Spirit of a Fighter – Chapter 214
उनके पीछे दस-बारह लोग थे। कोई कंधे पर कुदाल लिए, कोई सिर्फ़ देखने आया था। और सबसे पीछे — मैंने अपनी आँखों पर यकीन नहीं किया — रणवीर सिंह की व्हीलचेयर थी, जिसे मीरा धक्का दे रही थी। उनके पीछे माँ थीं। माँ, जिनसे मैंने कहा था कि मैं तीन रात में लौट आऊँगा।
मेरी साँस रुक गई। माँ ने मुझे देखा भी नहीं — उनकी आँखें सीधे भैरव पर थीं, और मुझे लगा जैसे उन आँखों में बीस साल का इंतज़ार खौल रहा है।
"तो ये सच है," रणवीर सिंह की आवाज़ आई, और मुझे यकीन नहीं हुआ कि इतनी साफ़ आवाज़ उनके मुँह से निकली। "तुम रात को कुएँ पर आते हो, भैरव।"
भैरव का चेहरा पत्थर हो गया।
"सर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वही मिठास घुल गई जो अखाड़े की मंचों पर होती थी, "आप इस वक़्त यहाँ? आपकी तबीयत ठीक नहीं, आपको आराम…"
"मेरी तबीयत ठीक है," रणवीर सिंह ने कहा। "बीस साल से ठीक नहीं थी। आज पहली बार ठीक लग रही है।"
भैरव हँसा। ज़ोर से, ऐसे जैसे सबको यकीन दिलाना चाहता हो कि माजरा मज़ाक है।
"देखिए, सर, ये लड़का —" उसने मेरी तरफ़ इशारा किया — "ये रातों को कुएँ पर घूमता है, डरावनी कहानियाँ फैलाता है। कल अखाड़े में इसकी हालत देख लीजिए। बस इतनी सी बात है।"
"झूठ," मैंने कहा। और इस बार मेरी आवाज़ नहीं काँपी। "तुम बीस साल से पहलवानों को ज़हर पिला रहे हो। जगदीश को, रघुवीर को, श्यामू को, लुट्टन को —"
"लुट्टन मेरा दाहिना हाथ है," भैरव ने काटा, "और वो आज तक मेरे हाथ से पानी पीता आया है, बिलकुल ठीक है।"
"हाँ," मैंने कहा, "और आज उसने सबके सामने वो पानी पीने से मना कर दिया। तुम भूल गए? तुम्हारा दाहिना हाथ आज तुमसे अलग हो गया, भैरव।"
भीड़ में कुछ लोग खुसफुसाए। सुक्खी बुआ ने पान का बीड़ा दबाया और आगे बढ़ीं।
"भैरव भाई, ये सच है क्या?" उन्होंने पूछा, और उनकी आवाज़ में चुगली वाली मिठास लेकिन नीचे डर था। "क्योंकि मैंने भी लुट्टन को आज अखाड़े में कुछ कहते सुना था, पर मैंने सोचा चुगली होगी…"
"बुआ, आप घर जाइए," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास पहली बार पतली पड़ गई। "रात हो गई है।"
पर सुक्खी बुआ टली नहीं। "मैं तो बस एक बात पूछ रही हूँ। जगदीश को क्या तुमने…"
"मैंने कुछ नहीं किया!" भैरव की आवाज़ ऊँची हुई, और भीड़ एक कदम पीछे हटी। "इल्ज़ाम लगाना आसान है। सबूत कहाँ है? ये काग़ज़?" उसने मेरे हाथ की तरफ़ देखा। "ये कोई भी लिख सकता है।"
"मेरी लिखाई है," एक आवाज़ आई, और भीड़ फट गई।
हरनाम सामने आया। उसके हाथ में वही हरी कवर वाली कॉपी थी, और उसकी आँखें लाल थीं — रोने से या बेसुधी से, मैं नहीं बता सका। उसके पीछे उसका भाई बलवंत खड़ा था, पर इस बार बलवंत के हाथ पीछे बँधे थे, और उसके चेहरे पर लगी मिट्टी बता रही थी कि हरनाम ने उसे कुछ समय पहले ही साधा था।
"ये मेरी कॉपी है," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार साफ़ निकली। "और इसमें जो लिखा है, वो भैरव के हाथ का लिखा है। बीस साल का हिसाब। हर खुराक, हर नाम, हर तारीख़। मैंने इसे छुपाया, क्योंकि मेरा बेटा उसके कब्ज़े में था।" उसने भैरव की तरफ़ देखा। "आज सुबह मैंने मुन्ना को अस्पताल से निकाल लिया। मीरा के कहे मुताबिक़, उसकी दवा बदल दी। वो अब साँस ले रहा है, भैरव। साँस ले रहा है।"
भैरव का चेहरा बदला। वो पहली बार हिला। "तू झूठ बोल रहा है," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था जो अभी मेरे साथ बोलते वक़्त था।
"मैं अब झूठ नहीं बोलूँगा," हरनाम ने कहा। "बीस साल बोला, और हर बार तेरे ज़हर से मेरा बेटा थोड़ा-थोड़ा मरा। अब नहीं।"
भैरव ने कॉपी छीनने के लिए हाथ बढ़ाया, पर हरनाम ने पीछे हटकर कॉपी ऊपर उठा दी। "देखो!" उसने भीड़ की तरफ़ कहा। "सब देखो — यहाँ लिखा है, 'रघुवीर — पहली खुराक, दो महीने। दूसरी खुराक, एक हफ़्ते बाद।' और नीचे — मेरा हस्ताक्षर, खाते में भैरव सिंह।"
भीड़ में एक बूढ़ा आदमी आगे आया — मैंने उसे अखाड़े की पुरानी तस्वीरों में देखा था। वो काँपते हाथों से काग़ज़ छूने लगा।
"मेरा बेटा भी," उसने धीरे से कहा, "मेरा भी बेटा अठारह साल पहले ऐसे ही गया था।"
और फिर जो हुआ, वो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर के हत्थों पर दोनों हाथ रखे, और ज़ोर लगाकर खुद को उठाने की कोशिश की।
"पापा!" मीरा दौड़ी और उनका हाथ पकड़ा।
पर वो नहीं रुके। उनके पैर नहीं हिल रहे थे, उनका पूरा शरीर काँप रहा था, पर वो आधे उठे — सिर्फ़ आधे — और उनकी आँखें सीधे भैरव पर टिकी थीं। मैंने उनकी उंगलियाँ व्हीलचेयर के हत्थे पर सफ़ेद देखीं। मीरा ने उन्हें सहारा दिया, और वो कुर्सी के किनारे पर बैठ गए — पर खड़े होने की कोशिश करना ही काफ़ी था।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि नहर की आवाज़ दूर से सुनाई दी।
"भैरव," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी पर हर शब्द साफ़, "बीस साल से मैं चुप था। तूने मेरे पैर लिए, मेरा अखाड़ा लिया, मेरे पहलवान लिए। और मैं चुप रहा — क्योंकि मेरी बेटी की जान तेरे हाथ में थी। तू हर महीने उसकी दवा भेजता था, और हर दवा के साथ याद दिलाता था — 'चुप रहो, सर, वरना बेटी को कुछ हो जाएगा।'"
मीरा ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रुके नहीं।
"पर आज मेरी बेटी खुद खड़ी है," उन्होंने कहा, "तो मैं क्यों चुप रहूँ?"
भैरव की आँखें मीरा पर गईं, फिर रणवीर पर, फिर भीड़ पर। मैंने देखा कि उसका जबड़ा कस रहा है।
"पापा," मीरा ने धीरे से कहा। उसने अपने पिता का हाथ थामा और उनके सामने घुटनों के बल बैठकर उनकी आँखों में देखा। "अब आप आराम कीजिए। लड़ाई मैं लड़ूँगी।"
रणवीर सिंह की आँखें भर आईं। उन्होंने धीरे से हाथ उठाया और मीरा के सिर पर रख दिया। उनके होंठ हिले, कोई आवाज़ नहीं निकली।
मेरा गला भर गया। मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। वो वहीं खड़ी थीं — दुबली, माथे पर हल्दी का टीका, सफ़ेद चोटी हवा में हिल रही थी। उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुरा रही थीं। जैसे बीस साल बाद कुछ पूरा हुआ हो।
"अब बहुत हुआ," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुड़ वाली मिठास लौटने लगी — पर इस बार उसमें कुछ टूटा हुआ था। "सब सुनो। ये लोग मुझे बदनाम कर रहे हैं। कल अखाड़े में मुकाबला है।"
"मुकाबला तो तीन दिन बाद है," सुक्खी बुआ ने कहा, और मुझे हैरानी हुई कि उन्हें याद था।
"तो तीन दिन बाद!" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ ऊँची हुई। "सब आ जाओ। सब देखो। मैं खुद वीर से लड़ूँगा। हार गया तो अखाड़ा उसका, जीत गया तो ये लोग जो चाहें कहें।"
"काग़ज़ात?" हरनाम ने कहा। "अलमारी?"
भैरव एक पल रुका। फिर उसने कहा, "मुकाबले के बाद।"
"काग़ज़ात तो मुकाबले के बाद ही मिलेंगे," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो पुरानी चीनी घुलने लगी। "पहले ये साबित करे कि ये लड़ सकता है।"
भीड़ में कुछ लोग हँसे। पर वो हँसी पहले जैसी नहीं थी। पहले भैरव की बात पर लोग सिर हिलाते थे, जैसे गाँव का बड़ा कुछ कह रहा हो। अब कुछ लोग उसकी तरफ़ देख भी रहे थे और कुछ मेरी तरफ़।
मैंने हरनाम की कॉपी अपनी जेब में रखी और एक पन्ना निकाला — वो पन्ना जो मैंने उस रात उसकी अलमारी की तस्वीर से उतारा था, बारीक अक्षरों में, दो रातें जागकर।
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