Spirit of a Fighter – Chapter 201
मेरी छाती में एक ठंडी चीज़ फैल गई।
"तुमने पी लिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी। "तुम्हारे शरीर में वो ज़हर है।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, आँखों के नीचे काले घेरे, होंठ सूखे हुए, फटे हुए। उसने धीरे से सिर हिलाया।
"तीन दिन से," उसने कहा। "भैरव ने कहा — हरनाम, तू बूढ़ा हो गया, तेरे हाथ काँपते हैं, तेरे काग़ज़ गंदे हो गए हैं। मुझे नया मुंशी चाहिए। और फिर उसने मेरे सामने गिलास रख दिया। वही गिलास जो वो हर पहलवान को देता है।" उसने रुककर साँस ली, और साँस लेते हुए सीना काँपा। "मैंने कहा — भैरव, मैं तेरा आदमी हूँ, बीस साल से। मैंने तेरे लिए क्या-क्या नहीं किया। और वो हँसा। बोला — इसीलिए तो। जो बीस साल मेरे साथ रहा, वो सब जानता है। उसे ज़िंदा क्यों रखूँ?"
टिंकू ने मुँह पर हाथ रख लिया।
मैं हरनाम के सामने बैठ गया। फर्श ठंडा था। मेरे घुटने उसके घुटनों से लग गए।
"कॉपी दो," मैंने कहा।
वह एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने कॉपी आगे बढ़ा दी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसने कॉपी नहीं छोड़ी। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — एक आदमी की आँखें जो अब जानता है कि उसने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी के लिए गलत काम करके बिता दी।
"इसमें बीस साल का हिसाब है," उसने धीरे से कहा। "हर पहलवान का नाम। कितनी खुराक दी। कब बीमार पड़ा। कब मरा। किसको कितना पैसा मिला। और…" वो रुका, "और किसको कितना नहीं मिला।"
मैंने कॉपी उसके हाथ से ली। कवर हरी थी, फटी हुई, कोनों से मुड़ी हुई। पन्ने पीले पड़ गए थे, कुछ पर स्याही फैल गई थी। मैंने पहला पन्ना पलटा।
तारीख़ें। नाम। खुराक। मौत।
मैं पन्ने पलटता गया। उँगली चलाती गई, आँखें नीचे दौड़ती गईं। पहला साल, दूसरा साल, तीसरा… बीस साल के नाम। बीस साल के शरीर। बीस साल की चुप्पी।
फिर मेरी उँगली रुक गई। एक पन्ने पर, बीच में, मेरी आँखों के सामने एक नाम उभरा।
रघुवीर।
मेरे पापा। मेरे असली पापा। जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा, जिनकी सिर्फ़ गंध मेरे भीतर बसी थी, जिनकी मिट्टी मेरे मुँह में आई थी उस दिन अखाड़े में।
मेरे हाथ काँपने लगे। कॉपी का किनारा मेरी उँगली से फिसला।
उसके नीचे लिखा था — "खुराक: पाँचवीं। दिया: भैरव सिंह। गवाह: हरनाम। नतीजा: पंद्रह दिन में कमर से नीचे सून्न। तीसरे महीने में पैर गए। मौत: डूबने से। कुएँ में।"
कुएँ में। मेरे पापा कुएँ में डूबकर मरे थे। माँ ने यही कहा था। पर यहाँ लिखा था — "दिया: भैरव सिंह।" यानी उन्हें डुबाया नहीं गया था। उन्हें पहले ज़हर दिया गया था। उनके पैर पहले ही मर चुके थे। वो कुएँ में गिरे नहीं थे। उन्हें गिराया गया था। जब वो खुद खड़े नहीं हो सकते थे।
मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
मैंने आगे पन्ना पलटा। दो पन्ने बाद, फिर एक नाम।
जगदीश।
मेरे गोद लेने वाले पापा। जिन्होंने मुझे अपना बेटा बनाया। जिनकी छत के नीचे मैं बड़ा हुआ। जिनका नाम मैं लेकर उठता-बैठता था।
"खुराक: चौथी। दिया: भैरव सिंह। गवाह: हरनाम। नतीजा: तीन महीने में शरीर सूखा। छठे महीने में आँखें धँसीं। मौत: सीने में दर्द, रात में, अकेले।"
मेरा हाथ कॉपी पर जम गया।
मेरे दोनों पापा। एक ही आदमी की कलम। एक ही आदमी का ज़हर। और उन दोनों के बीच, इस कॉपी में, दोनों के नाम एक-दूसरे के पास लिखे थे, जैसे कोई हिसाब की किताब हो, जैसे कोई दुकान का बही-खाता हो। जैसे मेरे पापा कोई आदमी न हों, कोई संख्या हों।
मेरी आँखें जलने लगीं।
"तूने देखा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लगी। "तूने इन्हें मरते देखा। और चुप रहा।"
हरनाम ने सिर झुका लिया। उसकी गर्दन की नसें उभर आईं।
"हाँ," उसने कहा। "मैंने देखा।" उसकी आवाज़ में कुछ टूट रहा था। "तेरे पापा रघुवीर को मैंने खुद पानी दिया, वीर। अपने हाथ से गिलास बढ़ाया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में सवाल था। पर उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस पी लिया। क्योंकि उस वक़्त तक वो भैरव से हार चुके थे, और उन्हें लगा शायद ये पानी उन्हें फिर से खड़ा कर देगा।" वो रुका। उसकी साँस फट रही थी। "और मैं चुप खड़ा रहा। मैंने सोचा — अगर मैंने मना किया, तो अगला नंबर मेरा होगा। मेरे मुन्ना का होगा।"
"मुन्ना भी तो इसी ज़हर से बीमार है," मैंने कहा। "तू बचा क्या?"
