Spirit of a Fighter – Chapter 213
"मैं जानती हूँ तू क्या करने जा रहा है," उन्होंने कहा। "मैं रोकूँगी नहीं। पर एक बात सुन। तेरे पापा रघुवीर ने भी एक रात ऐसा ही कुआँ खोदा था। और वो अकेले गए थे।"
मेरा गला सूख गया।
"तुम्हें कैसे पता —"
"मैं उस वक़्त तेरे पेट में थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो हिसाब था जो सालों से जमा था। "तेरे पापा ने मुझे नहीं बताया था। पर मैंने उनका चेहरा देखा था — उस रात के बाद। जब वो लौटे, तो उनके हाथों में मिट्टी थी और आँखों में कुछ ऐसा जो कभी नहीं मिटा। फिर कुछ दिनों बाद वो कुएँ के पास मिले। मरे हुए।"
वो मेरे सामने बैठ गईं। दीवार से टिककर। जैसे उनके पैर उन्हें नहीं उठा पा रहे थे।
"आज रात तू अकेला नहीं जाएगा," उन्होंने कहा। "नहीं तो मैं तेरे पैर पकड़ लूँगी, और मैं बूढ़ी हूँ, पर मेरी पकड़ अभी मज़बूत है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक नई बात आई थी — जो मिठाई में नहीं थी, जो उसकी हँसी में नहीं थी।
"मैं चलूँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं था। "मैं हल्का हूँ, मैं सीढ़ियों पर पहले उतरूँगा। अगर पत्थर गिरा, तो तेरे ऊपर नहीं, मेरे ऊपर गिरेगा।"
"टिंकू —"
"मत बोल भाई। मैं तेरे साथ इसलिए नहीं हूँ कि तू मुझे रोके।"
कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टेकी और खड़े हो गए।
"तीन जने काफ़ी नहीं," उन्होंने कहा। "कुएँ में आदमी उतरता है, पर उसकी रस्सी पकड़ने वाले ऊपर चाहिए। मैं रस्सी पकड़ूँगा। मेरे हाथ अभी भी पहलवान के हैं, भले ही बाक़ी शरीर ढीला हो गया।"
मीरा मंच से उतरकर आई। उसके हाथ में एक छोटी-सी थैली थी, और उसके पापा के होंठ अब भी हिल रहे थे, जैसे वो अंदर से कुछ बोल रहे हों।
"ये लो," उसने थैली मेरे हाथ में रखी। "मेरे पापा के लिए अंग्रेज़ डॉक्टर की दवा है। दस गोली। मैंने आज तक एक भी नहीं बेची क्योंकि भैरव कहता था पैसे नहीं हैं। पर मुझे पता है पैसे कहाँ गए थे।" उसकी आँखें चमकीं। "अगर आज रात तुम कुआँ खोलने जा रहे हो, तो सबसे पहले ये सुनो — मेरे पापा की आँखें मुझसे कह रही हैं कि उस कुएँ में सिर्फ़ राज़ नहीं है। कुछ और भी है। वो कुछ ऐसा जो भैरव ने कभी नहीं छोड़ा।"
"क्या?" मैंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर जब मेरे पापा उस रात कुएँ के पास मिले थे — तब उनकी जेब में एक चीज़ थी। भैरव ने वो चीज़ ले ली। और जब भैरव उस चीज़ को देखता है, तो उसके हाथ काँपने लगते हैं।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। उसकी आँखों में मुझ पर भरोसा था। और ये भरोसा डर से ज़्यादा भारी था।
माँ खड़ी हो गईं और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"जा," उन्होंने कहा। "पर सुन — नौ सीढ़ियाँ गिनते हुए उतरना। और तीसरी सीढ़ी पर पत्थर उठाने से पहले एक बार ऊपर देखना। मैं यहीं खड़ी मिलूँगी।"
मैंने सिर हिलाया। मेरी आँखें भरी हुई थीं, पर मैं रोया नहीं। वो आँसू मेरे अंदर कहीं जम गए थे, और मुझे लगा वो आज रात किसी और काम आएँगे।
हम अखाड़े से निकले। बाहर हवा में नहर की सीलन थी और दूर किसी गली में कुत्ते भौंक रहे थे। पीछे मुड़कर देखा तो अखाड़े का दरवाज़ा खुला था, और उसके अंदर मंच पर रणवीर सिंह की व्हीलचेयर खड़ी थी — अकेली, चुप, और उनके हाथ की पकड़ अब भी मीरा के हाथ की जगह पर कसी हुई।
रास्ते में टिंकू ने अपनी डिब्बी खोली और उसमें से एक टेढ़ी-मेढ़ी कील निकाली।
"क्या है ये?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की। जब वो दरवाज़ा खोलते थे, तो लोहे की कील से ताले के पत्ते उठाते थे।" उसने कील मेरी हथेली पर रखी। "मुझे सीढ़ियों पर पहले उतरना है न। अगर मैं फँसा, तो तू इससे ताला खोल लेना।"
मैंने कील को जेब में रखा। उसका ठंडा धातु मेरी जाँघ से चिपक गया, और मुझे अपने पापा की मिट्टी वाली गंध याद आई।
हम कुएँ के पास पहुँचे। चारों तरफ़ ऊँची घास थी, और कुएँ का मुँह पत्थर से ढका था। पत्थर पर काई जमी थी, और उस काई में कोई हाल ही में हाथ लगाकर गया था — काई टूटी हुई थी, ताज़ा टूटी हुई।
कालू काका ने लाठी ज़मीन पर रखी और पत्थर को धक्का दिया। वो सरका, और अंदर से ठंडी हवा निकली — ऐसी ठंडी जैसे सालों से किसी ने साँस न ली हो।
"रस्सी," कालू काका ने कहा, और टिंकू ने अपनी कमर से रस्सी खोली।
मैंने कुएँ में झाँका। अंधेरा था। इतना अंधेरा कि आँखें फटी रह गईं।
और तभी मुझे एक आवाज़ आई — पीछे से, घास के बीच से। बहुत धीमी।
"वीर।"
मैं पलटा।
भैरव वहाँ खड़ा था। अकेला। उसके हाथों में कुछ नहीं था। उसकी धोती पर मिट्टी थी और उसके बाल बिखरे हुए थे, जैसे वो दौड़कर आया हो।
"तू कुएँ के पास आया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार वो कड़वाहट नहीं थी जो मैंने अखाड़े में सुनी थी। उसकी आवाज़ थकी हुई थी। "मैं जानता था तू आएगा। मैं तेरे पापा की तरह हूँ — मुझे भी पता था वो आएगा।"
"तुमने उन्हें मारा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।
"मैंने नहीं मारा," भैरव ने कहा। "मैंने बचाया।" उसने एक कदम आगे बढ़ाया। "तेरे पापा कुएँ में गिरे थे। मैंने उन्हें निकाला। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। और जो उन्होंने मुझे अंदर दिखाया — वो मैं किसी को नहीं बता सका। इसलिए मैंने कहानी बदल दी। मैंने खुद को मारने वाला बना लिया, क्योंकि सच्चाई सुनने के लिए ये गाँव तैयार नहीं था।"
मेरे हाथ काँपने लगे। टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा।
"झूठ," टिंकू ने कहा। "तू झूठा है।"
"हाँ," भैरव ने कहा। "मैं झूठा हूँ। पर आज रात मैं तुझे सच दिखाने आया हूँ।" और उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक पुरानी, मुड़ी हुई तस्वीर। "तेरे पापा की आख़िरी निशानी। मैंने इसे सालों छुपाया। अब देख — और फिर बता, मैं तेरा दुश्मन हूँ या तेरे पापा का।"
॥
तस्वीर मेरे हाथ में थी, और भैरव मेरे सामने खड़ा था — आँखों में वो चीज़ लिए जो मैंने कभी उसमें नहीं देखी थी। थकान। गहरी, पुरानी थकान।
पर मैं उसकी आवाज़ में नहीं फँसा। मैंने जेब से हरनाम की हरी कवर वाली कॉपी का एक पन्ना निकाला — वो पन्ना जिस पर भैरव की ही लिखाई में लिखा था, "पहली खुराक — जगदीश। दूसरी — रघुवीर। तीसरी — बारी-बारी।" और नीचे साफ़ अक्षरों में उसका हस्ताक्षर।
"अगर तुमने पापा को बचाया था," मैंने कहा, "तो ये किसकी लिखाई है?"
भैरव ने पन्ने पर नज़र डाली, और उसका चेहरा एक पल के लिए ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसके सीने में आग रख दी हो।
"ये… ये कहाँ से आया?" उसने हाथ बढ़ाया। "दे इसे।"
मैं एक कदम पीछे हटा। "नहीं।"
"वीर, तू नहीं जानता तू किस चीज़ से खेल रहा है।" उसकी आवाज़ भारी होने लगी। "ये काग़ज़ अगर सबने देख लिया, तो जो होगा, तू अकेला नहीं संभाल पाएगा।"
"तो होने दो," मैंने कहा।
और तभी मुझे लगा कि घास के पीछे कुछ हिला। मैं पलटा — नहीं, भीड़ थी। लालटेनें थीं, आवाज़ें थीं। कालू काका ने इससे पहले ही कोई संदेश भेज दिया था, और पूरा गाँव उस नीम के नीचे जमा हो रहा था जहाँ सिर्फ़ हम होने चाहिए थे।
सबसे आगे सुक्खी बुआ थीं, हाथ में पान का बीड़ा, आँखें ऐसी जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो।
"अरे, मैंने तो सुना है कि भैरव भाई रात को कुएँ पर अकेले आते हैं!" उन्होंने आवाज़ ऊँची करके कहा। "देखो, मेरी बात सच निकली।"
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