Spirit of a Fighter – Chapter 207
"बुआ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़ोर था जो सिर्फ़ सच्ची बात में होता है, "उस खाने में ज़हर है। वो सबको मार देगा। जो भी खाएगा, वो बीमार पड़ जाएगा — जैसे मेरे पापा पड़े हैं, जैसे गाँव के ग्यारह पहलवान पड़े थे।"
बाहर एकदम चुप्पी छा गई।
फिर सुक्खी बुआ की आवाज़ आई, और इस बार उसमें वो चमक नहीं थी जो हमेशा रहती थी। सिर्फ़ डर था।
"तू… तू सच कह रही है, बिटिया?"
"मेरे पापा ने अपनी लिखाई में लिखा है," मीरा ने कहा। "काग़ज़ मेरे हाथ में है।"
फिर एक और आवाज़ आई — कोई आदमी था, भारी आवाज़। "तो क्या करें?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
"दरवाज़ा खोलो," मैंने कहा। "और अंदर आ जाओ। हमें सबको साथ लेकर नौ बजे से पहले अखाड़े पहुँचना है।"
दरवाज़ा खुला। बाहर लालटेनों की रोशनी से पूरा आसमान पीला लग रहा था। सुक्खी बुआ सबसे आगे खड़ी थीं, उनकी साड़ी का पल्लू कीचड़ में लगा हुआ था, पान का बीड़ा हाथ से गिर चुका था, और उनके चेहरे पर ऐसा डर था जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा।
उनके पीछे — किसान, बढ़ई, दो बुनकर, नाई, कुछ औरतें, तीन-चार बच्चे। सबके हाथ में लालटेनें। सबने सुना था जो मीरा ने कहा था।
मीरा बाहर निकली। उसने अपनी आयुर्वेद की किताब खोली और उसमें से वो पतला काग़ज़ निकाला, और उसे सुक्खी बुआ के हाथ में रख दिया।
"ये मेरे पापा की लिखाई है," उसने कहा। "जो पढ़ सकता है, पढ़ ले। और फिर मुझे बताए कि मैं झूठ बोल रही हूँ या नहीं।"
सुक्खी बुआ ने काग़ज़ को आँखों से दूर करके पकड़ा, फिर पास लाकर। उनके होंठ हिले। और फिर उन्होंने सिर उठाया।
"अरे मैंने तो सुना है…" वो रुकीं। उन्होंने एक बार अपना गला साफ़ किया। "नहीं। मैंने नहीं सुना। मैंने देखा है। ये रणवीर सिंह की लिखाई है। मैंने उनके हाथ से बीस साल पहले एक पर्ची देखी थी — यही अक्षर।"
टिंकू पीछे से आया, और उसने अपना हाथ सुक्खी बुआ के कंधे पर रखा।
"बुआ," उसने कहा, "अगली बार जो सुनो, पहले मुझे बता देना।"
सुक्खी बुआ ने उसे घूरा, और फिर हँसी — ऐसे हँसी जैसे कोई डर से बाहर निकलकर हँसता है। और उसके पीछे बाकी लोग भी हँसने लगे — थोड़ा सा, काँपते हुए, पर हँसे।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के पास खड़े थे, और उनकी आँखें गीली थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा। और आज रात ये लोग भी नहीं झूठ बोलेंगे।"
मैंने सबको इकट्ठा किया। बीस से ज़्यादा लोग थे — गाँव के आम आदमी, जो कभी अखाड़े की मिट्टी को छूने की हिम्मत नहीं करते थे, आज रात अखाड़े की तरफ़ जाने वाले थे।
"सुनो," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सबसे ऊँची नहीं थी, पर सबने सुना। "हम अभी अखाड़े नहीं जाएँगे। हम पहले उन पहलवानों के घर जाएँगे जो भैरव का पानी पी चुके हैं। उन्हें बताएँगे कि उनके साथ क्या हो रहा है। फिर हम सब मिलकर नौ बजे अखाड़े पहुँचेंगे। और भैरव का खाना कोई नहीं खाएगा।"
"अगर वो ज़बरदस्ती करे?" एक बूढ़े आदमी ने पूछा।
"तो हम सब एक साथ खड़े होंगे," मीरा ने कहा। "वो एक आदमी है। हम सौ हैं।"
"और उसके आदमी?" किसी और ने पूछा।
"उसके आदमी भी उसका ज़हर पी चुके हैं," मैंने कहा। "वो भी मर रहे हैं। जब उन्हें पता चलेगा कि उनके साथ क्या हो रहा है, तो वो भैरव के साथ नहीं खड़े होंगे।"
सुक्खी बुआ ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा, जैसे कोई युद्ध से पहले अपनी तलवार कसता हो। "मैं कमला के घर जाऊँगी," उन्होंने कहा। "उसकी बहू सब जानती है। वो गवाही देगी।"
"और मैं हरनाम के दफ़्तर," टिंकू ने कहा। "उसकी कॉपी हमारे पास है, पर उसके आदमी को भी बताना होगा।"
"मैं लुट्टन के घर जाऊँगा," कालू काका ने कहा। "वो बीमार है, पर उसके कान अभी सुनते हैं। और वो आज रात सच बोलेगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे पास खड़ी थी, काग़ज़ उसकी किताब में वापस, और उसकी आँखें अब सूखी थीं।
"मैं अपने पापा के पास जाऊँगी," उसने कहा। "उन्हें सब बताऊँगी। वो आज रात उस खाने में होंगे — और मुझे उन्हें रोकना है।"
"मैं तेरे साथ चलूँगा," मैंने कहा।
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "तू अपनी माँ के पास जा। उसे बता। वो भैरव से सबसे पहले लड़ी थी — बीस साल पहले। आज रात उसे बाहर आना होगा।"
मैंने सोचा। माँ। चारपाई पर बेसुध पड़ी थीं जब मैं निकला था। गुड़िया उनके पास थी।
"ठीक है," मैंने कहा। और फिर मेरे मुँह से एक बात ऐसी निकल गई जो मैंने सोची नहीं थी। "मीरा — तेरे पापा को आज रात अकेले मत छोड़ना। भैरव अगर होशियार है, तो वो तेरे पापा को अपने पास बुलाएगा। और अगर तेरे पापा उसके पास गए…"
मीरा ने मेरी बात काट दी। "तो मैं उनके साथ जाऊँगी।"
"मीरा…"
"वीर, मैं बचाई जाने वाली लड़की नहीं हूँ।" उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो लोहा था जो मैंने पहली बार अखाड़े के बाहर देखा था जिस दिन उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था। "मेरे पापा बीस साल से मेरे लिए चुप हैं। आज रात मैं उनके लिए कुछ करूँगी।"
मैं हार गया। और सच कहूँ, तो मुझे हारना अच्छा लगा।
लोग बिखर गए — अपनी-अपनी दिशाओं में, लालटेनें हाथ में। सुक्खी बुआ ने जाते-जाते मेरा हाथ पकड़ा और ज़ोर से दबाया। उनकी हथेली में पान की महक थी, और उँगलियाँ ठंडी थीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं पचास साल से गाँव की बातें बढ़ा-चढ़ाकर बताती आई हूँ। आज जो बताऊँगी, वो सच होगा। और सच में कभी-कभी ज़्यादा ज़ोर लगाना पड़ता है।"
वो चली गईं, अपनी साड़ी सँभालती हुई।
मैं मीरा के साथ कुछ कदम चला। नीम के पेड़ के पास हम रुके।
"मैं नौ बजे अखाड़े पहुँचूँगा," मैंने कहा। "माँ और गुड़िया के साथ।"
"मैं पापा के साथ पहुँचूँगी," उसने कहा। "और वीर — अगर भैरव वहाँ कुछ करे…"
"तो मैं तेरे पापा की टूटी घड़ी चलती हुई लौटाऊँगा," मैंने कहा। "तूने वादा लिया था। मैं वादा निभाऊँगा।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे गाल पर रख दिया। उसकी हथेली में औषधि की गंध थी — तुलसी, अदरक, काली मिर्च। और मेरे दिल ने एक ज़ोर का धक्का मारा, जैसे किसी ने मेरे सीने के अंदर ढोल बजा दिया हो।
"तेरे हाथ ठंडे हैं," मैंने कहा। बस यही कह पाया।
"तेरे होंठ सूख रहे हैं," उसने जवाब दिया। "पानी पी लेना।"
और वो मुड़कर चली गई, अपनी किताबों का बैग कंधे पर, उसकी परछाईं लालटेन की रोशनी में लंबी हो गई।
मैं अपने घर की तरफ़ भागा। रास्ते में मेरे पैर कीचड़ में धँसते रहे, पर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ा। मेरे दिमाग़ में एक ही बात थी — माँ। और वो खाना। और भैरव का वो लाउडस्पीकर जिसने पूरे गाँव को बुलाया था। जैसे किसी ने जाल बिछाया हो और चारों तरफ़ से लोगों को उसमें धकेलना शुरू कर दिया हो।
घर पहुँचा तो माँ चारपाई पर बैठी थीं। गुड़िया उनके पैर दबा रही थी। माँ का चेहरा पीला था, पर आँखें खुली थीं।
"देर लगा दी," माँ ने कहा। न डाँट, न शिकायत। बस एक हिसाब।
"माँ," मैंने कहा, और उनके पैरों के पास बैठ गया। "मीरा के पापा ने काग़ज़ छोड़ा है। उन्हें बीस साल से ज़हर दिया जा रहा है। वो जानते थे। और वो चुप थे — मीरा को बचाने के लिए।"
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