Spirit of a Fighter202 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 202

6 min read November 5, 2026

हरनाम ने अपना सिर झुका लिया और दोनों हाथ जोड़ लिए। मेरे सामने। मैंने उसके हाथ पकड़कर नीचे किए।

"ये मत कर," मैंने कहा। "पापा के सामने करना, जब उनकी कब्र पर जाएँगे।"

तभी बलवंत हिला। मैं भूल ही गया था कि वो यहाँ है। वो अब भी दरवाज़े के पास खड़ा था, पर अब उसके हाथ जेब में थे और उसके चेहरे पर वो पुरानी ठंडक लौट आई थी।

"बहुत भावुक हो गया सब," उसने कहा। "भाई, तूने अपना हिसाब खोल दिया। अब भैरव को पता चलेगा कि कॉपी तेरे पास से गई। और वो तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और तुझे भी नहीं, मज़दूर। तूने हमारे बीच की दीवार गिरा दी।"

"तू किस तरफ़ है?" मैंने पूछा। "अपने भाई के साथ या भैरव के साथ?"

बलवंत ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैं समझ नहीं पाया। गुस्सा नहीं। शर्म नहीं। कुछ और। जैसे कोई आदमी जानता हो कि वो गलत जगह खड़ा है, पर उठ नहीं सकता।

"मैं वहीं हूँ जहाँ मुझे रहना पड़ता है," उसने कहा। "भैरव ने मुझे पाला है, वीर। जब मैं छोटा था, मेरे पापा मरे, मेरी माँ ने मुझे अखाड़े के गेट पर बेच दिया। भैरव ने मुझे उठाया। उसने मुझे खाना दिया, कपड़ा दिया, अखाड़े में जगह दी। मेरा भाई हिसाब रखता था, और मैं…" वो रुका। "मैं उसका हाथ था। जो कहता, मैं करता।"

"तो तूने भी ज़हर दिया?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ में डर था।

बलवंत ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।

"मैंने गिलास भरे," उसने कहा। "पीने वाले खुद पीते थे।"

मेरे भीतर फिर गुस्सा उठा। पर इस बार मैंने उसे रोक लिया। मैंने सोचा — अगर मैं हर उस आदमी को मारने लगा जिसने भैरव के लिए गलत काम किया, तो आधा गाँव मारना पड़ेगा। और मैं पहलवान बनना चाहता हूँ, हत्यारा नहीं।

"तू भी गवाह है," मैंने कहा। "तूने गिलास भरे। तू जानता है किसको कब दिया। तेरा नाम भी सच की किताब में जाएगा।"

बलवंत हँसा। ठंडी हँसी। "किताब में नहीं, वीर। कब्र में। भैरव को पता चलेगा, और हम दोनों भाई एक ही रात में मर जाएँगे।"

"तो उससे पहले सच बाहर ले जाओ," मैंने कहा। "आज रात।"

दोनों भाइयों ने एक साथ मेरी तरफ़ देखा।

मैंने कॉपी उठाई। मैंने उसे अपनी छाती से लगाया। काग़ज़ की गंध मेरी नाक में गई — स्याही, धूल, और उसके नीचे वो पुरानी चीज़ जो मैं पहचानता था। मेरे पापा की गंध। दोनों की।

"ये कॉपी अब मेरे पास रहेगी," मैंने कहा। "और कल सुबह, जब अखाड़ा खुलेगा, मैं इसे पंचायत के सामने रखूँगा। पूरे गाँव के सामने। जो-जो इस कॉपी में लिखा है, सब सुनेंगे।"

हरनाम ने घुटनों के बल बैठे-बैठे मेरी तरफ़ देखा। "पर भैरव…" वो काँपा, "भैरव कल सुबह अखाड़े में होगा। उसके आदमी हर तरफ़ हैं। वो तुझे बोलने नहीं देगा।"

"वो मुझे रोकने की कोशिश करेगा," मैंने कहा। "पर आज रात के बाद, वो अकेला होगा।"

मैंने कॉपी को अपनी कमीज़ के अंदर छिपाया। फिर मैंने हरनाम की तरफ़ देखा।

"एक बात और," मैंने कहा। "तूने कहा था कि आख़िरी पन्ने पर कुछ और लिखा है। चौथी खुराक का नाम बदल गया है। कहाँ है वो पन्ना?"

हरनाम का चेहरा और पीला पड़ गया। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और कॉपी के आख़िरी पन्ने की तरफ़ इशारा किया।

"वहाँ," उसने कहा। "पर वीर…" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई, "पढ़ने से पहले एक बार सोच ले। क्योंकि जो नाम वहाँ लिखा है, वो तेरी ज़िंदगी बदल देगा।"

मैंने कॉपी खोली। आख़िरी पन्ना। पीला, मुड़ा हुआ, कोने से फटा हुआ। ऊपर लिखा था — "चौथी खुराक।"

नीचे एक नाम था, पर वो कटा हुआ था। किसी ने स्याही से ज़ोर से काटा था, और उसके ऊपर नया नाम लिख दिया था — नई स्याही, नई लिखाई, भैरव की लिखाई।

मैंने वो नाम पढ़ा।

और मेरे हाथ से कॉपी गिर गई।

काग़ज़ फर्श पर गिरा, और उसकी आवाज़ ने कमरे को भर दिया।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। "वीर… क्या लिखा है?"

मेरी आवाज़ नहीं निकली। मैंने अपना मुँह खोला, पर कुछ बाहर नहीं आया।

हरनाम ने धीरे से कहा, "तेरा नाम, वीर। चौथी खुराक का नाम अब तेरा है। भैरव ने उसे बदल दिया है। अब वो तुझे मारना चाहता है। और उसके हिसाब में तू अगला नंबर है।"

कमरे में इतनी ख़ामोशी छा गई कि मुझे अपना दिल सुनाई देने लगा।

मैंने फर्श से कॉपी उठाई। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उस पन्ने को फिर देखा। नाम साफ़ था। मेरा नाम। और उसके नीचे भैरव की लिखाई में एक लाइन थी — "तारीख़: तीन दिन बाद।"

तीन दिन बाद।

आज रात कोई और। पर तीन दिन बाद मैं।

मैंने कॉपी बंद की। मैंने उसे अपनी छाती से लगाया। मैंने आँखें बंद कीं।

मैंने सोचा — मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई अब शुरू हो रही है। और मुझे ये लड़ाई अकेले नहीं लड़नी। माँ, टिंकू, मीरा, गुड़िया, कालू काका, हरनाम, बलवंत — सबको साथ लाना है।

मैंने आँखें खोलीं। मैंने हरनाम की तरफ़ देखा।

"अगर तू सच बोलना चाहता है," मैंने कहा, "तो ये आख़िरी मौक़ा है। कल सुबह अखाड़े में आना। पंचायत के सामने। और जो-जो तूने मेरे पापा के साथ किया, सब बोलना।"

हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ डर नहीं था। कुछ और था। एक चिंगारी। छोटी-सी, काँपती हुई, पर जलती हुई।

"मैं आऊँगा," उसने कहा। फिर उसने बलवंत की तरफ़ देखा। "और तू भी आएगा।"

बलवंत ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। शायद शक। शायद उम्मीद। शायद वो जो आदमी सिर्फ़ अपने आप को बचाने के लिए जीता है, जब पहली बार किसी और के लिए सोचता है।

"मैं सोचूँगा," उसने कहा, और वो पलटकर बाहर की तरफ़ चल दिया।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरे पास आया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो हँस रहा था। वही पुरानी हँसी, थोड़ी फटी हुई, थोड़ी थकी हुई, पर मेरे लिए।

"तेरे पापा के लिए," उसने कहा। "मैं कल सुबह आऊँगा। और मेरी खीर लाऊँगा। पंचायत के सामने खीर खाएँगे, सच बोलेंगे।"

मैं हँसा। पहली बार उस रात में। छोटी-सी हँसी, काँपती हुई, पर असली।

मैंने कॉपी अपनी कमीज़ के अंदर कसकर रखी। मैंने फर्श से अपनी चप्पल उठाई। मैंने हरनाम को उठने में हाथ दिया। उसका हाथ ठंडा था, काँपता हुआ। पर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

हम बाहर निकले। रात गहरी थी। आसमान में तारे नहीं थे, बस बादल थे — काले, भारी, बारिश के इंतज़ार में।

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। मैंने सोचा — कल सुबह जब मैं अखाड़े में जाऊँगा, तो मेरे साथ ये कॉपी होगी। मेरे पापा के नाम होंगे। और उनके नाम के आगे गवाह का नाम — हरनाम — जो अब सच बोलेगा।

मैंने अपनी मुट्ठी में कॉपी कसकर पकड़ी। काग़ज़ का किनारा मेरी उँगली में चुभा, और मुझे उसका दर्द अच्छा लगा। ज़िंदा होने का दर्द।

मैंने घर की तरफ़ चलना शुरू किया।

और तभी, पीछे से, दफ़्तर के अंधेरे कोने से एक आवाज़ आई। एक आवाज़ जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी, पर जिसे सुनकर मेरे पैर ठिठक गए।

"वीर सिंह…"

मैं पलटा।

कोई नहीं था। सिर्फ़ अंधेरा। सिर्फ़ काग़ज़। सिर्फ़ टूटी मेज़।

पर आवाज़ फिर आई, और इस बार ज़्यादा साफ़। किसी कुएँ से आती हुई, किसी गहराई से आती हुई, किसी ऐसे आदमी की आवाज़ जो मृत नहीं है, पर ज़िंदा भी नहीं।

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