Spirit of a Fighter – Chapter 204
"भैरव की कॉपी," मैंने कहा। "बीस साल का हिसाब। हर मौत। हर खुराक। और अब… अगली खुराक।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में जो था, वो मैंने कभी नहीं देखा था। डर नहीं। गुस्सा नहीं। कुछ और। जैसे कोई दीवार अंदर से गिर रही हो।
"मैं अपने पिता के लिए दवा लाती थी," उसने धीरे से कहा। "हर महीने। शहर से। उसी शीशी में। और भैरव कहता था — 'मीरा बेटी, तुम्हारे हाथ से दवा पिलाने में पापा को ताकत मिलती है।'"
वो रुकी। उसकी साँस टूट रही थी।
"मेरे ही हाथ से?" उसकी आवाज़ काँपी। "वो ज़हर मेरे ही हाथ से आ रहा था?"
मैं कुछ नहीं बोला। क्या बोलता?
मीरा धीरे से पीपल की जड़ पर बैठ गई। उसने घुटनों को अपने सीने से लगाया। उसकी किताबें कीचड़ में गिर गईं, पर उसने उन्हें उठाने की कोशिश भी नहीं की।
"मैं रोज़ पापा के पास जाती थी," वो बोली, आवाज़ दबी हुई। "मैं उनके पैरों को रगड़ती थी। मैं सोचती थी — शायद मेरी पढ़ाई काम आएगी। शायद कोई जड़ी-बूटी उन्हें ठीक कर देगी। और सच ये था कि मैं खुद… मैं खुद उन्हें मार रही थी।"
"तू नहीं मार रही थी," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़क थी, शायद ज़रूरत से ज़्यादा। "भैरव मार रहा था। तू बस…"
"मैं बस क्या?" उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो गिरा नहीं। "मैं वो थी जो शीशी लाती थी। मैं वो थी जो पिलाती थी। मैं वो थी जो भैरव की बात मानती थी क्योंकि वो पापा का पुराना साथी था।"
वो हँसी। छोटी, कड़वी हँसी।
"आयुर्वेद पढ़ती हूँ," उसने कहा। "सबूत के बिना कुछ नहीं मानती। और बीस साल से मैं अपने ही घर में ज़हर बाँट रही थी।"
मेरा दिल कसा।
मैं उसके पास बैठ गया। कीचड़ में। पापा की धोती पहने हुए, जो अब तक सूख चुकी थी पर जिस पर अखाड़े की लाल मिट्टी के धब्बे अभी भी थे।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने सोचा था कुश्ती में हाथ काँपते हैं, डर में काँपते हैं। पर ये कुछ और था। ये वो कंपन था जो तब आता है जब कोई अपने से ज़्यादा किसी और के लिए डरता है।
मीरा ने मेरे हाथ की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"तुमने मेरी जान बचाई," उसने धीरे से कहा। "ये जानकर।"
"मैंने कुछ नहीं किया," मैंने कहा। "काग़ज़ ने किया।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "तुमने काग़ज़ ढूँढा। तुमने रातों को जागकर भैरव के पीछे दौड़ लगाई। तुमने अपनी माँ का ज़हर झेला। तुमने टिंकू की जली दुकान देखी। और आज, सुबह पाँच बजे, तुम यहाँ आए — मुझे बताने। किसी और के लिए नहीं। मेरे लिए।"
वो चुप हो गई।
दूर कहीं नहर का पानी बह रहा था। पीपल की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं। और सुबह की पहली चिड़िया बोली।
हम कुछ देर चुप बैठे रहे। मैंने कुछ नहीं कहा। उसने भी नहीं। पर उसका कंधा मेरे कंधे से टिका रहा। और मुझे लगा कि उस सुबह की ठंड में भी मेरे सीने में कुछ गरम है।
फिर मीरा ने अचानक सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी सूख चुका था। कुछ और आ गया था उसकी जगह। वो जो उसकी आँखों में हमेशा रहता था — ज़िद।
"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी। ठंडी। सख़्त। "अगर भैरव मेरी दवा में ज़हर मिला रहा है, तो इसका मतलब पापा की हालत कोई बीमारी नहीं है। ये सब सोची हुई साज़िश है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"और अगर ये साज़िश है, तो इसका सबूत सिर्फ़ इस कॉपी में नहीं है।" उसने अपना बैग खींचा। कीचड़ में भीगा हुआ बैग। उसने उसे खोला, अंदर से किताबें निकालीं, एक कपड़ा निकाला, और फिर — बहुत संभालकर — पीतल की एक घड़ी निकाली।
वही टूटी घड़ी। जो उसने मुझे दी थी। जिसकी सुइयाँ रुकी हुई थीं। जिसे मैंने उस रात आँगन में देखा था और सोचा था कि वो मेरी मेज़ पर रखी मीरा की निशानी है।
"ये तो मेरे पास थी," मैंने कहा। "तूने मुझे दी थी।"
"मैंने तुझे एक दी थी," मीरा ने कहा। "वो जो पापा की मेज़ पर पड़ी थी। ये दूसरी है।" उसने घड़ी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये पापा की जेब में थी। जिस दिन उन्हें आख़िरी बार अखाड़े में लड़ते देखा गया था, उस दिन के बाद उन्होंने इसे कभी नहीं खोला। मैंने सोचा था कि ये बस टूटी हुई है। पर कल रात, जब मैं तुम्हारे घर से लौटी, मैंने इसे उजाले में देखा।"
उसने घड़ी पलटी। पीछे का ढक्कन। उस पर एक छोटा-सा स्क्रू था, जो ढीला था।
"इसके अंदर पापा ने कुछ छिपाया है," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द साफ़। "मुझे पता था। बचपन से पता था। जब मैं छोटी थी, मैंने एक बार इसे खोलने की कोशिश की थी, और पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उन्होंने कहा था — 'ये तेरे काम की चीज़ नहीं है, मीरा। जिस दिन तू बड़ी हो जाए, और जिस दिन ये घड़ी चले, उस दिन इसे खोलना।'"
मैंने घड़ी देखी। पीतल चमक रहा था सुबह की हल्की रोशनी में।
"और ये चलती नहीं," मैंने कहा।
"नहीं चलती," मीरा ने कहा। "क्योंकि इसके अंदर कुछ है जो इसे रोक रहा है। कुछ ऐसा जो पापा ने डाला था ताकि कोई इसे बिना खोले न चला सके।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं। उस डर के बाद, उस आँसू के बाद, वो फिर से वही मीरा थी — जो सबूत के बिना कुछ नहीं मानती, और सबूत मिलने पर पीछे नहीं हटती।
"तो इसे खोल," मैंने कहा।
"यहीं?" उसने चारों तरफ़ देखा। नहर, पीपल, खाली सड़क।
"यहीं। अभी। अगर इसमें वो है जो मैं सोच रहा हूँ, तो हमें इसे भैरव के पास जाने से पहले देखना होगा।"
मीरा ने सिर हिलाया। उसने अपनी जेब से एक छोटी-सी चाकू निकाली — वही जो वो जड़ी-बूटी काटने के लिए रखती थी। उसने स्क्रू पर लगाई और धीरे से घुमाया।
स्क्रू ढीला हुआ। ढक्कन हिला।
और तभी, पीछे से, टिंकू की आवाज़ आई। फुसफुसाती हुई। डरी हुई।
"वीर…"
मैंने पलटकर देखा।
टिंकू सड़क के किनारे खड़ा था, और उसका चेहरा सफ़ेद था। उसने उँगली से दूर इशारा किया — नहर के उस पार, जहाँ शहर का रास्ता जाता है।
वहाँ, धुंध के बीच, दो लालटेनें हिल रही थीं। और वो हमारी तरफ़ बढ़ रही थीं।
मेरी साँस रुकी।
"भैरव के आदमी," मैंने धीरे से कहा।
मीरा ने घड़ी अपने सीने से लगा ली। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
"वीर," उसने कहा, "अगर वो यहाँ पहुँचे, तो ये घड़ी उनके हाथ लगेगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर घड़ी की तरफ़। फिर उन लालटेनों की तरफ़, जो धुंध में बड़ी हो रही थीं।
"तो हमें उनसे पहले निकलना होगा," मैंने कहा।
"कहाँ?" टिंकू ने पूछा। "घर? अखाड़ा?"
मैंने सोचा। घर नहीं — भैरव वहाँ आ चुका है। अखाड़ा नहीं — वहाँ ताला है, और कालू काका ने कहा था कि भैरव रात में कुएँ के पास आता है।
फिर मुझे याद आया। माँ का कहना। हरनाम का कहना। और वो जगह जहाँ कोई हमें ढूँढ नहीं सकता था।
"तहखाना," मैंने कहा। "कुएँ के पीछे वाला रास्ता। कालू काका ने बताया था। भैरव वहाँ रात में जाता है, पर सुबह नहीं। हम वहाँ जाएँगे, घड़ी खोलेंगे, और फिर पंचायत बुलाएँगे।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी।
हमने अपनी-अपनी चीज़ें उठाईं। मीरा ने किताबें बैग में ठूंसीं, घड़ी कपड़े में लपेटकर बैग के सबसे नीचे रखी। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और अपनी टोपी ठीक की, जैसे कोई फ़ौजी अपना हेलमेट ठीक करता हो।
"एक बात कहूँ?" उसने कहा।
"कह।"
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