Spirit of a Fighter203 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 203

7 min read November 5, 2026

"चौथी खुराक का पन्ना…" आवाज़ ने धीरे से कहा, "…आख़िरी पन्ना नहीं है। उसके पीछे एक और पन्ना है। भैरव ने उसे चिपका दिया है। उसे खोलना। उसमें तेरे पापा का सच है।"

मेरी साँस रुक गई।

मैंने कॉपी निकाली। मैंने आख़िरी पन्ना पलटा। और मैंने देखा — जैसे आवाज़ ने कहा था — आख़िरी पन्ने के पीछे, चिपके हुए, एक और पन्ना था। मैंने उसे नाखून से खुरचना शुरू किया।

और तभी टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"वीर," उसकी आवाज़ काँप रही थी, "वो आवाज़ कहाँ से आई?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर दफ़्तर के अंधेरे कोने की तरफ़। फिर अपने हाथ में चिपके पन्ने की तरफ़।

"पता नहीं," मैंने धीरे से कहा। "पर जो भी है… वो मेरे पापा के बारे में जानता है।"

मैंने पन्ना खुरचना जारी रखा। और उस पन्ने के नीचे से जो निकला, उसे देखकर मेरी रीढ़ ठंडी हो गई — एक पुरानी तस्वीर थी। और उसमें मेरे पापा रघुवीर खड़े थे, अपने बगल में एक नौजवान को गले लगाए हुए। और उस नौजवान के चेहरे पर मैंने वो आँखें पहचानीं जो मुझे आज भी अखाड़े की दीवार से देखती हैं।

भैरव सिंह।

॥

तस्वीर मेरे हाथ में काँप रही थी। काग़ज़ पुराना था, कोने से फटा हुआ, और उस पर धूल की परत ऐसी जमी थी जैसे बरसों से किसी ने छुआ न हो। मैंने उसे दोनों हाथों से थामा।

पापा। मेरे पापा रघुवीर सिंह। जवान, चौड़ी छाती, वही बड़ी मूँछें, और आँखों में वो चमक जो मैंने सिर्फ़ एक बार देखी थी — रणवीर सिंह के चेहरे पर, अखाड़े के फाटक पर, जब उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ उठाया था।

और उनके बगल में खड़ा था एक नौजवान। पतला, लंबा, चेहरे पर अभी दाढ़ी नहीं आई थी। पर आँखें वही थीं। वही ठंडी आँखें जो आज अखाड़े की दीवार से मुझे देखती हैं।

भैरव सिंह।

"ये…" टिंकू की आवाज़ मेरे कान में आई, फटी हुई, "ये भैरव है न? इतना जवान?"

मैंने जवाब नहीं दिया। मेरी आँखें तस्वीर के पीछे लिखी स्याही पर अटक गई थीं। पापा की लिखाई। छोटे-छोटे अक्षर, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो।

«मेरा भाई भैरव। मेरा हाथ। मेरी ताकत। आज इसने पहली बार अखाड़े की मिट्टी छुई। मैंने इसे अपना नाम दिया। अब ये मेरा है।»

मेरी साँस रुक गई।

भाई।

भैरव सिंह मेरे पापा का भाई था।

"वीर?" हरनाम की आवाज़ आई। वो अभी भी फर्श पर बैठा था, काग़ज़ों के बीच, उसका चश्मा टूटा हुआ था और एक काँच की किरच उसके गाल पर चिपकी थी। "क्या मिला?"

मैंने तस्वीर उसकी तरफ़ बढ़ाई। उसने देखा, और उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसे पेट में लात मार दी हो।

"ये…" उसने धीरे से कहा। "ये तो…"

"तू जानता था?" मेरी आवाज़ कड़की।

"नहीं! नहीं, वीर, मैं कसम खाता हूँ!" उसने हाथ उठाए। "मैंने बीस साल हिसाब लिखा, काग़ज़ सँभाले, पर ये… ये मैंने नहीं देखा। भैरव ने इसे कभी नहीं बताया।"

"तो अब जान ले।" मैंने तस्वीर वापस ली और कॉपी के उस आख़िरी पन्ने पर नज़र डाली जो चिपका हुआ था। पन्ना खुरचने पर और भी काग़ज़ निकला था — पतला, मुड़ा हुआ।

मैंने उसे खोला।

और जो पढ़ा, उससे मेरे हाथ ठंडे हो गए।

«चौथी खुराक — मीरा (रणवीर की बेटी)। तारीख़: नई दवा आने के बाद, पहले हफ़्ते में। तरीका: दवा की शीशी बदलनी है। बेटी अपने हाथ से लाएगी, अपने हाथ से पिलाएगी। मौत के बाद किसी को शक नहीं होगा। बाप पहले ही आधा मरा है। बेटी के हाथ की गलती कहेगी दुनिया।»

मेरे हाथ से कॉपी फिसलने लगी। टिंकू ने झट से पकड़ ली।

"ये…" उसने पढ़ा, और उसका मुँह खुला का खुला रह गया। "ये तो मीरा का नाम है।"

"कब?" मैंने हरनाम की तरफ़ पलटकर पूछा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "ये कब देनी है?"

हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे।

"अगले ही हफ़्ते," उसने धीरे से कहा। "रणवीर सिंह की नई दवा की खेप शहर से आती है। हर महीने की पहली तारीख़ को। और उसे लाने वाली…"

"मीरा होती है," मैंने उसकी बात पूरी की। मेरी आवाज़ सपाट थी, जैसे किसी और का गला हो।

हरनाम ने सिर हिलाया।

मेरे दिमाग़ में सब कुछ घूमने लगा। वो कल की बातें, वो अखाड़े की कोठरी, वो भैरव का मुस्कुराकर कहना — "मैडम, आपके पापा की दवा मैं खुद लगाता हूँ।" वो मीरा का कहना — "हर महीने पापा की दवा भैरव के कमरे से ही आती है।"

वो शीशी। वो हरी शीशी जो मुझे दरवाज़े के बाहर मिली थी। वही रंग। वही ढक्कन।

"वो हरी शीशी…" मैंने धीरे से कहा, "…जो मुझे दरवाज़े पर मिली थी। जो माँ ने चूल्हे में जलाई। वो भी यही थी।"

हरनाम ने आँखें बंद कर लीं।

"हाँ," उसने कहा। "वही थी। भैरव तुझे भी उसी रास्ते से ले जाना चाहता था। पर तूने पी नहीं। और तेरी माँ ने उसे जला दिया।"

टिंकू ने कॉपी अपने सीने से लगा ली, जैसे कोई उसे छीन लेगा।

"वीर," उसने कहा, "मीरा को बताना पड़ेगा। आज ही। अभी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर हरनाम की तरफ़। फिर उस दफ़्तर की तरफ़ जिसकी मेज़ टूटी पड़ी थी और जिसके अंधेरे कोने से वो आवाज़ आई थी।

वो आवाज़। जो कुएँ से आती थी, जो तहखाने से आती थी, जो मेरे पापा के बारे में जानती थी।

"तू रुक," मैंने हरनाम से कहा। "तू कहीं नहीं जाएगा। तेरे पास जो बचा है, वो सब मेरे साथ पंचायत में रखेगा।"

"मैं कहीं नहीं जा रहा," हरनाम ने थकी आवाज़ में कहा। "मेरा बेटा अस्पताल में है। मेरे जाने की जगह कहीं नहीं है।"

मैंने कॉपी अपनी कमीज़ के अंदर कसी। तस्वीर उसी के पन्नों के बीच रखी। और मैं पलटकर बाहर चल दिया।

"वीर!" टिंकू मेरे पीछे भागा। "कहाँ?"

"नहर के मोड़ पर," मैंने कहा। "मीरा वहीं सुबह आती है। उसकी क्लास से पहले।"

रात अभी ख़त्म नहीं हुई थी, पर आसमान पूरब से हल्का होने लगा था। बादल वहीं थे, पर उनके किनारे थोड़ा पीले पड़ रहे थे। सड़कें खाली थीं, सिर्फ़ एक कुत्ता किसी दुकान के बाहर सो रहा था और एक बुढ़िया पानी का मटका भर रही थी।

मेरे पैर अपने आप तेज़ हो गए। टिंकू मेरे साथ चल रहा था, उसकी साँस फूल रही थी, पर वो कुछ नहीं बोला।

नहर का मोड़ आया। पानी पर धुंध तैर रही थी, सफ़ेद और ठंडी। किनारे पर पुराना पीपल का पेड़ था, जिसकी जड़ें पानी तक फैली थीं। वहीं, जड़ के पास, एक लड़की बैठी थी। किताबें गोद में, बैग बगल में, सिर झुका हुआ।

मीरा।

मैं दौड़कर पहुँचा। मेरी चप्पल कीचड़ में फँसी, मैंने उसे खींचा और लगभग गिरते-गिरते रुका।

मीरा ने सिर उठाया। पहले तो उसके चेहरे पर हैरानी आई, फिर झुँझलाहट।

"तुम्हें क्या हो गया है इस वक़्त?" उसने किताब बंद की। "सुबह के पाँच बजे हैं। मुझे क्लास—"

"तेरा नाम है इसमें।"

मैंने कहा। बिना सोचे। बिना तैयारी के। सीधा।

मीरा रुकी। उसके होंठ खुले रह गए।

"क्या?"

मैंने कमीज़ के अंदर से कॉपी निकाली। मेरे हाथ काँप रहे थे, इसलिए पन्ने पलटने में देर लगी। टिंकू मेरे पीछे खड़ा था, चुप। मैंने वो पन्ना खोला जो चिपका हुआ था।

"पढ़।"

मीरा ने कॉपी ली। उसकी उँगलियों में औषधि की गंध थी — तुलसी, अदरक। वो गंध मुझे कल की रात की याद दिला गई, जब उसने श्यामू की झोपड़ी में दवा बनाई थी।

उसने पढ़ा।

धीरे-धीरे। हर शब्द। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। और जब वो आख़िरी लाइन पर पहुँची — «बेटी के हाथ की गलती कहेगी दुनिया» — तो उसका हाथ रुक गया।

काग़ज़ उसकी गोद से फिसला।

"ये…" उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "ये क्या है?"

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