Spirit of a Fighter – Chapter 206
"इससे पहले कि वो आए," मीरा ने कहा, "मुझे वो घड़ी दो।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर आज रात हममें से कोई न लौटे, तो ये घड़ी उसके पास रहनी चाहिए जो हमारी बात बता सके।"
मैंने जेब से टूटी घड़ी निकाली। उसका पीतल का ढक्कन ठंडा था, और किनारे पर एक छोटा-सा खुरचा हुआ निशान था जो मैंने पहले नहीं देखा था। मैंने उसे मीरा के हाथ में रख दिया।
मीरा ने घड़ी को दीये की रोशनी में उठाया। उसने अपने नाखून से पीछे का ढक्कन खोलने की कोशिश की। वो हिला नहीं।
"काका, कोई छुरी है?" उसने पूछा।
कालू काका ने अपनी कमर से एक छोटा-सा लोहे का औज़ार निकाला, जैसे मोची चमड़ा काटने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
मीरा ने उस औज़ार की नोक ढक्कन के किनारे में लगाई, और ज़ोर दिया।
ढक्कन खुला, पर उसमें से कुछ गिरा नहीं। अंदर, घड़ी की कल के ऊपर, एक पतला मुड़ा हुआ काग़ज़ दबा हुआ था — इतना पतला कि जैसे कोई बीड़ी का काग़ज़ हो।
मीरा ने उसे बड़ी सावधानी से निकाला। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने काग़ज़ खोला, और दीये की रोशनी में उस पर लिखी बात पढ़ने लगी।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"क्या है?" मैंने पूछा।
वो बोली नहीं। बस काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
लिखाई पुरानी थी, स्याही हल्की पड़ गई थी, पर अक्षर साफ़ थे। जैसे किसी ने बहुत जल्दी में लिखा हो, पर हर शब्द पर पूरा ज़ोर लगाया हो।
मेरी दवा की शीशी कभी मत बदलना। पर अगर मैं बोल न सकूँ, तो जान लो कि जो शीशी भैरव भेजे, वो ज़हर है। मेरी बेटी, मैं तुझे बचाने के लिए चुप हूँ।
मैंने दो बार पढ़ा। तीसरी बार पढ़ते हुए मेरा गला सूख गया।
कालू काका ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा, और उन्होंने अपना मुँह फेर लिया। टिंकू ने एक कदम पीछे हटकर दीवार को हाथ लगा दिया, जैसे उसे सहारा चाहिए था।
मीरा ने काग़ज़ अपने सीने से लगा लिया। उसके कंधे हिलने लगे। पहले धीरे, फिर तेज़। और फिर वो रो पड़ी — ऐसे रोई जैसे बहुत दिनों से रोना रोका हुआ था। कोई आवाज़ नहीं, बस साँस फूलती गई और आँसू दीये की लौ पर गिरते रहे।
मैं उसके पास खड़ा रह गया। क्या करता? क्या कहता? मेरे पास कोई शब्द नहीं था। मेरे पापा की भी ऐसी ही कहानी थी — चुप रहे, सब जानते हुए भी चुप रहे, और मर गए। और मेरी माँ ने बीस साल तक चक्की चलाकर उस चुप्पी की कीमत चुकाई थी।
मैंने धीरे से मीरा का हाथ पकड़ा। उसने अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में दबा दीं। और मैंने महसूस किया — उसकी हथेली में पसीना था, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"तेरे पापा ने मेरे पापा की तरह चुप्पी में लड़ाई लड़ी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी, पर साफ़। "और मेरी माँ कहती है — चुप्पी की लड़ाई सबसे महँगी होती है। पर वो लड़ाई भी होती है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, और नाक भी, और वो अपनी आवाज़ सँभालने की कोशिश कर रही थी, पर सँभल नहीं रही थी।
"मेरे पापा ने मुझे कभी नहीं बताया," उसने कहा। आवाज़ टूटी हुई। "मैं आयुर्वेद पढ़ती रही, दवाइयाँ बनाती रही, और मेरे पापा मेरे सामने ज़हर पीते रहे। और मैं मूर्ख… मैं देखती रही, और कुछ नहीं समझी।"
"तू मूर्ख नहीं है," मैंने कहा। "तू बेटी है। और पापा बेटियों से ऐसी बातें नहीं कहते। वो खुद सहते हैं, और हमें हँसते हुए दिखते हैं।"
मीरा ने काग़ज़ को अपनी आयुर्वेद की किताब में रखा — उसी मोटी किताब में जिसमें पीला काग़ज़ पहले से छिपा था। उसने किताब के पन्नों को करीब से दबाया, जैसे उसमें कुछ और भी हो जो वो सब देख नहीं पा रही थी।
"अब मैं पापा को सच बताऊँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद लौट आई जो मैं जानता था। "आज रात। उस खाने से पहले जो भैरव दे रहा है।"
"और पुलिस?" टिंकू ने पूछा। "हमारे पास इतना कुछ है — कॉपी, काग़ज़, डायरी…"
"पुलिस नहीं," मैंने कहा। "माँ कहती है भैरव के पुलिस में आदमी हैं। हम उनके पास जाएँगे तो वो हमें ही अंदर कर देंगे और सबूत गायब कर देंगे।"
"तो?"
"पंचायत," मीरा ने कहा। उसने अपनी आँखें पोंछ लीं, और मुझे लगा जैसे उसने अपना पूरा दुख एक कोने में रख दिया हो, किसी और वक़्त के लिए। "पूरे इलाक़े के पहलवान। जो भी भैरव का पानी पी चुके हैं — वो सब। अगर सब एक साथ खड़े हों, तो भैरव किसी को अकेले नहीं मार सकता।"
कालू काका ने धीरे से सिर हिलाया। "बात तो सही है। पर पंचायत बुलाने में वक़्त लगता है। और भैरव… भैरव वक़्त नहीं देगा।"
तभी बाहर से आवाज़ आई। दूर से, धुंध से होकर, पर साफ़।
"अरे! अरे सुनो ज़रा! ओ भाई! सब सुनो!"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने दरवाज़े की तरफ़ मुँह फेरा।
"ये तो…" टिंकू ने कहा।
"सुक्खी बुआ," मैंने कहा।
और वो सच में सुक्खी बुआ थीं। उनकी आवाज़ अगर कभी किसी ने सुनी है, तो एक बार सुनकर भूलना मुश्किल है — जैसे किसी ने बाज़ार की घंटी में तेज़ आवाज़ वाला लाउडस्पीकर लगा दिया हो। वो आ रही थीं, और साथ में पूरा गाँव ला रही थीं — कम से कम बीस आदमी, कुछ औरतें, बच्चे भी, सब लालटेनें लिए।
कालू काका उठे और दरवाज़े की तरफ़ भागे। दरवाज़ा बाहर से बंद था, पर उन्होंने किवाड़ पर हाथ मारा।
"बुआ! बुआ, यहाँ!"
"अरे! अरे ये कालू की आवाज़ है! कालू, तू कहाँ है? अरे मैंने तो सुना है…"
"बुआ, दरवाज़ा खोलो!" मीरा ने कहा, आवाज़ ऊँची करके। "कुएँ के पीछे वाला पत्थर का दरवाज़ा। किवाड़ बाहर से बंद है!"
बाहर से खलबली मची। लालटेनों की रोशनी दरवाज़े की दरारों से अंदर आने लगी। और फिर सुक्खी बुआ की आवाज़, इतनी तेज़ कि तहखाने की दीवारें हिल गईं:
"अरे मैंने तो सुना है कि भैरव आज रात अखाड़े में सबको खाना खिलाने वाला है! और उसमें कुछ गड़बड़ है! क्योंकि जो आदमी बारह साल में किसी को एक गिलास पानी तक नहीं देता, वो अचानक खाना क्यों बाँट रहा है? अरे मैंने तो ये भी सुना है कि उसने बाज़ार से दो बोरी रसगुल्ले मँगाए हैं, और रसगुल्ले में कुछ मिलाया है! कमला की बहू ने अपनी आँखों से देखा है!"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े की दरार से बाहर झाँक रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे — एक नाम पढ़ रहे थे।
"कमला," उसने फुसफुसाया। "वही बुढ़िया। जिसने माँ को ज़हर दिया था।"
बाहर से किवाड़े पर लोहे की छड़ पड़ने की आवाज़ आई। कुछ आदमी दरवाज़ा उठाने की कोशिश कर रहे थे।
"अंदर से रगड़ है!" किसी ने कहा।
"तो ज़ोर लगाओ!" सुक्खी बुआ चिल्लाईं। "अरे ये नया किवाड़ा नहीं है, पुराना है, टूट जाएगा!"
दरवाज़ा हिला। कालू काका ने अंदर से अपना कंधा लगा दिया। टिंकू भी आकर लग गया। और मैं — मैं वहीं खड़ा रह गया, क्योंकि मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी।
भैरव आज रात खाना खिला रहा है। सबको। और उस खाने में कुछ मिला है।
"रुको!" मैंने कहा। मेरी आवाज़ इतनी ऊँची निकली कि मीरा चौंक गई।
दरवाज़े पर ज़ोर लगाना रुका।
"बुआ," मैंने कहा, दरवाज़े के पास जाकर, "क्या खाना अभी शुरू हुआ है?"
"अरे नहीं! अभी तो भैरव ने लाउडस्पीकर से बोला है — 'आज रात नौ बजे, अखाड़े में सबको खाना।' और अभी तो… अभी तो सात ही बजे हैं! मैं तो पहले ही भागकर सबको बता रही हूँ!"
"तो सब नौ बजे जाएँगे?"
"क्यों नहीं जाएँगे? मुफ़्त का खाना है! पर मैंने तो सुना है कि उसमें…"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno