Spirit of a Fighter – Chapter 217
मेरे कानों में गूँज होने लगी। मुझे रणवीर सिंह याद आए — व्हीलचेयर पर बैठे, हाथ उठाकर मुझे आशीर्वाद देते हुए। उनकी आँखों में पानी। उनका "तू मेरी बेटा है, बेटी नहीं।"
"तो भैरव का बदला…" मैंने धीरे से कहा।
"बदला नहीं," हरनाम ने कहा। "ये जुनून है। बीस साल से वो रणवीर सिंह की मिट्टी, रणवीर सिंह का अखाड़ा, रणवीर सिंह के पहलवान — सब खा रहा है। एक-एक करके। धीरे-धीरे। जैसे कोई कीड़ा फल के अंदर से खाता है।" उसकी आँखें बंद होने लगीं। "वो चाहता है कि रणवीर सिंह ज़िंदा रहे। मरने नहीं देना चाहता। ज़िंदा रहे, और देखे कि उसका अखाड़ा खोखला हो रहा है।"
मीरा ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी। वो बस देख रही थी, और उसकी साँस रुकी हुई थी।
"ये नाम…" मैंने कहा। "ये तूने कहाँ से जाना?"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। "कॉपी में लिखा है। आख़िरी पन्ने पर। मैंने वो नाम कभी किसी को नहीं बताया। बीस साल से अपने अंदर दबाकर रखा। बस एक बार कॉपी में लिखा, जब मैंने सोचा कि शायद एक दिन… एक दिन मेरी गवाही किसी काम आए।"
मैं उठा और कॉपी की तरफ़ भागा। पन्ने मिट्टी में बिखरे थे — कुछ पर पैरों के निशान थे, कुछ भीगे हुए थे। मैंने उन्हें बटोरा, और आख़िरी पन्ना उठाया।
वो जला हुआ था। आधा। कोई इसे जलाने की कोशिश कर चुका था — शायद भैरव ने, उस रात, जब उसने सुना कि हरनाम कॉपी देने वाला है। पन्ने का ऊपरी हिस्सा राख था, नीचे सिर्फ़ आधा काग़ज़ बचा था, काले किनारों के साथ।
उस पर कुछ लिखा था, पर पढ़ा नहीं जा रहा था। राख ने स्याही खा ली थी। बस एक अक्षर बचा था — एक मोटी स्याही में लिखा, करीब-करीब साफ़।
'ब'।
बस वही। एक अक्षर। और उसके बाद सब राख।
मेरे हाथ काँपे। मैंने उसे सूँघा — जले काग़ज़ की गंध, और उसके नीचे, बहुत हल्की, कुछ और। पुरानी स्याही की गंध। और उँगलियों की गंध — वही उँगलियाँ जिन्होंने भैरव की कॉपी में खुराकें लिखी थीं।
पर नाम नहीं था। सिर्फ़ 'ब'।
मैं पन्ना लेकर हरनाम के पास लौटा। वो अब भी मीरा की गोद में था, और उसकी आँखें आधी बंद थीं।
"आख़िरी पन्ना जल गया है," मैंने कहा। "नाम नहीं बचा। सिर्फ़ एक अक्षर — 'ब'।"
हरनाम ने आँखें खोलीं। उसने मेरे हाथ में पन्ना देखा, और उसके होंठ हिले।
"तो… तो किसी ने जलाया," वो बोला। "मैंने नहीं जलाया। मैंने तो… मैंने तो वो कॉपी सहेजकर रखी थी।"
"भैरव," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ ठंडी थी, जैसे पत्थर पर पानी गिरा हो। "उसने कॉपी देख ली थी। एक बार। जब हरनाम उसे हिसाब दिखाने जाता था। उसने आख़िरी पन्ना पढ़ लिया होगा, और फिर जलाने की कोशिश की।"
"पर जला नहीं पूरा," मैंने कहा। "सिर्फ़ आधा।"
"क्योंकि हरनाम ने कॉपी छिपा दी होगी," टिंकू ने कहा। वो अब तक चुप खड़ा था, पर अब उसने अपनी डिब्बी उठाई जो गिर गई थी। "उसने जलती कॉपी छीनकर कहीं रख दी होगी।"
हरनाम ने धीरे से सिर हिलाया। "मैंने उस रात कॉपी को मिट्टी में दबा दिया था। भैरव को लगा जल गई। पर सिर्फ़ ऊपर का पन्ना जला। बाकी बच गया।"
टिंकू ने अपनी डिब्बी खोली। उसमें खीर थी — ठंडी हो चुकी थी, पर उसकी गंध आ रही थी — घी, इलायची, और उसके ऊपर भुने हुए काजू।
वो हरनाम के पास घुटनों के बल बैठा, और अपनी उँगली से थोड़ी खीर लेकर उसके होंठों पर रखी।
"ये खीर मेरी माँ ने बनाई थी," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो हमेशा वाली हँसी नहीं थी। "इसमें कोई ज़हर नहीं है। मैं जानता हूँ, क्योंकि मैंने खुद चखी है। और मेरी माँ ने भी चखी है।"
हरनाम के होंठ काँपे। उसने खीर निगली, और फिर उसकी आँखों से पानी बहकर उसके कानों तक आ गया।
"मेरी माँ भी ऐसी खीर बनाती थी," वो फुसफुसाया। "बहुत पहले। जब मैं छोटा था।"
"तो अब तू चुप क्यों है?" टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो पुरानी बड़ी-बड़ी बातें लौट आईं। "मैं तुझे रोज़ खीर खिलाऊँगा। बदले में तू मेरे लिए एक काम करना — जब तक भैरव अंदर न हो, तब तक मेरी दुकान पर आकर बैठना। मुझे अकेले डर लगता है।"
हरनाम ने हँसने की कोशिश की। हँसी की जगह एक टूटी आवाज़ निकली, जो किसी रोने जैसी थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा — उसके नीले होंठ, उसकी धँसी आँखें, उसके हाथ जो अब भी मेरी कलाई पकड़े थे। यही आदमी बीस साल तक भैरव के साथ बैठा, हिसाब रखा, मौतें लिखीं। और आज… आज वो इस हाल में पड़ा है, और उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि उसने मुझे कॉपी दे दी।
"उठ," मैंने कहा। "अब तू यहाँ नहीं रहेगा।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। "कहाँ?"
"मेरे साथ।"
वो चुप रहा। फिर बोला, "तेरे घर? उस घर में जहाँ मैंने… जहाँ मैं भैरव के लिए जासूसी की थी?"
"उस घर में," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सख्ती थी जो मुझे खुद पर भी अजीब लगी, "जहाँ मेरी माँ तेरे लिए दाल बनाएगी। और तू उसे खाएगा। और अगर तूने एक बार भी भैरव का नाम लिया… तो मैं तेरी टाँग तोड़ दूँगा। समझा?"
हरनाम की आँखों में फिर पानी आया, पर इस बार उसने पलकें नहीं झुकाईं। उसने मेरी आँखों में देखा और धीरे से कहा, "समझा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रही थी — थोड़ा-सा, बस होंठों के कोने पर। और उसकी आँखें कह रही थीं जो मुँह नहीं कह सकता था।
हमने हरनाम को उठाया। टिंकू ने उसका एक हाथ पकड़ा, मैंने दूसरा। मीरा आगे चली, रास्ता साफ़ करती हुई।
अखाड़े से बाहर निकलते वक़्त मैंने पलटकर देखा। दीवार के छेद से भैरव की आँख दिख रही थी — पर वो हट गई जैसे ही मेरी नज़र पड़ी।
हरनाम ने ठीक मेरे कान के पास अपना मुँह किया। उसकी साँस ठंडी थी, और उसमें वो ज़हर की कड़वाहट अब भी थी।
"एक आख़िरी बात," उसने फुसफुसाया। "वो नाम… कॉपी के आख़िरी पन्ने पर जो अक्षर बचा है, 'ब'… उससे शुरू होता है। बस यही मुझे याद है। और एक बात और।" उसकी पकड़ मेरी कलाई पर और कस गई। "भैरव तीन दिन बाद तेरे सामने उसी मिट्टी में उतरेगा जिसमें उसका बाप हारा था। वो उस मिट्टी से डरता है। और वो चाहता है कि तू भी उससे डरे।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस दिन," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ आख़िरी बार ज़ोर पकड़ रही थी, "उस मिट्टी में दो लोग उतरेंगे — वो, और उसका बाप का बदला। और उसका बाप का बदला… तू है। वो तुझे खुद से बदला लेने से नहीं रोक सकता। वो बस इतना चाहता है कि तू उससे हार जाए। ताकि वो कह सके — देखो, रघुवीर के बेटे ने भी वही किया जो रणवीर ने किया। पर वो नहीं जानता…"
वो रुक गया। उसकी साँस फूलने लगी।
"क्या नहीं जानता?" मैंने पूछा।
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो पहले कभी नहीं चमका था। जैसे कोई अंधेरे कमरे में आख़िरी दीया जलाए।
"वो नहीं जानता कि तू उसका बदला नहीं है। तू रघुवीर का बेटा है। और रघुवीर ने कभी किसी से बदला नहीं लिया। उसने सिर्फ़ सच कहा। और सच… सच किसी का बदला नहीं होता। सच बस सच होता है।"
उसकी आँखें बंद हो गईं।
"हरनाम!" मैंने उसे हिलाया। "हरनाम!"
मीरा दौड़कर आई और उसकी नब्ज़ पकड़ी। एक पल के लिए सब रुक गया। फिर उसने साँस छोड़ी।
"बेहोश हुआ है," वो बोली। "पर ज़िंदा है। जल्दी करो, अस्पताल।"
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