Spirit of a Fighter – Chapter 216
भैरव ने भीड़ की तरफ़ हाथ उठाया, जैसे कोई राजा अपनी प्रजा को आशीर्वाद दे रहा हो, और जाने लगा। भीड़ उसके लिए रास्ता छोड़ने लगी — पुरानी आदत से, डर से।
वो दस कदम गया। फिर रुका।
और पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
"वैसे एक बात," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक वो सारी मिठास गायब थी। सिर्फ़ ठंडी, सूखी बात बची थी। "तू जिस हरनाम की कॉपी लेकर घूम रहा है, और जिस हरनाम ने अभी मेरे खिलाफ़ खड़े होकर ये सारा तमाशा किया… वो अब ज़िंदा नहीं है।"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
मैंने पलटकर देखा — हरनाम वहीं खड़ा था, कॉपी हाथ में, भीड़ के बीच। वो भी भैरव की तरफ़ देख रहा था, और उसके चेहरे पर वो पीली हँसी नहीं थी। सिर्फ़ एक अजीब-सी शांति थी।
"क्या बक रहा है?" सुक्खी बुआ ने कहा। "देखो, ये सामने खड़ा है।"
पर भैरव मुस्कुराया। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरी आँखों में देखा — एक लंबे पल तक — और फिर मुड़कर चला गया, और भीड़ उसके पीछे सरकती गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथ में पन्ना था, जेब में हरनाम की कॉपी थी, और कानों में भैरव की आवाज़ गूँज रही थी — "वो अब ज़िंदा नहीं है।"
मैंने धीरे से पलटकर हरनाम को देखा। वो कॉपी अपनी छाती से लगाए खड़ा था, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जैसे वो खुद जानता हो, भैरव क्या कह रहा है।
मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा। "तुम्हारा चेहरा क्यों ऐसा है?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा — उनके पतले गाल, हल्दी का टीका, और उनकी आँखों में वो भरोसा जो मुझे सबसे ज़्यादा डराता था।
"कुछ नहीं, माँ," मैंने कहा। "बस… भैरव ने कुछ कहा। मुझे समझना है।"
"क्या कहा?"
मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं खड़ा था, और उसकी नज़रें मुझ पर थीं।
"बाद में, माँ," मैंने धीरे से कहा। "पहले मुझे हरनाम से एक बात पूछनी है।"
॥
मैं हरनाम की तरफ़ बढ़ा, और मेरे पीछे टिंकू भी चला आया — उसकी टोपी तिरछी हो गई थी, हाथ में मिठाई की डिब्बी दबी हुई।
"वीर, रुक," टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ी। "भैरव ने जो कहा, वो सच हो सकता है। तू अंधा होकर मत जा।"
"तो क्या करूँ? यहीं खड़ा रहूँ?"
"मैं साथ चलूँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बड़ी-बड़ी बातें नहीं थीं, बस सीधी बात थी। "पर पहले सोच। भैरव ऐसा क्यों बोलेगा? वो चाहता है कि तू भागे। अगर तू हरनाम के पास दौड़ा, तो वो कहेगा — देखो, वीर डर गया।"
मैं रुक गया। टिंकू की बात में दम था।
पर तभी मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में अपनी जड़ी-बूटी की थैली थी, और उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
"मैंने हरनाम को देखा है," उसने धीरे से कहा। "जब वो कॉपी लेकर खड़ा था, तब भी उसका रंग पीला था। मुझे लगा डर से है। पर अब सोचती हूँ…" उसने थैली को कसकर पकड़ा। "शायद डर नहीं था।"
"क्या मतलब?"
"ज़हर का असर ऐसे ही दिखता है," मीरा ने कहा। "पहले होंठ नीले, फिर आँखों के नीचे काला, फिर साँस। जब वो खड़ा था, उसके होंठ… मैंने देखा था, पर समझी नहीं।"
मेरे पेट में ठंडी सुई-सी चुभी।
मैं भीड़ को चीरकर आगे बढ़ा। लोग हटते गए। सुक्खी बुआ कुछ पूछ रही थीं, पर मैंने सुना नहीं। मैं सिर्फ़ हरनाम को देख रहा था — वो अब भी वहीं खड़ा था, कॉपी छाती से लगाए, और उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो।
फिर वो लड़खड़ाया।
मैंने दौड़कर उसे पकड़ा, पर मैं देर से पहुँचा। वो मेरे हाथों से फिसलकर ज़मीन पर गिर गया, और उसकी कॉपी खुलकर दूर जा पड़ी। मिट्टी में उसके पन्ने फैल गए।
"हरनाम!" मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया। "हरनाम, सुन!"
उसकी आँखें खुली थीं, पर कुछ देख नहीं रही थीं। उसके होंठ नीले थे — गहरे नीले, जैसे कोई नीला फल कुचल दिया गया हो। और उसकी साँस… साँस ऐसी आवाज़ कर रही थी जैसे कोई पुरानी पंखा चल रहा हो, जो रुकने ही वाला है।
"हटो," मीरा ने मुझे धक्का दिया — नरमी से, पर पक्का। वो मेरे बगल में बैठी और अपनी थैली खोली। "वीर, उसका सिर ऊपर कर। टिंकू, पानी!"
टिंकू की डिब्बी गिर गई। वो भागा।
मीरा ने एक छोटा-सा कपड़े का पुड़ा निकाला, उसे खोला, और उसमें से सफ़ेद पाउडर निकालकर हरनाम के मुँह में डाला। फिर उसने उसका सिर अपनी गोद में रखा और उसके मुँह पर झुककर बोली, "हरनाम भाई, निगलो। प्लीज, निगलो।"
हरनाम का गला हिला। उसने निगला।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने अपनी हथेली हरनाम के माथे पर रखी — ठंडा। सिर्फ़ ठंडा। मेरे भीतर कुछ ऐसा घूम गया जो मैंने पहले कभी नहीं महसूस किया। गुस्सा और दया, दोनों एक साथ, एक ही नस में।
यही आदमी अभी मेरे सामने खड़ा होकर हर बात कबूल कर रहा था — अपनी चोरी, अपनी चुप्पी, अपना डर। यही आदमी। और भैरव ने इसे ऐसे फेंक दिया जैसे कोई पुरानी जूती।
मीरा ने उसकी नब्ज़ पकड़ी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था — बस आँखें सिकुड़ी हुईं, होंठ कसे हुए।
"साँस आ रही है," वो बोली। "धीमी, पर आ रही है।"
"बचेगा?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," उसने सीधा कहा। "ये पुड़िया सिर्फ़ समय खरीदती है। असली दवा अस्पताल में है।"
टिंकू दौड़कर आया, हाथ में पानी का लोटा। मीरा ने हरनाम के होंठों पर थोड़ा पानी डाला। कुछ पानी उसके गले से नीचे गया, कुछ होंठों से बह गया।
फिर हरनाम की आँखें हिलीं।
वो धीरे-धीरे खुलीं — पहले आधी, फिर पूरी। उसने मुझे देखा। पहचाना। और उसकी आँखों में पानी आ गया।
"तू… तू आ गया," उसने फुसफुसाया। आवाज़ ऐसी जैसे किसी ने उसकी ज़ुबान को रेत से रगड़ दिया हो।
"बोल मत," मैंने कहा। "साँस ले।"
पर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और ज़ोर से कसी हुईं, जैसे किसी डूबते आदमी की पकड़।
"सुन," वो बोला। "सुन ले। भैरव ने मुझे खुद दिया। अपने हाथ से। जब मैंने तुझे कॉपी दे दी… तब वो मेरे पास आया, मुस्कुराया, और बोला — 'हरनाम, तूने मेरा भरोसा तोड़ दिया। अब ये पी ले।'"
मेरा जबड़ा कस गया।
"तूने क्यों पी लिया?" मैंने कहा। "तू भाग क्यों नहीं गया?"
हरनाम ने हल्की-सी हँसी दी — बिना मज़े की हँसी, जैसे किसी ने खाँसा हो। "क्योंकि मैं बीस साल से भाग रहा था। और आज… आज पहली बार लगा कि भागना बंद कर दूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तूने मुझे माफ़ किया। उस आदमी ने… उस आदमी ने मुझे कभी माफ़ नहीं किया। बस इस्तेमाल किया।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने उसका हाथ और कसकर पकड़ा।
"अब बकवास बंद," मीरा ने कहा, पर उसकी आवाज़ में भी कुछ भीगा हुआ था। "तुझे अस्पताल ले जाना है। बोलना बाद में।"
"नहीं," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक ज़ोर आ गया। "पहले सुन ले। वरना बाद में मैं नहीं होऊँगा।" उसने मेरी कलाई खींचकर अपने पास किया। "भैरव का असली नाम भैरव नहीं है।"
मैं स्तब्ध रह गया।
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें फैल गईं।
"क्या कह रहा है तू?" मीरा बोली।
"सच," हरनाम ने कहा। "भैरव का बाप एक पहलवान था। बड़ा पहलवान। बीस साल पहले रणवीर सिंह ने उसे अखाड़े में हराया था। सबके सामने। मिट्टी में।" उसने साँस लेने की कोशिश की, और उसकी छाती ऊपर-नीचे हुई। "उस दिन के बाद वो पहलवान कभी नहीं हँसा। कुछ महीने बाद वो मर गया। और उसका बेटा… उसका बेटा यही भैरव है।"
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