Spirit of a Fighter – Chapter 210
"तो चल," मैंने कहा।
रात के नौ बजे हम अखाड़े के गेट पर खड़े थे। अंदर से दीयों की रोशनी आ रही थी — दर्जनों दीये, दीवारों पर, मिट्टी के किनारों पर, मंच के चारों कोनों पर। और भीड़। पूरा रामपुर जुटा था। औरतें अपने बच्चों के साथ, बूढ़े लाठी टेककर, नौजवान झुंड बनाकर। सबके हाथ में थाली और सबकी आँखों में वो नरमी थी जो लड़ाई से पहले नहीं, खाने से पहले आती है।
मैंने पापा की धोती पहनी थी। सफ़ेद, पर उम्र से पीली पड़ चुकी थी, किनारे पर लाल किनारी। माँ ने कहा था इसे पहनकर उतरना। और मैंने पहनी थी।
मेरे बगल में मीरा थी, कुर्ता-सलवार में, कंधे पर बैग, और उस बैग में वो किताब जिसमें पीला काग़ज़ था। माँ मेरे पीछे थीं, गुड़िया उनका हाथ पकड़े। टिंकू सबसे पीछे, डिब्बी सीने से लगाए।
हम अंदर घुसे। किसी ने हमें रोका नहीं। किसी ने पहचाना। फुसफुसाहटें फैलने लगीं।
"वो वीर है…"
"माँ भी आई है…"
"ये लड़की कौन है?"
"ये तो अखाड़े की बेटी है, मालिक की…"
मैंने सीधे मंच की तरफ़ देखा। भैरव खड़ा था, हाथ जोड़े, सबका स्वागत कर रहा था। और उसके पीछे, कुर्सी पर, रणवीर सिंह बैठे थे। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी आँखें ज़िंदा थीं — वो भीड़ को देख रही थीं, एक-एक चेहरा, एक-एक थाली।
मैं भीड़ से आगे बढ़ा। लोग हटते गए। मैंने मंच के सामने आकर अपने जूते उतारे — जूते, जो मैंने पहली बार पहने थे, जो माँ ने किसी कीमत पर मँगाए थे — और नंगे पैर सीढ़ी चढ़ा।
भैरव ने मुझे देखा। उसकी मुस्कान जम गई, पर हटी नहीं।
"अरे," वो बोला, आवाज़ में वही गुड़ वाली मिठास, "हमारे वीर सिंह! आओ, आओ। मैं तो सोच ही रहा था कि तू नहीं आएगा। सुना था तेरी दुकान जल गई — मतलब तेरे दोस्त की — तो सोचा, लज्जत तो बाकी है कि नहीं।"
मैंने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। मैं सीधा उसके पीछे गया, जहाँ रणवीर सिंह बैठे थे। मैंने उनके सामने घुटने टेके, और उनके पैर छुए।
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
रणवीर सिंह का हाथ मेरे सिर पर आया। काँपता हुआ, भारी हाथ, जिसमें बीस साल की थकान थी। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे ऊपर खींचा।
"उठ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज थी जिसकी सुक्खी बुआ बातें करती थीं। "मैं जानता था तू आएगा।"
उनकी आँखों में पानी था। मैंने पहली बार किसी बुज़ुर्ग मर्द को रोते देखा — बिना आवाज़, बस आँखें भरी हुईं।
"पर एक बात," उन्होंने धीरे कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुन सकूँ, "आज रात जो भी हो, तू उस थाली में हाथ नहीं लगाएगा। और अपनी माँ को भी मत लगाने देगा। भैरव का खाना आज ज़हर से नहीं, सवाल से बना है। और सवाल का जवाब तलवार से नहीं, आवाज़ से देते हैं।"
मैंने सिर हिलाया।
भैरव ने हमारी तरफ़ देखा। उसकी आँखें ठंडी थीं, पर मुस्कान अब भी थी — जैसे किसी ने चेहरे पर मुखौटा चिपका दिया हो।
"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ लाउडस्पीकर में फैल गई, "अब जब सब जुटे हैं, तो एक छोटी-सी बात। आज खाने से पहले मैं तुम सबको कुछ बताना चाहता हूँ।"
वो ताली बजाने के लिए अपने हाथ ऊपर उठाने ही वाला था कि उसकी नज़र मीरा पर पड़ी — मीरा जो मंच के नीचे खड़ी थी, अपनी माँ के पास, और उसके पीछे सरस्वती खड़ी थीं, सिर पर शादी की साड़ी, माथे पर हल्दी का टीका।
भैरव के हाथ रुक गए।
उसने एक पल के लिए आँखें सिकोड़ीं, जैसे कोई पुरानी बात याद आ रही हो। फिर वो हँसा — हँसी नहीं, खाली आवाज़।
"हाँ तो," उसने कहा, और ताली बजा दी, "मैंने तय किया है कि अखाड़े का अगला मालिक कौन होगा।"
पूरा अखाड़ा सन्न रह गया। किसी ने साँस नहीं ली।
"और वो मीरा नहीं होगी।"
