Spirit of a Fighter200 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 200

7 min read November 5, 2026

"तुम चौंक गए," उसने कहा। "सोचा होगा, हरनाम भैरव के सबसे पास है। उसकी सबसे बड़ी कॉपी उसके पास है।"

"तो है कहाँ?" मैंने पूछा।

हरनाम ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पहली बार डर की जगह कोई और चीज़ आई — हिम्मत।

"मैं तुम्हें दिखा सकता हूँ," उसने कहा। "पर एक शर्त पर।"

"क्या शर्त?"

"मेरे मुन्ना को उस अस्पताल से निकालना होगा। भैरव के आदमी वहाँ पहरा देते हैं। अगर मैं गया, तो वो मुन्ना को पहुँचा देंगे।" उसकी आवाज़ काँपी। "मैं खुद नहीं जा सकता।"

मैं चुप हो गया। सोचा — ये आदमी अभी तक मेरा दुश्मन था, और अब मेरी मदद माँग रहा है।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कहा हुआ था — तू जानता है क्या करना है।

"मैं जाऊँगा," मैंने कहा।

हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे यकीन न हो रहा हो।

"तुम जानते हो," उसने धीरे से कहा, "भैरव का आदमी अगर वहाँ तुम्हें देखेगा, तो वो तुम्हें भी उसी हाल में पहुँचा देगा?"

"जानता हूँ।"

"फिर भी?"

मैंने एक गहरी साँस ली।

"मेरे दो पापा मरे," मैंने कहा। "दोनों इसी ज़हर से। तुम्हारा मुन्ना अभी ज़िंदा है। उसे ज़िंदा रहने देना मेरा हक़ भी है, हरनाम।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और तुम्हारा भी।"

हरनाम की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मुँह फेर लिया।

"बीस साल में किसी ने मेरी तरफ़ ऐसे नहीं देखा," उसने फुसफुसाया। "जैसे मैं इंसान हूँ, भैरव का आदमी नहीं।"

टिंकू उठा। उसने अपनी टोपी पहनी, टेढ़ी पहनी, जैसे हमेशा पहनता है।

"भाई," वो मेरी तरफ़ मुड़ा। "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। ये बात मैंने अपनी माँ से सुनी थी। आज समझ आई।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।

"तो चल," मैंने कहा। "पहले हरी कवर वाली कॉपी।"

हरनाम उठा। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। माँ ने उसे सहारा दिया।

"तू अभी कमज़ोर है," वो बोलीं। "कुछ खा-पी ले।"

"नहीं माँजी," हरनाम ने कहा। "अगर अब नहीं गया, तो भैरव को पता चल जाएगा कि मैंने अंगूठी छीनी थी। वो मुन्ना को…" वो रुक गया।

"तो चलो," माँ ने कहा। "पर एक बात सुन ले।" उन्होंने उसकी तरफ़ उँगली उठाई। "अब तू अकेला नहीं है। जो अकेले लड़ता है वो गिरता है, और जो साथ लड़ता है वो गिरकर उठ जाता है।"

हरनाम ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में पहली बार सच्ची रोशनी आई।

हम बाहर निकले। बारिश रुक गई थी, पर हवा में नमी थी। मिट्टी की गंध उठ रही थी। मैंने गहरी साँस ली — वो गंध मुझे रामदीन की झोपड़ी की तरफ़ खींच रही थी। कुएँ वाली गंध। पुरानी मिट्टी, बंद हवा, और उसके नीचे एक बहुत पतला-सा, भीगा हुआ डर।

मैं एक पल के लिए रुक गया।

"क्या हुआ?" टिंकू ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस… वो आवाज़ याद आ गई।"

"कौन-सी आवाज़?"

"कुएँ वाली। जिसने कहा था — मेरा नाम मत पूछना।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ नहीं बोला।

हरनाम आगे बढ़ रहा था, धीरे-धीरे, लड़खड़ाते हुए। उसका दफ़्तर अखाड़े के पीछे, एक छोटे से पुराने कमरे में था, जहाँ हिसाब-किताब रखा जाता था। रास्ते में उसने बताया कि वो रोज़ रात को वहाँ जाता है, भैरव के कहे मुताबिक़ काग़ज़ लिखता है, फिर सब जला देता है।

"आज नहीं जलाया," उसने कहा। "आज मैंने सोचा — शायद आख़िरी बार हैं ये काग़ज़।"

हम दफ़्तर के पास पहुँचे। दरवाज़े का ताला टूटा हुआ था, और दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर काग़ज़ बिखरे पड़े थे — जैसे किसी ने गुस्से में सब उलट-पुलट दिया हो।

हरनाम ने काँपते हाथों से दरवाज़ा पूरा खोला।

"ये मैंने नहीं किया," उसने धीरे से कहा।

मैं अंदर गया। काग़ज़ों की गंध — स्याही, धूल, और उसके ऊपर किसी के पसीने की गंध। मुझे पहचानना मुश्किल नहीं हुआ। भैरव। उसकी गंध हर काग़ज़ पर थी।

