छेद, जिससे अंदर की रोशनी की एक पतली लकीर बाहर आ रही थी।
वीर ने अपना हाथ दीवार पर रखा। मिट्टी गरम थी — दिन की धूप अभी उतरी नहीं थी।
और सिसकियाँ चल रही थीं। बीच-बीच में रुकतीं, फिर फिर शुरू होतीं। जैसे कोई रो-रोकर थक गया हो, पर रुक न पा रहा हो।
वीर की साँस रुक गई।
वो कुछ बोल नहीं पाया। उसका गला सूख गया। उसने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली। उसकी उँगलियाँ दीवार पर फैल गईं, जैसे वो पत्थर को चीरकर अंदर पहुँचना चाहती हों।
वो जानता था ये आवाज़ किसकी है।
और वो ये भी जानता था कि वो अंदर क्यों रो रही है।
भैरव अभी-अभी उससे मिलकर गया था। वीर ने उसे गली के मोड़ पर जाते देखा था — लाल धोती, तेज़ कदम, और चलते-चलते अपनी मूँछों पर हाथ फेरना। उसके हाथ में कुछ नहीं था, पर उसके चेहरे पर वो संतोष था जो किसी को तोड़कर आता है।
वीर की मुट्ठी भर गई।
वो दीवार से सट गया। उसका माथा ठंडी मिट्टी को छू गया।
"मीरा," उसने धीरे से कहा। इतना धीरे कि उसे खुद अपनी आवाज़ सुनने के लिए रुकना पड़ा।
अंदर, सिसकियाँ एकदम बंद हो गईं।
ऐसे जैसे किसी ने मुँह पर हाथ रख लिया हो। जैसे किसी ने साँस तक रोक ली हो।
वीर जम गया।
उसने सुना — अंदर किसी के उठने की आहट। फर्श पर पैरों की धीमी आवाज़। फिर रुक गई। फिर फिर आई — धीमी, सँभलती हुई, जैसे कोई रोते-रोते खुद को सँभाल रहा हो।
खिड़की की तरफ़ पर्दा हिला।
वीर ने पीछे हटने की कोशिश की, पर उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।
पर्दे के उस पार से एक आवाज़ आई — धीमी, टूटी, पर पहचानी हुई।
"कौन है?"
वीर ने होंठ भींचे। कुछ नहीं बोला। अगर बोलता, तो उसकी आवाज़ भी टूट जाती, और वो नहीं चाहता था कि मीरा उसे ऐसे सुने।
पर मीरा ने उसकी चुप्पी पहचान ली।
"वीर?"
वीर ने आँखें बंद कर लीं। दीवार की मिट्टी उसके माथे पर लग गई थी।
"हाँ," उसने कहा।
पर्दा पूरा हट गया। खिड़की की जंगले के पीछे मीरा का चेहरा दिखा — आँखें लाल, नाक लाल, बाल बिखरे हुए, और गाल पर सूखे आँसुओं की लकीरें। उसने साड़ी का पल्लू ठीक करने की कोशिश की, पर हाथ काँप रहे थे।
दोनों एक पल चुप रहे।
फिर मीरा ने कहा, "तू यहाँ क्यों खड़ा है?"
उसकी आवाज़ में गुस्सा था — पर वो गुस्सा नहीं था। वो शर्म थी। कोई उसे रोते हुए देख ले, यही उसकी सबसे बड़ी हार थी।
"मैं गुज़र रहा था," वीर ने कहा। उसकी आवाज़ भारी थी। "माँ से मिलकर आ रहा हूँ।"
"तो गुज़र जा।"
वीर नहीं हिला।
मीरा ने खिड़की का जंगला पकड़ लिया। "वीर, मैं ठीक हूँ। जा।"
"तू ठीक नहीं है।"
"मैं ठीक हूँ!" उसकी आवाज़ ऊँची हो गई, फिर अचानक फुसफुसाहट में बदल गई, क्योंकि अंदर से पापा की खाँसी आई। "मेरे पापा सो रहे हैं। चिल्लाऊँगी तो वो उठ जाएँगे।"
वीर ने दीवार पर हाथ टिकाया और खिड़की के जंगले के पास आ गया। अब दोनों के बीच सिर्फ़ लोहे की छड़ें थीं।
"भैरव आया था," वीर ने कहा। यह सवाल नहीं था।
मीरा ने नज़रें नीची कर लीं। "दवा लाया था।"
"कौन-सी दवा?"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। बस बोतल की तरफ़ देखा जो अंदर मेज़ पर रखी थी, और उसकी नज़र वहीं अटक गई।
और वीर को सब समझ आ गया।
"तूने उसे अंदर रख लिया?"
"वो दवा है, वीर।" मीरा की आवाज़ टूटी, पर उसमें ज़िद थी। "पापा की दवा। अगर मैं इसे फेंक दूँ, तो कल पापा को दर्द में तड़पते देखूँगी। तू जानता है वो कैसे तड़पते हैं? रात को जब उनके पैर में ऐंठन उठती है, तो वो चीख नहीं सकते, बस होंठ काटते हैं। और मैं…" उसकी आवाज़ रुक गई। "मैं कुछ नहीं कर पाती।"
वीर ने जंगला पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
"मीरा, वो दवा नहीं है।"
"तुझे कैसे पता?"
"मैंने उसकी गंध सूँघी है।" वीर ने अपनी आवाज़ धीमी रखी, पर हर शब्द साफ़ था। "मैंने उसे भैरव के कमरे में बनते देखा है। मैंने उस बोतल के काँच की गंध पहचानी है — वो पीली है, मीरा। उसका रंग पीला पड़ गया है, क्योंकि उसमें जो है वो सालों से सड़ रहा है।"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे — अब कुछ और था। डर।
"तो मैं क्या करूँ?" उसने पूछा। "फेंक दूँ? और पापा को क्या दूँ? मेरे पास कुछ नहीं है।"
वीर ने एक पल सोचा।
"तू उसे मत फेंक।" उसने कहा। "उसे रख ले। पर पापा को मत दे।"
"तो—"
"सुबह मैं आऊँगा।" वीर ने कहा। "तू बोतल से थोड़ा-सा पानी एक कटोरी में निकालकर रख ले। मैं उसे सूँघकर बताऊँगा कि उसमें क्या है। और तू उसे अपने लैब की शीशी में भरकर रख ले — सबूत के तौर पर।"
"और पापा?"
"पापा को आज रात कुछ मत दे।" वीर की आवाज़ नरम हो गई। "एक रात रुक जा। मैं तुझसे कह रहा हूँ।"
मीरा ने एक लंबी साँस ली। उसकी नज़र वीर के हाथ पर गई — दीवार की मिट्टी से भरे हाथ, जिन पर पुराने छाले थे, और कलाई पर गुड़िया का बाँधा हुआ लाल धागा।
"तू कहाँ जा रहा है अभी?" उसने पूछा। "इस वक़्त? इस हाल में?"
वीर ने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने उसका चेहरा पढ़ा — और उसका चेहरा ऐसा था जैसे कोई लड़का घर से चोरी-छिपे कहीं जा रहा हो, हमेशा के लिए नहीं, पर बहुत देर के लिए।
"तू कुएँ जा रहा है," मीरा ने कहा। यह सवाल नहीं था।
"मीरा—"
"तू कुएँ जा रहा है, वीर।" उसकी आवाज़ में अब पहले वाला गुस्सा लौट आया। "अकेला। रात में। उस आदमी के अखाड़े में। जिसने अभी-अभी मुझे बताया कि तेरे पास तीन दिन हैं।"
"मैं अकेला नहीं हूँ।" वीर ने कहा। "कालू काका हैं।"
"कालू काका!" मीरा ने अपना माथा जंगले से टिका दिया। "बूढ़ा आदमी है। भैरव के सामने क्या करेगा?"
वीर ने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।
"तू मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता," उसने धीरे से कहा। "तू मुझे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकता, कि मैं यहाँ बैठी रहूँ और सोचूँ कि तू ज़िंदा है या नहीं।"
वीर का गला सूख गया।
"मैं लौटूँगा," उसने कहा।
"ऐसे मत बोल।" मीरा ने कहा। "हर आदमी जो जाता है, यही बोलता है।"
वीर ने उसकी तरफ़ देखा। मीरा की आँखों में वो आँसू अभी भी थे जो सूख नहीं पाए थे, और उसकी साँस अभी भी वैसी ही थी जैसे कोई रो-रोकर थका हुआ हो। और उसके हाथ — वो हाथ जिनमें औषधियों की गंध थी, अब जंगले को इतनी ज़ोर से पकड़े हुए थे कि पोर सफ़ेद हो गई थीं।
वीर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
जंगले की छड़ों के बीच से, उसने अपनी छोटी उँगली बढ़ाई।
मीरा ने उसे देखा। कुछ समझी नहीं।
"ये क्या है?" उसने पूछा।
"मेरी छोटी उँगली," वीर ने कहा। "इसे पकड़ ले।"
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