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। रणवीर सिंह की उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर जम गईं। माँ ने धीरे से गुड़िया का हाथ कसकर पकड़ लिया।
भैरव ने भीड़ को देखा, धीरे-धीरे, एक-एक चेहरा, जैसे कोई गिन रहा हो।
"अखाड़ा मेरा है," उसने कहा। "मैंने इसे बीस साल पाला है। और मेरे बाद इसे वो संभालेगा जो इसकी मिट्टी का हक़दार है।"
उसने अपना हाथ उठाया और मंच के किनारे पर खड़े एक आदमी की तरफ़ इशारा किया। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
लुट्टन था। सिर पर पगड़ी, गले में फूलों की माला, और चेहरे पर वो डरा हुआ गर्व जो किसी को अचानक मिली चीज़ पर आता है।
"लुट्टन," भैरव ने कहा, "मेरा चेला। मेरा हाथ। मेरा बेटा।"
भीड़ में हल्की-सी बड़बड़ाहट उठी। किसी ने कुछ कहा, कोई हँसा।
और तभी लुट्टन आगे आया — पर मंच के किनारे तक। उसने भैरव की तरफ़ देखा, फिर नीचे भीड़ की तरफ़। उसका चेहरा अजीब-सा था। जैसे कोई बहुत देर से सोच रहा हो कि क्या बोले।
"गुरुजी," उसने धीरे कहा, और उसकी आवाज़ काँपी, "मैं — मैं ये नहीं चाहता।"
भैरव का हाथ हवा में रुक गया।
"क्या?"
"मैं ये पद नहीं चाहता," लुट्टन ने कहा, थोड़ी आवाज़ में, पर अब साफ़। "मैं बीस साल से आपका पानी पी रहा हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं सुबह उठकर। मेरी आँखें धुँधली हो गई हैं। मैं कुश्ती में गिरता हूँ तो उठता नहीं। मैं मर रहा हूँ, गुरुजी। मैं अखाड़े का मालिक नहीं बनना चाहता। मैं ज़िंदा रहना चाहता हूँ।"
भीड़ में सन्नाटा। इतना गहरा कि दीयों की लौ की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
भैरव का चेहरा बदल गया। वो मुस्कान जो बीस साल से चिपकी थी, पहली बार हटी — और उसके नीचे कुछ और दिखा। कुछ ठंडा। कुछ जो कुएँ जैसा था।
"तूने मेरा पानी पिया," भैरव ने धीरे कहा, "और अब तू मेरे सामने ऐसा बोल रहा है?"
"मैंने पिया," लुट्टन ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में डर नहीं, थकान थी। "बीस साल से पीया। और आज वीर ने सबके सामने बताया कि उसमें क्या है। मैंने भी सुना था — दीवार के पीछे से, जब वो बोल रहा था। मैंने सुना कि ग्यारह आदमी मरे। मैंने सुना कि मेरी उम्र खा रहा है वो पानी।"
उसने अपने हाथ आगे किए। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं — वो कँपकँपी जो बीमारी की नहीं, सच बोलने की होती है।
"गुरुजी, मैं आपका आदमी हूँ," उसने कहा, "पर अब आपका पानी नहीं पिऊँगा। और मैं इस मंच पर खड़ा नहीं रहूँगा।"
वो मंच से नीचे उतरा। भीड़ ने उसे रास्ता दिया। वो धीरे-धीरे चला, जैसे बोझ उतारकर, और भीड़ में घुल गया।
भैरव मंच पर अकेला खड़ा रह गया।
उसने अपनी मूँछों को छुआ — वो हरकत जो वो तब करता था जब गुस्सा आ रहा हो — और फिर उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि बस आगे के लोग सुन सकें, पर लाउडस्पीकर उसकी आवाज़ पकड़ चुका था:
"ठीक है। तो अखाड़े का मालिक कोई नहीं होगा।"
उसने एक काग़ज़ निकाला — मोटा, मुड़ा हुआ, मुहर लगा — और ऊपर उठाया।
"अखाड़े की ज़मीन सरकार की है। और मैंने उसका ठेका खरीद लिया है। आज से तीन दिन बाद, इस मिट्टी पर कोई नहीं उतरेगा। मैं इसे बेच दूँगा। यहाँ एक गोदाम बनेगा।"
माँ की आवाज़ मेरे कान में आई, धीमी पर साफ़ — "अब बोल, बेटा। अब नहीं तो कभी नहीं।"
मैंने एक कदम आगे रखा।
"भैरव सिंह," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ तेज़ नहीं थी। पर अखाड़े की मिट्टी ने उसे पकड़ लिया — वो मिट्टी जिसमें आज सुबह मैंने अपना पहला पसीना गिराया था, जिसमें पापा का खून था, जिसमें बीस साल का ज़हर दबा था।
भैरव ने पलटकर देखा।
"जब तक मेरे पैरों में ताकत है," मैंने कहा, "इस मिट्टी पर गोदाम नहीं बनेगा।"
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