"कुछ नहीं मिलेगा," टिंकू ने कहा। "सब ले गया।"

"नहीं।" हरनाम आगे बढ़ा। वो एक टूटी मेज़ के पास गया। मेज़ का पाया कटा हुआ था, जैसे किसी ने तोड़ने की कोशिश की हो। उसने पाया घुमाया, और अंदर से एक फटा हुआ पन्ना निकला। "ये मैंने कभी किसी को नहीं दिखाया।"

उसने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे उजाले में देखा। हरनाम की लिखाई थी, टेढ़ी-मेढ़ी, काँपती हुई — जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा हो।

"बीस साल का हिसाब… सब याद है। कोई सबूत नहीं, पर मेरे अंदर सब लिखा है। अगर मैं न रहूँ, तो ये पन्ना किसी के हाथ लगे।"

मैंने उसे पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा। मेरा गला सूख गया।

"तुमने ये कब लिखा?" मैंने पूछा।

"पिछली रात," उसने कहा। "जब भैरव ने कहा कि तेरी अंगूठी उतार। मैंने सोचा — अगर कल मैंने गवाही दे दी, तो मेरा मुन्ना बच जाएगा, पर मेरा नाम मिट जाएगा। अगर मैंने मना किया, तो मेरा नाम रहेगा, पर मुन्ना…" वो रुक गया। "मैंने ये पन्ना छिपा दिया। ताकि कोई जान सके कि मैं सिर्फ़ भैरव का आदमी नहीं था। मैं हरनाम भी था।"

टिंकू ने पन्ना पढ़ा। उसकी आँखें भर आईं।

"हरनाम भाई," उसने धीरे से कहा, "तुमने इतना सब सहा?"

हरनाम ने कुछ नहीं कहा। बस दीवार की तरफ़ देखता रहा।

तभी दफ़्तर के अंधेरे कोने से एक आवाज़ आई। कमज़ोर, रुँधी, जैसे किसी का गला सूख गया हो।

"वीर… मैं यहीं हूँ…"

मैं पलटा। मेरा हाथ अपने आप मुट्ठी में बंध गया। टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।

कोने में, फर्श पर, एक आदमी बैठा था। घुटने सीने से लगाए। हाथ में हरी कवर वाली कॉपी दबाए। उसका चेहरा पीला था, आँखें धँसी हुईं, होंठ सूखे।

हरनाम।

पर ये हरनाम तो अभी मेरे साथ खड़ा था।

मैंने पलटकर देखा। जो हरनाम मेरे साथ आया था, वो पीछे खड़ा था। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।

"ये कौन है?" मैंने पूछा।

जो कोने में बैठा था, उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पहचान की चमक आई।

"मैं हरनाम हूँ," उसने धीरे से कहा। "और जो तुम्हारे साथ खड़ा है… वो मेरा भाई है। बलवंत।"

॥

वो नाम सुनकर मेरे भीतर कुछ ऐसा टूटा जो अब तक जुड़ा हुआ था। बलवंत। यही नाम तो था उस पीले काग़ज़ पर — "बलवंत" — जो मुझे श्यामू की झोपड़ी से मिला था। और आज ये आदमी मेरे साथ चलकर यहाँ तक आया, मेरी ही बातों में हाँ मिलाता रहा, और मैंने कुछ नहीं पकड़ा।

कोने में बैठे हरनाम ने अपनी गोद से हरी कवर वाली कॉपी उठाई। उसके हाथ ऐसे काँप रहे थे जैसे बुखार में हों। उसने कॉपी दोनों हाथों से थामी, जैसे कहीं वो गिर न जाए।

"मैं सच में हरनाम हूँ," उसने फिर कहा, और आवाज़ फट गई। "ये जो तुम्हारे साथ खड़ा है, मेरा भाई है। बलवंत। भैरव का आदमी। बीस साल से।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। बलवंत अब भी वहीं खड़ा था, पर उसका चेहरा बदल चुका था। वही चेहरा, जो अभी तक काँप रहा था, अब ठंडा हो गया था। आँखें छोटी हो गईं। होंठ सिकुड़ गए।

"तू चुप क्यों नहीं रहा, भाई?" उसने धीरे से कहा। गुस्सा नहीं था उसकी आवाज़ में। थकान थी। जैसे कोई पुरानी बीमारी हो जिससे आदमी ऊब चुका हो।

टिंकू ने मेरी कमीज़ और ज़ोर से पकड़ ली। उसकी साँस तेज़ चल रही थी।

"वीर," वो फुसफुसाया, "ये सब क्या है?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं कोने की तरफ़ बढ़ा। हरनाम की तरफ़। और जैसे ही मैं उसके पास पहुँचा, मेरी नाक ने वो काम किया जो वो हमेशा करती है — बिना पूछे, बिना बताए।

गंध। उसकी साँस में। वही कड़वी, धातु जैसी, अंदर तक जाने वाली गंध। वही गंध जो अखाड़े के गिलास में थी। जो हरी शीशी में थी। जो मेरे पापा की धोती से उठती थी जब माँ उसे धोती थीं और आँखें भर आती थीं।

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