Spirit of a Fighter – Chapter 215
"भैरव जी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहले से मज़बूत थी, "ये कॉपी तो हरनाम की है। पर एक पन्ना ऐसा भी है जो आपकी लिखाई में है।"
भैरव का मुँह खुला रह गया। फिर वो हँसा — ज़ोर से, जैसे कोई पुराना नाटक कर रहा हो। "झूठ!" उसने कहा। "ये ईंट ढोने वाला मुझ पर इल्ज़ाम लगा रहा है! मेरी लिखाई? मैं खाता-वाता नहीं रखता।"
मैंने पन्ना खोला और उसके सामने उठा दिया।
"रघुवीर — पहली खुराक, दो महीने। दूसरी खुराक, एक हफ़्ते बाद। साथ में दूध में घोलने का तरीक़ा। नीचे आपका नाम — भैरव सिंह। और ये आपकी लिखाई है, भैरव जी। वो 'भ' जो आप हर पर्ची पर ऐसे खींचते हैं जैसे उसमें पूँछ लगी हो। मैंने आपकी पर्चियाँ देखी हैं।"
भैरव की हँसी चेहरे पर ही रुक गई। जैसे किसी ने पानी का नल बंद कर दिया हो। उसने एक कदम आगे बढ़ा और हाथ बढ़ाया — झटके से पन्ना छीनने के लिए।
मैं पीछे हट गया।
"देखो!" मैंने भीड़ की तरफ़ कहा। "ये पन्ना सब देख सकते हैं।"
भीड़ में से तीन-चार पुराने पहलवान आगे आए — वो वाले जिनके बेटे या भतीजे अखाड़े से गए और लौटे ही नहीं। एक बूढ़ा, जिसकी आँखों पर सफ़ेद परत थी, काँपते हाथों से पन्ना छूने लगा। जैसे वो काग़ज़ नहीं, किसी का चेहरा छू रहा हो।
"ये तो भैरव की लिखाई है," उसने धीरे से कहा। "मैंने बीस साल उसकी पर्चियाँ उठाई हैं। ये 'भ' मैं कैसे भूलूँ?"
"मेरा बेटा भी," दूसरे ने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "मेरा सोनू भी ऐसे ही गया था। दो महीने में। पहले शरीर फूला, फिर सूख गया। मैंने सोचा, किस्मत है। किस्मत!"
भैरव ने पीछे हटते हुए भीड़ को देखा। पहली बार मैंने उसकी आँखों में कुछ ऐसा देखा जो मैंने कभी नहीं देखा था — डर। असली डर। वो डर जो आदमी को कोने में खड़ा कर देता है।
तभी रणवीर सिंह ने अपने हत्थों पर हाथ रखे और खुद को उठाने की कोशिश की।
"पापा, नहीं!" मीरा दौड़ी।
उनके पैर नहीं हिल रहे थे — बीस साल से नहीं हिले थे। पर उनकी बाँहें काँप रही थीं, उनका पूरा शरीर काँप रहा था, और वो आधे उठ गए। सिर्फ़ आधे। मीरा ने कमर पर हाथ रखकर सहारा दिया, और वो कुर्सी के किनारे पर बैठ गए — पर उनकी आँखें सीधे भैरव पर टिकी थीं, और उन्होंने खड़े होने की जो कोशिश की, वो शब्दों से बड़ी थी।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि दूर नहर में पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी, और अखाड़े की मिट्टी की गंध हवा में तैर रही थी।
"भैरव," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द ऐसे गिर रहा था जैसे पत्थर पानी में। "बीस साल से मैं चुप था। तूने मेरे पैर लिए, मेरा अखाड़ा लिया, मेरे पहलवान लिए — और मैं चुप रहा। क्योंकि मेरी बेटी की जान तेरे हाथ में थी। तू हर महीने उसकी दवा भेजता था, और हर दवा के साथ याद दिलाता था — 'चुप रहो, सर, वरना बेटी को कुछ हो जाएगा।'"
मीरा ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रुकी नहीं।
"मैं एक बाप हूँ," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार थोड़ी ऊँची हुई। "और एक बाप अपनी बेटी के लिए क्या नहीं करता? मैंने अपनी इज़्ज़त निगल ली। मैंने अपना अखाड़ा तुझे दे दिया। पर तूने मेरी बेटी को ज़िंदा रखकर भी मार डाला — रोज़, एक-एक दिन। उसकी दवा में भी तेरा ज़हर था, है ना? धीमा ज़हर, जो उसे ज़िंदा रखता था पर ठीक नहीं होने देता था।"
भैरव कुछ नहीं बोला। उसकी चुप्पी ही जवाब थी।
"पर आज मेरी बेटी खुद खड़ी है," रणवीर सिंह ने कहा। "तो मैं क्यों चुप रहूँ?"
भैरव की आँखें मीरा पर गईं। वो मीरा को ऐसे देख रहा था जैसे कोई गणित का सवाल हल कर रहा हो — जो कभी हल नहीं होता।
"पापा," मीरा ने धीरे से कहा।
वो अपने पिता के सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने उनके घुटनों पर हाथ रखा — वो घुटने जो बीस साल से नहीं हिले थे — और उनकी आँखों में देखा।
"अब आप आराम कीजिए। लड़ाई मैं लड़ूँगी।"
रणवीर सिंह की आँखें भर आईं। उन्होंने धीरे से हाथ उठाया और मीरा के सिर पर रख दिया। उनके होंठ हिले, कोई आवाज़ नहीं निकली। पर उनका हाथ मीरा के सिर पर ऐसे टिका रहा जैसे कोई बाप अपनी बेटी को बचपन से बड़ा होते देख रहा हो।
मेरा गला भर गया। मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। वो वहीं खड़ी थीं — दुबली, माथे पर हल्दी का टीका, सफ़ेद चोटी हवा में हिल रही थी। उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुरा रही थीं। जैसे बीस साल बाद कोई हिसाब पूरा हुआ हो।
"अब बहुत हुआ," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ में वो गुड़ वाली मिठास लौटने लगी थी, पर इस बार उसमें कुछ टूटा हुआ था। "सब सुनो। ये लोग मुझे बदनाम कर रहे हैं। कल…"
"मुकाबला तो तीन दिन बाद है," सुक्खी बुआ ने कहा, और मुझे हैरानी हुई कि उन्हें याद था। वो अपनी लाठी के सहारे खड़ी थीं और उनका चेहरा पत्थर जैसा सख़्त था।
"तो तीन दिन बाद!" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ ऊँची हुई, जैसे वो भीड़ को जगाने की कोशिश कर रहा हो। "सब आ जाओ। सब देखो। मैं खुद इस ईंट ढोने वाले से लड़ूँगा। हार गया तो अखाड़ा इसका, काग़ज़ात सबके सामने। जीत गया तो ये लोग जो चाहें कहें।"
"काग़ज़ात?" हरनाम ने कहा। "अलमारी?"
भैरव एक पल रुका। उसका जबड़ा कसा। फिर उसने कहा, "मुकाबले के बाद।"
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी — इतनी साफ़, इतनी ठंडी। "काग़ज़ात आज। अभी। सबके सामने।"
भैरव मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखों में वो पुराना डर अब गुस्से में बदल रहा था।
"तू बहुत बोलने लगा है, ईंट वाले," उसने धीरे से कहा।
"आपने ही तो मुझे बोलना सिखाया," मैंने कहा। "रोज़ सुबह, अखाड़े में। जब आप मेरे कंधों पर हाथ रखकर कहते थे — 'बोल, तेरी आवाज़ में दम ला।' आज दम आ गया, भैरव जी।"
भीड़ में कुछ लोग हँसे। ये हँसी भैरव के खिलाफ़ थी, और वो समझ गया।
उसने एक लंबी साँस ली। फिर उसके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान लौटी — वो मुस्कान जो एक तरफ़ होंठ पर रुक जाती थी, और आँखों तक नहीं पहुँचती थी।
"तीन दिन बाद," उसने कहा, और अपनी धोती ठीक की। "अखाड़े में। सबके सामने।" वो मुड़ा।
और फिर वो रुका।
मुझे लगा वो भीड़ को कोई आख़िरी बात कहेगा। पर वो मेरी तरफ़ मुड़ा, और मेरे कान के पास आया — इतना पास कि मुझे उसके मुँह की गंध आई, पान और तंबाकू की, और उसके नीचे कुछ और, कुछ सड़ा हुआ।
"सुन," उसने फुसफुसाया। "तेरी माँ का ज़हर अभी शरीर में है। तूने जो दवा बदली, वो आधी है। आधी दवा से ज़हर धीमा हुआ है, मिटा नहीं।" उसने मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा। "उसकी पूरी दवा सिर्फ़ मेरे पास है। पच्चीस दिन की। उसके बाद… तू सोच ले।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा — वो अब भी मुस्कुरा रही थीं, कुछ समझे बिना।
"तो मुकाबला तो होगा," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो मिठास आ गई। "पर मेरे साथ शर्त है। तू जीता, तो दवा मिलेगी। तू हारा… तो तेरी माँ वैसे भी चली जाएगी। और अगर तू अखाड़े से भागा, तो भी। सोच ले, ईंट वाले — तेरी जीत में ही तेरी माँ की जान है।"
वो हँसा। धीरे से। और मेरे कंधे को थपथपाकर पीछे हट गया।
मेरा दिल धक-धक कर रहा था। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। मेरी जीभ सूख गई थी।
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