हरनाम ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। उसके कंधे हिलने लगे। वो रो रहा था, बिना आवाज़, बिना शोर, जैसे कोई पुराना पत्थर अंदर से चटक रहा हो।
"कुछ नहीं बचा," उसने कहा। "बीस साल में मैंने सिर्फ़ अपने लिए बचाया। अपनी चुप्पी। अपनी फ़ाइलें। अपना डर।" उसने हाथ हटाए। उसकी आँखें लाल थीं। "तेरे दोनों बाप मेरी कलम से मरे हैं, वीर। मैंने उन्हें मरते देखा और चुप रहा। मैंने काग़ज़ पर सिर्फ़ 'कुदरत का सितम' लिखा और आगे बढ़ गया। मैं मुंशी था। मुंशी का काम हिसाब रखना है, सच नहीं।"
मेरे भीतर कुछ उबला। गुस्सा, इतना गुस्सा कि मेरे हाथ अपने आप मुट्ठी में बंध गए, और मैं उस पर झपट पड़ा। मेरा हाथ उसकी कमीज़ के गले पर जा पहुँचा। मैंने उसे खींचा। उसका सिर मेरे सामने आ गया, और उसकी आँखों में मैंने अपना चेहरा देखा — लाल, काँपता, किसी जानवर जैसा।
"तूने मेरे पापा को पानी दिया?" मैं चीखा। "अपने हाथ से? और तू चुप रहा?"
टिंकू मेरी तरफ़ दौड़ा। "वीर! वीर, छोड़!"
पर मैंने उसे नहीं छोड़ा। मैं हरनाम का गला दबाए बैठा था। उसने कोई विरोध नहीं किया। उसने अपने हाथ नहीं उठाए। बस मेरी तरफ़ देखता रहा, जैसे कह रहा हो — कर ले, जो करना है।
और यही चीज़ मुझे रोक गई।
अगर वो लड़ता, मैं उसे मार देता। अगर वो बचने की कोशिश करता, मेरा गुस्सा और बढ़ता। पर वो चुप बैठा रहा, मेरी मुट्ठी में अपनी जान देने को तैयार। और मेरे हाथ ढीले पड़ गए।
मैंने उसे छोड़ दिया। मैं पीछे हटकर दीवार से टिक गया। मेरी साँस फट रही थी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"मैं तुझे नहीं मारूँगा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी हुई थी, पर साफ़ थी। "मारने से मेरे पापा वापस नहीं आएँगे। और मरे हुए आदमी की गवाही किसी काम की नहीं होती।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू ज़िंदा रहेगा। और जब वक़्त आएगा, तू सबके सामने खड़ा होकर वही बोलेगा जो इस कॉपी में लिखा है। पूरे गाँव के सामने। पंचायत के सामने। पुलिस के सामने। और मेरे पापा के नाम के आगे तेरी कलम से लिखा जाएगा — 'गवाह: हरनाम।' इस बार सच का गवाह।"
हरनाम मेरी तरफ़ देखता रहा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उसकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो उसे पोंछ भी नहीं रहा था।
"मैं…" उसने धीरे से शुरू किया, "मैंने सोचा था तू मुझे मार देगा। और मैं मर जाना चाहता था, वीर। सच में। इन तीन दिनों में मैंने एक बार भी नहीं सोचा कि मैं बचूँगा।" उसने कॉपी की तरफ़ देखा। "पर तूने मुझे ज़िंदा रखा। मुझे नहीं पता ये ज़िंदगी मैं कैसे उठाऊँगा।"
"उठानी पड़ेगी," मैंने कहा। "क्योंकि तेरे पास मुन्ना है। और मुन्ना को ठीक होने के लिए सच की ज़रूरत है। ज़हर की नहीं।"
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