Spirit of a Fighter – Chapter 219
रणवीर सिंह की आवाज़ में वो बात थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी — न गुस्सा, न हुक्म। बस थकान, जैसे बीस साल से कोई बोझ उठाए खड़ा हो और अब उसे रखने की जगह मिल गई हो।
मैं उनके पीछे-पीछे अस्पताल के अंदर चला। टिंकू बाहर रुका, हाथ में खाली डिब्बी। मीरा मेरे साथ थी — उसकी आँखें डबडबाई थीं, पर कदम पक्के थे।
अस्पताल का वो कमरा छोटा था। एक पलंग, एक स्टूल, और दीवार पर लगा पुराना पंखा जो अपनी ही गति से घूम रहा था। रणवीर सिंह ने दो लोगों के सहारे पलंग पर बैठते हुए डायरी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
मेरे हाथ काँपे। जब मैंने उसे छुआ, तो लगा जैसे किसी की साँस छू रहा हूँ।
"ये…" मेरी आवाज़ रुक गई।
"तेरे पापा ने मुझे दी थी," रणवीर सिंह ने कहा। "आखिरी रात से पहले वाली रात। कहा था — रणवीर, अगर मैं लौटूँ न लौटूँ, तो ये डायरी मेरे बेटे को देना। पर तभी देना जब वो खुद मिट्टी में उतरने लायक हो जाए।"
मैंने डायरी खोली। पन्ने पीले थे, कोने मुड़े हुए। पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन थी, मेरे पापा की लिखाई में —
"मिट्टी का हिसाब सबसे ऊपर रखता हूँ। बाकी भगवान जाने।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
"पढ़," रणवीर सिंह ने धीरे से कहा। "पढ़, वीर। अब वक़्त है।"
मैंने पन्ने पलटे। पापा की लिखाई घसीट में थी, कहीं जल्दी में लिखी हुई। कहीं दाग थे — पसीने के, या आँसू के, पता नहीं।
पन्ने पर लिखा था — "भैरव आज फिर कुएँ की तरफ़ गया। मैंने पूछा तो बोला बर्तन धोने। पर हाथ में बोतल क्यों थी, बर्तन नहीं?"
फिर अगला पन्ना — "बलवंत का बेटा है। बलवंत मेरे जैसा पहलवान था। मैंने उसे हराया था, पर मैंने कभी उसका अपमान नहीं किया। उसके बेटे को मैंने अपने अखाड़े में जगह दी। आज उसके हाथ में जो बोतल है, उससे डर लग रहा है।"
अगला पन्ना — "जगदीश से कहा था कि भैरव पर नज़र रखे। जगदीश हँसा और बोला — तू ज़्यादा सोचता है रघुवीर। दो दिन बाद जगदीश ने दूसरा गिलास पिया। और फिर तीसरा। और फिर वो मेरे सामने गिरा और उठ नहीं पाया। भैरव ने गिलास खुद दिया था। मैंने देखा। मैंने देखा और कुछ नहीं किया।"
मैंने डायरी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"आगे पढ़," रणवीर सिंह ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "पहले आप बताइए। मेरे पापा को कुएँ में किसने गिराया?"
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ काँपे।
"मैंने देखा," उन्होंने कहा। "मैं उस रात अखाड़े में था। मैंने देखा कि भैरव कुएँ की तरफ़ जा रहा है और तेरे पापा उसके पीछे। मैं दौड़ा, पर मेरे पैर…" उन्होंने अपनी टाँगों की तरफ़ देखा, "मेरे पैर उस वक़्त से पहले ही सून्न हो चुके थे। मैं गिरा। और जब तक मैं उठा, कुएँ से आवाज़ आई। एक आवाज़, और फिर बस पानी की आवाज़।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"मैं उस रात से ज़िंदा नहीं हूँ, वीर। मैं बस साँस ले रहा हूँ।"
मीरा ने अपने पापा का हाथ पकड़ लिया। कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रह गई।
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर मैंने डायरी खोली और आखिरी पन्ने तक गया। वहाँ लिखा था — "अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा। क्योंकि पानी पीने वाला एक मरता है। मिट्टी में डाला ज़हर उस मिट्टी को ज़हरीली कर देता है जिस पर सब खड़े हैं। और जिस दिन वो मिट्टी ज़हरीली हो जाएगी, उस दिन अखाड़ा खुद अपना हिसाब माँगेगा।"
मैंने डायरी सीने से लगा ली।
"मैं इसे पंचायत के सामने रखूँगा," मैंने कहा। "तीन दिन बाद, मैदान में।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। "पहले मेरी एक बात सुन। भैरव ने तुझे जो कहा — कि तेरी माँ के शरीर में अभी भी ज़हर है — वो झूठ नहीं है।"
मेरा दिल धक से रह गया।
"क्या?"
"तेरी माँ को जो धतूरा दिया गया था, उसका असर पूरा नहीं उतरा। मीरा ने दवा दी, पर वो सिर्फ़ ऊपर का असर है। अंदर की जड़ तक दवा नहीं पहुँची।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर नीचा कर लिया।
"तू जानती थी?" मैंने पूछा।
"आज सुबह पता चला," उसने धीरे से कहा। "मैं तुझे डराना नहीं चाहती थी।"
"डराना?" मेरी आवाज़ ऊपर उठ गई। "मीरा, ये मेरी माँ है।"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा, और उसकी आँखें भर आईं। "मैं जानती हूँ, वीर। इसीलिए मैं आज सुबह से तेरे घर के बाहर खड़ी थी। मुझे तुझे बताना था, पर भैरव ने सबको इकट्ठा कर लिया था, और मैं…"
वो रुक गई।
"माफ़ कर," मैंने कहा। मेरा गुस्सा उतर गया। "मुझे नहीं कहना चाहिए था।"
"तूने सही कहा," उसने कहा। "मुझे शुरू में ही बताना चाहिए था।"
रणवीर सिंह ने खाँसा। "बच्चो, बाद में लड़ना। पहले सुनो। भैरव के पास जो दवा है, वो असल में दवा नहीं है। वो उसी ज़हर की आखिरी खुराक है। अगर तेरी माँ ने वो पी ली, तो वो…" वो रुक गए।
"तो वो क्या?" मैंने पूछा।
"तो वो चली जाएगी," रणवीर सिंह ने कहा। "और अगर उसने नहीं पी, तो भी ज़हर अंदर से उसे खा रहा है। तीसरा रास्ता है — तहखाने की मिट्टी। जो शरीर से ज़हर खींचती है। पर उसके लिए तुझे तहखाने तक पहुँचना होगा, और भैरव ने अबकी बार सच में उसे सील कर दिया है।"
मैं खड़ा हो गया।
"तो मैं तहखाने जाऊँगा।"
"पहले मेरी बात सुन," रणवीर सिंह ने कहा। "भैरव ने तीन दिन का वक़्त दिया है। पर वो तीन दिन तेरे लिए नहीं, अपने लिए चाहता है। वो तीन दिन में तेरी माँ को खत्म करेगा, तेरी लड़की को डराएगा, और तहखाने की मिट्टी अपने पास रख लेगा। तेरे पास तीन दिन नहीं हैं। तेरे पास आज की रात है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"आज की रात," मैंने कहा।
"आज की रात," उसने दोहराया।
मैं अस्पताल से बाहर निकला तो सुबह की धूप आँखों में लगी। टिंकू बाहर बेंच पर बैठा था, डिब्बी उसके पास रखी थी, और वो उसमें झाँक रहा था — जैसे उम्मीद कर रहा हो कि कोई मिठाई बच गई हो।
"कुछ नहीं बचा," मैंने कहा।
"पता है," उसने कहा, और डिब्बी बंद कर दी। "पर देखने में कोई हर्ज तो नहीं।"
मैं हँसा नहीं। पर मेरे अंदर कहीं एक छोटी-सी जगह हल्की हुई।
"टिंकू," मैंने कहा, "आज घर नहीं जाऊँगा।"
"तो चल, मेरी दुकान चलें," उसने कहा। "मैंने जली दुकान के पीछे छोटा-सा चूल्हा बना लिया है। रात में खीर पका सकते हैं।"
"रात में मैं तहखाने जाऊँगा।"
वो रुका।
"तो फिर दिन में क्या?"
"दिन में," मैंने कहा, "मैं अखाड़े जाऊँगा। भैरव मुझे मिट्टी दिखाना चाहता है, तो मैं उसे दिखाऊँगा कि मिट्टी कौन पहचानता है।"
मीरा ने कहा, "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू अपने पापा के साथ रुक। उन्हें अकेले मत छोड़।"
वो कुछ कहने ही वाली थी कि रणवीर सिंह ने अस्पताल के दरवाज़े से आवाज़ दी।
"मीरा।"
वो पलटी।
"जा," उन्होंने कहा। "तू इसके साथ जा। मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ। और मैं तेरे पीछे खड़े रहने के लिए तैयार हूँ।" उन्होंने अपनी व्हीलचेयर पर हाथ रखा। "बीस साल मैंने इस कुर्सी को अपनी कमज़ोरी समझा। अब मैं इसे अपनी ताकत समझता हूँ। कोई मुझे देखकर हँसेगा, तो मैं उसे अपनी आँखों से जवाब दूँगा।"
मीरा ने अपने पापा की तरफ़ देखा, और फिर मेरी तरफ़।
"अच्छा," उसने कहा। "तो चल फिर।"
टिंकू ने कहा, "मैं भी चलूँ?"
"तू तो हर जगह है," मैंने कहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno