Spirit of a Fighter – Chapter 211
भैरव हँसा। पर इस बार हँसी देर तक नहीं चली।
"तू?" उसने कहा। "तू क्या है? एक मज़दूर। जिसके पास कपड़े भी नहीं, जो अपनी माँ की चक्की से पेट भरता है —"
"मैं वो हूँ," मैंने कहा, और उसकी बात काटी, "जिसके पास वो चीज़ है जो तेरे पास कभी नहीं थी।"
"क्या?"
"सच।"
मैंने अपनी जेब से गुड़िया की मिट्टी की थैली निकाली और मुट्ठी में भरी। मिट्टी गरम थी — जैसे अभी भी किसी के हाथ से निकली हो।
"ये मिट्टी तेरी नहीं है," मैंने कहा, और उसे ऊपर उठाया। "तूने इसमें ज़हर घोला। तूने इसे बेचने की सोची। पर ये मिट्टी उन लोगों की है जिन्होंने इसमें पसीना गिराया — पापा का पसीना, रघुवीर का पसीना, कालू काका का पसीना, और आज मेरा पसीना।"
मैंने मुट्ठी खोली और मिट्टी हवा में उड़ा दी।
भीड़ में कोई रोया — किसी औरत ने, पीछे कहीं।
"और तीन दिन बाद," मैंने कहा, "मैं इसी मिट्टी में तुझसे लड़ूँगा। बिना पानी। बिना ज़हर। और जो जीतेगा, वो इस अखाड़े का नाम लिखेगा।"
भैरव की आँखें सिकुड़ीं।
"और अगर तू हार गया?" उसने पूछा।
"तो ये मिट्टी तेरी।"
"और अगर तू जीत गया?"
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, बोल, बेटा, जो तेरे दिल में है।
"अगर मैं जीत गया," मैंने कहा, "तो तेरी अलमारी खुलेगी। सबके सामने। और उसमें जो है, वो पूरा गाँव पढ़ेगा।"
भैरव का चेहरा पहली बार सफ़ेद पड़ा। सच में सफ़ेद। जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून खींच लिया हो।
पर वो हँसा। हँसी खोखली थी, पर हँसी थी।
"ठीक है," उसने कहा, और अपनी मुट्ठी भींची, "तीन दिन बाद। इसी मिट्टी में। और उस दिन के बाद, इस गाँव में या तो वीर सिंह रहेगा, या भैरव सिंह।"
वो मंच से उतरा। उसकी धोती मिट्टी में घसीटती रही। किसी ने रास्ता दिया। पर भीड़ में से कोई बोला — कोई औरत, तेज़ आवाज़ में —
"जीतेगा तो वीर ही।"
भैरव रुका। पलटा। पर कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ देखा, और चला गया।
मंच पर अब कोई नहीं था। बस रणवीर सिंह कुर्सी पर बैठे थे, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो हँस रहे थे — बिना आवाज़, बस होंठ काँप रहे थे।
मीरा मंच पर चढ़ी, दौड़कर अपने पापा के पास गई, और उनके पैरों पर सिर रख दिया।
मैंने नीचे देखा। माँ मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने कभी नहीं देखा — गर्व, और डर, दोनों एक साथ, जैसे दीये की लौ हवा में।
गुड़िया मेरी तरफ़ दौड़ी और मेरी कमर से लिपट गई।
टिंकू ने अपनी डिब्बी खोली। मिठाई की गंध फैल गई। और पहली बार उस रात किसी ने हँसकर कहा —
"अरे, खाना तो ठंडा हो रहा है।"
भीड़ हँसी। कोई रोया। कोई थाली उठाकर चल पड़ा। दीये जलते रहे।
पर मैं वहीं खड़ा रहा, मंच के नीचे, नंगे पैर, पापा की धोती में, और मेरी मुट्ठी में मिट्टी की बची हुई गरमी थी।
क्योंकि मैं जानता था — भैरव ने हँसकर नहीं हारा था। वो बस पीछे हटा था। और जो आदमी हँसकर पीछे हटता है, वो कभी खाली हाथ नहीं हटता।
तीन दिन। तीन रात।
और मैंने ठान लिया — तीन रात भैरव सो नहीं पाएगा।
॥
मैं वहीं खड़ा था, मुट्ठी में मिट्टी की गरमी दबाए, और भीड़ धीरे-धीरे खाली हो रही थी। दीये अब भी जल रहे थे, पर उनकी लौ पहले जैसी नहीं थी — जैसे हवा ने उनसे कुछ छीन लिया हो।
तभी मंच पर भैरव फिर चढ़ा।
मैंने सोचा था वो जा चुका। पर नहीं। वो सीढ़ियों से ऊपर आया, धीरे-धीरे, जैसे कोई तमाशा देखने आ रहा हो। उसके हाथ में अब कोई काग़ज़ नहीं था, बस उसकी उँगलियाँ थीं — मोटी, सोने की अंगूठी वाली, जो अब भी मुट्ठी में भरी थीं।
उसने माइक उठाया। उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। अब उसमें वो गुड़ नहीं था। अब वो सिर्फ़ ठंडी थी, साफ़, जैसे कुएँ का पानी।
"रामपुर वालो," उसने कहा, "एक ज़रूरी बात।"
भीड़ रुकी। जो जा रहे थे, वो पलटे।
"आप सब जानते हैं रणवीर सिंह की हालत क्या है।" उसने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया, जहाँ मीरा के पापा बैठे थे। "उनके पैर काम नहीं करते। दिमाग़ भी अब पहले जैसा नहीं। डॉक्टर कहते हैं आराम चाहिए।"
मेरे पेट में कुछ मुड़ा। मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"तो आज से," भैरव ने कहा, "रणवीर सिंह के नाम पर अखाड़े का हिसाब-किताब मैं खुद संभालूँगा। ज़मीन, पैसा, भर्ती, मुकाबले — सब। ये उन्हीं की भलाई के लिए है।"
भीड़ में खुसफुसाहट उठी। कोई बोला, "ये तो पहले से ही सब करता है।" कोई बोला, "अब तो नाम भी अपना कर लेगा।"
भैरव ने हाथ उठाकर सब चुप कराया। फिर वो मुड़ा — मीरा की तरफ़।
"और बेटी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो नरमी आ गई जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती थी, "तू अब यहाँ मत आया कर। तेरी पढ़ाई है, तेरा काम है। अखाड़ा लड़कों का काम है, लड़कियों का नहीं। लड़की का काम घर है। तेरे पापा की देखभाल कर।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस अपने कानों में सुनाई दी।
मीरा खड़ी थी — मंच के नीचे, अपने पापा की कुर्सी के पास। उसके हाथ में अब भी वो टूटी घड़ी थी जो उसने मुझे दी थी।
वो नहीं हिली। एक पल के लिए मुझे लगा वो चुप रहेगी।
फिर वो आगे बढ़ी।
उसने सीढ़ियाँ चढ़ीं। एक-एक करके, बिना जल्दी। मंच पर पहुँचकर वो भैरव के सामने खड़ी हो गई — और मुझे याद आया कि वो मुझसे उम्र में छोटी है, पर उस पल वो मुझसे भी बड़ी लगी।
"भैरव चाचा," उसने कहा। उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस साफ़ थी। इतनी साफ़ कि आख़िरी कतार तक पहुँच गई। "ये अखाड़ा मेरे पापा का है। उन्होंने इसे अपने हाथों से बनाया — उस वक़्त जब आप कहीं और थे। और मैं इसकी बेटी हूँ। मुझे यहाँ से कोई हटा नहीं सकता — न आप, न कोई और।"
भैरव मुस्कुराया। वो मुस्कान जो गुड़ जैसी दिखती है पर दाँतों तक नहीं पहुँचती।
"बेटी," उसने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि लगा बस मीरा के लिए बोल रहा है, "तेरे पापा की दवा… महीने के दो हज़ार आठ सौ रुपये। शहर से आती है। और वो पैसा? वो इसी अखाड़े से आता है। जिसका हिसाब मैं रखता हूँ।"
मीरा का चेहरा नहीं बदला। पर मैंने देखा — उसकी उँगलियाँ घड़ी पर कस गईं।
"तो तू सोच," भैरव ने कहा, "बोलने से पहले।"
और तभी — मैंने वो आवाज़ सुनी जो मैंने कभी नहीं सुनी थी।
कुर्सी की आवाज़। चरमराहट। धातु की, पुरानी, जो बीस साल से नहीं बोली थी।
रणवीर सिंह अपनी कुर्सी में हिल रहे थे। उनके हाथ आर्मरेस्ट पर कस रहे थे — नसें उभर आई थीं, गर्दन की, बाँहों की। उनका चेहरा लाल था, और उनके होंठ काँप रहे थे, और उनकी आँखों में वो आग थी जो बीस साल से दबी थी।
वो कुछ बोलना चाहते थे। पर आवाज़ नहीं निकली — बस खाँसी निकली, सूखी, फटी हुई।
मीरा दौड़कर उनके पास गई। उसने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा, पापा, रुकिए।"
मैं आगे बढ़ा।
पता नहीं कहाँ से हिम्मत आई। मंच के नीचे खड़े होकर मैंने आवाज़ उठाई — बिना माइक, बस अपने गले से, जितनी तेज़ आ सकी।
"भैरव सर!"
वो रुका। मुड़ा।
"एक बात पूछनी है," मैंने कहा। "जो पहलवान आपका पानी पीते हैं — वो कुछ महीनों में बीमार क्यों पड़ जाते हैं?"
अखाड़े में जो सन्नाटा था, वो अब जम गया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno