Spirit of a Fighter – Chapter 205
"मैंने आज सुबह खीर नहीं बनाई।"
मैं हँसा। बिना वजह। बुरे वक़्त में हँसी आती है, और वो हँसी सबसे ज़रूरी होती है।
"तो कल बना लेना," मैंने कहा।
हम नहर के किनारे-किनारे चलने लगे। धुंध हमारे पीछे छूट रही थी, और वो दो लालटेनें दूर हो रही थीं — शायद उन्होंने हमें देखा नहीं था, या शायद वो किसी और रास्ते पर मुड़ गई थीं।
पर जब मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा, तो धुंध में एक परछाई खड़ी थी। लंबी। चौड़ी। हिल नहीं रही थी।
भैरव।
या शायद सिर्फ़ पीपल का पेड़।
मैंने अपनी नज़रें सामने कर लीं। और चलता रहा।
अखाड़े के पीछे वाला रास्ता पतला था, काँटों से भरा। कालू काका ने कहा था कि नीम के पेड़ के पीछे से एक सूखी नाली जाती है, और उसी नाली से होकर कुएँ के पीछे पहुँचा जा सकता है। मैंने वही ढूँढा।
रास्ते में टिंकू ने एक बार फुसफुसाकर पूछा, "वीर, तूने सोचा है अगर घड़ी में कुछ नहीं हुआ तो?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा पसीने से भरा था, पर होंठ मुस्कुरा रहे थे।
"तो हमारे पास कॉपी है," मैंने कहा। "और हरनाम है। और तेरी खीर। बहुत है।"
"बहुत है," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ में यकीन आ गया।
नीम का पेड़ आया। उसके पीछे सूखी नाली — जिसमें अब बारिश का पानी भरा था, पर चलने लायक थी।
और नाली के आगे, धुंध में, अखाड़े की पीली दीवार दिखी। और उसके पीछे, कुएँ की ओर जाता हुआ वो पत्थर का रास्ता।
मैंने एक गहरी साँस ली।
"चल," मैंने कहा।
हम तीनों नाली में उतर गए। पानी मेरी पिंडली तक आया, ठंडा। मीरा ने अपनी सलवार पकड़ी और चलने लगी। टिंकू ने अपनी टोपी सँभाली।
और जब हम कुएँ के पीछे वाले हिस्से में पहुँचे, तो मैंने देखा — पत्थर का वो दरवाज़ा जिसे कालू काका ने दिखाया था, अब खुला हुआ था।
अंदर से रोशनी आ रही थी। हल्की, पीली।
मेरे पैर ठिठक गए।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंदर कोई है," उसने धीरे से कहा।
मैंने सिर हिलाया। और फिर, बिना एक शब्द बोले, हम तीनों उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। मेरी मुट्ठी में कॉपी थी, मीरा के बैग में घड़ी थी, और टिंकू के हाथ में एक ईंट थी जो उसने रास्ते से उठाई थी।
दरवाज़े के अंदर, लालटेन की रोशनी में, एक आदमी बैठा था। सिर झुका हुआ। सफ़ेद दाढ़ी। कुबड़ा।
कालू काका।
वो उठे। उन्होंने हमें देखा। और उनकी आँखों में पहले हैरानी आई, फिर डर, और फिर — कुछ और। जैसे किसी ने उन्हें बहुत दिनों बाद सुकून दिया हो।
"तुम आ गए," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं सोच रहा था… मैं सोच रहा था कि तुम्हें बुलाऊँ कैसे।"
"क्या हुआ, काका?" मैंने पूछा।
कालू काका ने पीछे की तरफ़ इशारा किया — तहखाने के अंधेरे में।
"भैरव यहाँ था," उन्होंने धीरे से कहा। "आधी रात को। उसने संदूक खोला, काग़ज़ निकाले, और… और उसने ये कहा।"
वो रुके। उनका गला भर आया।
"क्या कहा, काका?" मीरा ने पूछा।
कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"उसने कहा — 'अब बहुत हो गया। कल सुबह, जब वो दोनों यहाँ आएँ, तो इन दरवाज़ों को बंद कर देना। बाहर से। और मिट्टी से भर देना।'"
मेरी साँस रुक गई।
कालू काका ने अपनी आँखों में पानी भरकर कहा, "उसने कहा — 'इन्हें ज़िंदा मत छोड़ना।'"
तहखाने की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी। और दूर, ऊपर, कुएँ के मुँह से, किसी पत्थर के सरकने की आवाज़ आई।
भारी। धीमी। जैसे कोई ऊपर से ढक्कन रख रहा हो।
॥
ढक्कन की आवाज़ आई, और मेरे हाथ अपने आप कॉपी से चिपक गए। ऊपर, कुएँ के मुँह पर, कोई भारी चीज़ सरक रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी पूरी ताकत लगाकर पत्थर खींच रहा हो।
"वो बंद कर रहे हैं," कालू काका ने फुसफुसाया। "ऊपर से। जैसा उसने कहा था।"
टिंकू ने ईंट को कसकर पकड़ लिया। "तो खोलेंगे कैसे?"
"एक और रास्ता है," कालू काका ने कहा, पर उनकी आवाज़ में यकीन नहीं था। "नाली वाला। पर उसमें पानी भरा है, और रात में…"
दूसरी आवाज़ आई। इस बार पत्थर गिरने जैसी। तहखाने की छत से धूल झरने लगी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा लालटेन की पीली रोशनी में पीला पड़ गया था, पर आँखें वैसी ही साफ़ थीं। डर नहीं, हिसाब। जैसे वो अंदर ही अंदर कोई गिनती कर रही हो।
"काका," मैंने कहा, "भैरव को कैसे पता चला कि हम आज रात आएँगे?"
कालू काका ने अपना सिर झुका लिया। "मैंने… मैंने शाम को हरनाम के आदमी को देखा था। वो नीम के पेड़ के पास खड़ा था। मैंने सोचा कि वो तुम्हें ढूँढ रहा है। पर वो शायद मेरे पीछे आया था।"
"तो भैरव को पता है कि तुम हमारे साथ हो," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी।
कालू काका ने कुछ नहीं कहा। बस अपने हाथ जोड़ लिए, जैसे माफ़ी माँग रहे हों।
और तभी — ऊपर से तीसरी आवाज़। इस बार पत्थर की नहीं। मिट्टी की। भारी, गीली मिट्टी जो किसी फावड़े से ऊपर से नीचे फेंकी जा रही हो। वो तहखाने की छत पर गिरी, और सीढ़ियों के मुँह से होकर नीचे धूल का बादल आया।
"मिट्टी भर रहे हैं," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई थी। "अरे वो सच में मिट्टी भर रहे हैं!"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन हिली नहीं, पर मेरे अंदर कुछ हिला। माँ की बात याद आई — जो नीचे जाता है, वो अकेला नहीं लौटता। और मैं तीन लोगों को लेकर आया था।
"शांत," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपने कानों में भी अजीब लगी — जैसे किसी और की हो। "सब शांत। अभी साँस लेने की जगह है।"
मीरा ने अचानक अपना बैग खोला। उसमें से उसने एक छोटी टॉर्च निकाली — नहीं, टॉर्च नहीं, एक पीतल का दीपक जैसा कुछ, जिसमें बाती जल रही थी। मैंने देखा, वो दीपक पहले भी उसके बैग में था, पर अब तक किसी ने नहीं जलाया था।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा का पुराना दीया," उसने कहा। "माँ ने दिया था। कहती थीं — जब कोई रास्ता न दिखे, तो इसे जलाना।"
दीये की लौ छोटी थी, पर तहखाने के अंधेरे में उसने एक पूरी दुनिया जगा दी। दीवारों पर पुराने चित्र दिखने लगे — पहलवानों के, हनुमान जी के, और कुछ ऐसे चेहरे जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा। दीवार के एक कोने में सूखे फूलों की माला लटकी थी, जैसे किसी ने बहुत पहले कोई पूजा की हो और फिर भूल गया हो।
"काका," मीरा ने कहा, अपनी आवाज़ में वो सख्ती लाकर जो उसके सवालों में हमेशा होती थी, "भैरव ने कहा था कि वो तीन रात में तहखाने की मिट्टी उठाकर अपने पास रख लेगा। अगर वो आज रात हमें बंद कर रहा है, तो मिट्टी कब उठाएगा?"
कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ चमका — जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में दीया जलाया हो।
"तुम… तुमने सही पकड़ा," उन्होंने धीरे से कहा। "वो मिट्टी उठाने के लिए आएगा। और वो नीचे आने के लिए इसी दरवाज़े का इस्तेमाल करेगा। क्योंकि दूसरा रास्ता उसने बंद करवा दिया।"
"तो हमें बस इंतज़ार करना है," मैंने कहा। "उसके नीचे आने का।"
टिंकू ने ईंट नीचे रख दी। "मतलब हम यहाँ फँसे नहीं हैं। हम जाल में हैं।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर जाल में वो भी आएगा जो जाल बिछा रहा है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी किसी लड़की की आँखों में नहीं देखी थी — भरोसा। पूरा, बिना शर्त का। और मुझे लगा जैसे मेरे सीने में कुछ भारी सा हो गया। ज़िम्मेदारी। डर से भी भारी।
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