Spirit of a Fighter218 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 218

7 min read November 5, 2026

हमने उसे उठाया। उसका शरीर हल्का था — हैरान करने वाला हल्का, जैसे बीस साल का डर होने के बावजूद उसमें अपना कोई वज़न नहीं था।

रास्ते में टिंकू ने धीरे से मुझसे कहा, "वीर, तूने उसे अपने घर बुलाया। माँ क्या कहेगी?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "माँ वही कहेगी जो हमेशा कहती है।"

"क्या?"

"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।" मैंने हरनाम के बोझ को अपने कंधे पर ठीक से रखा। "वो इसे खाना खिलाएगी। और फिर जो होगा, देखा जाएगा।"

टिंकू कुछ देर चुप चला। फिर बोला, "और उसका नाम? जो 'ब' से शुरू होता है?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर मुझे एक तरीका सूझ रहा है।"

"क्या?"

"अगर भैरव का बाप पहलवान था," मैंने कहा, "तो उसका नाम कहीं न कहीं दर्ज होगा। अखाड़े के पुराने काग़ज़ों में। पंचायत के रिकॉर्ड में। बीस साल पहले की किसी कुश्ती की सूची में।"

मीरा ने पीछे से कहा, "मेरे पापा के कमरे में पुरानी तस्वीरें हैं। बीस साल से ज़्यादा पुरानी। और एक चीज़ है…" वो रुकी। "एक पुरानी डायरी। जो उन्होंने कभी मुझे नहीं दिखाई। पर मैंने देखी है। उनकी अलमारी में, सबसे नीचे।"

मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। "तूने कभी खोली नहीं?"

"डरी," उसने सीधा कहा। "पापा की चीज़ें… उनकी मर्ज़ी के बिना। पर अब…" उसने हरनाम की तरफ़ देखा जो मेरे कंधे पर बेहोश था। "अब डरने का वक़्त नहीं है।"

अस्पताल के गेट पर पहुँचकर हमने हरनाम को स्ट्रेचर पर लिटाया। डॉक्टर आए, देखा, और सीधे अंदर ले गए।

मैं बाहर बेंच पर बैठ गया। मेरे हाथ में हरनाम की कॉपी थी — मैंने उसे मिट्टी से उठाया था, पन्नों को सहेजा था। जले हुए आख़िरी पन्ने को मैंने जेब में रख लिया।

टिंकू मेरे बगल में बैठा। उसने अपनी डिब्बी खोली, और हम दोनों ने चुपचाप खीर खाई — बिना बात किए, बिना हँसी के।

मीरा अस्पताल के गलियारे में खड़ी थी, खिड़की से बाहर देख रही थी। सूरज ढल रहा था। उसकी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसके छोटे बालों में सुनहरी लकीरें बन रही थीं।

मैंने उसकी तरफ़ देखा, और सोचा — कल से पहले, आज रात, मुझे रणवीर सिंह से मिलना है। उनकी वो डायरी देखनी है। वो नाम ढूँढना है।

और भैरव को यह दिखाना है कि उसका बदला, उसका ज़हर, उसका बीस साल का डर… वो सब मिट्टी में मिल जाएगा, जिस मिट्टी से वो खुद डरता है।

तभी अस्पताल के दरवाज़े से एक परिचित आवाज़ आई।

"वीर सिंह?"

मैंने पलटकर देखा।

फाटक पर सुक्खी बुआ खड़ी थीं, हाँफते हुए, पान का बीड़ा हाथ में दबाए, और उनके पीछे गाँव के पाँच-सात लोग थे।

"अरे मैंने तो सुना है," वो बोलीं, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी चुगलखोर लय नहीं थी — कुछ और था, गहरा, "कि भैरव ने हरनाम को ज़हर दे दिया। और मैं ये भी सुनकर आई हूँ कि तूने उसे अपने घर बुलाया है।" उन्होंने पान का बीड़ा चबाया, और फिर धीरे से कहा, "जो तूने किया, वो गाँव में किसी ने नहीं किया। हम सब डरते रहे। तू नहीं डरा।"

मैंने देखा कि उनकी आँखों में पानी था — सुक्खी बुआ की आँखों में, जो हमेशा हँसती थीं।

"बुआ," मैंने कहा, "मुझे एक चीज़ चाहिए।"

"क्या?"

"बीस साल पहले की सबसे बड़ी कुश्ती कौन-सी थी? रणवीर सिंह और किसी पहलवान के बीच? जिसमें रणवीर जीते थे?"

सुक्खी बुआ रुक गईं। उन्होंने पान का बीड़ा मुँह के एक कोने से दूसरे कोने में किया, और फिर बोलीं, "वो कुश्ती तो सबको याद है। पर उसका नाम कोई नहीं लेता। क्योंकि उस दिन के बाद वो पहलवान का बेटा गाँव से चला गया था। और फिर लौटा… किसी और नाम से।"

"नाम क्या था?" मैंने पूछा।

सुक्खी बुआ ने चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई सुन न रहा हो, और फिर झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाईं, "बलवंत। उस पहलवान का नाम बलवंत सिंह था। और उसका बेटा… उसका बेटा बलराज था। पर आज उसे सब भैरव कहते हैं।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

ब। बलराज।

मैंने जेब से जला हुआ पन्ना निकाला और उस पर देखा — वो अकेला अक्षर, 'ब', जो अब पूरा हो गया था।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "मिल गया?"

"मिल गया," मैंने कहा। "भैरव का असली नाम बलराज है। और उसका बाप बलवंत सिंह था — जिसे रणवीर सिंह ने बीस साल पहले उसी मिट्टी में हराया था।"

मीरा ने अस्पताल की खिड़की से मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने कभी नहीं देखा — गुस्सा और दुख एक साथ, जैसे दो आँधियाँ एक ही दिशा में चल रही हों।

"तो ये सब…" उसने धीरे से कहा, "ये सब मेरे पापा का बदला है? मेरे पापा ने उसके बाप को हराया, और उसने बीस साल तक मेरे पापा को मारने की तैयारी की?"

"नहीं," मैंने कहा, और मैंने उसकी तरफ़ देखा। "ये बदला नहीं है। ये डर है। भैरव — बलराज — डरता है कि कहीं उसके साथ वही न हो जो उसके बाप के साथ हुआ। वो डर को ज़हर में बदल रहा है। और आज वो डर उसके हाथ से निकल रहा है।"

सुक्खी बुआ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "बेटा, एक बात कहूँ?"

"कहो, बुआ।"

"वो जो तेरे पापा रघुवीर थे… मैंने उन्हें एक बार कहते सुना था, बाज़ार में। कोई पूछ रहा था — भैरव कौन है? और वो बोले थे — 'वो मेरे दोस्त का बेटा है। उसका बाप मेरे दोस्त था। और मैंने उसे हराया था, पर मैंने उसे कभी नीचा नहीं दिखाया। उसका बेटा मुझसे नफ़रत करता है, पर मैं उससे नहीं।'"

मेरे हाथ ढीले पड़ गए।

मेरे पापा — रघुवीर — जानते थे। वो जानते थे कि भैरव कौन है। और वो उसे दोस्त का बेटा कहते थे। और भैरव ने उन्हें कुएँ में गिरा दिया।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर?"

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "बस… अब मुझे उस डायरी की ज़रूरत है। रणवीर सिंह की डायरी। क्योंकि जो नाम सुक्खी बुआ ने बताया, वो मुझे पंचायत के रिकॉर्ड में भी मिलना चाहिए। अगर मिल गया, तो तीन दिन बाद मैदान में भैरव के सामने सिर्फ़ मैं नहीं खड़ा होऊँगा। उसका अपना नाम भी खड़ा होगा। और उसका बाप। और बीस साल का सच।"

मीरा अस्पताल के दरवाज़े से बाहर आई, और मेरे सामने खड़ी हो गई।

"आज रात," उसने कहा, "मैं अपने पापा की डायरी लेकर नहर के मोड़ पर आऊँगी। तू वहाँ आ।"

"अगर तेरे पापा को पता चला?"

"उन्हें पता चलना चाहिए," उसने कहा। "बीस साल से वो चुप हैं। अब बोलने का वक़्त है।"

वो मुड़ी और चली गई। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, और मैं उसे देखता रह गया।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोला, "आज रात? नहर के मोड़ पर? वीर, तू जानता है ये क्या मतलब है?"

"क्या?"

"इसका मतलब है कि अब ये सिर्फ़ तेरी लड़ाई नहीं है।" उसने अपनी टोपी ठीक की। "अब इसमें मीरा भी है। और उसके पापा। और माँ। और गुड़िया। और…" उसने अपनी डिब्बी उठाई, जो अब खाली थी, "और मैं भी।"

मैं मुस्कुराया — पहली बार उस दिन में, सच में मुस्कुराया।

"तो फिर," मैंने कहा, "आज रात को कोई अकेला नहीं जाएगा।"

पर जैसे ही मैंने ये कहा, अस्पताल के गेट पर एक ऑटो रुका, और उसमें से रणवीर सिंह उतराए — व्हीलचेयर पर, पर खुद उतराए, दो लोगों के सहारे। उनकी आँखें लाल थीं, और उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी — वही डायरी, जिसकी बात मीरा ने की थी।

उन्होंने मुझे देखा।

और उन्होंने कहा, "वीर सिंह, अंदर चल। मुझे तुझसे कुछ बताना है। और ये डायरी… ये तेरे पापा की है, मेरी नहीं।"

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