Spirit of a Fighter – Chapter 199
मैंने काग़ज़ उठाए। हाथ काँप रहे थे।
तभी गुड़िया ने मेरी कमीज़ खींची। "भैया," वो धीरे बोली, "इसके पीछे कुछ गिरा था। जब ये आँगन में आया।"
मैंने देखा। कीचड़ में एक अंगूठी पड़ी थी। टूटी हुई। और उस पर वही निशान बना था।
मैंने उसे उठाया और माँ की तरफ़ बढ़ा दिया।
माँ ने उसे देखा। उनका चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने हरनाम की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"ये अंगूठी…" उनकी आवाज़ रुक गई। "ये तो हरनाम की है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"पर हरनाम की अंगूठी तो उसकी उँगली में है," टिंकू ने धीरे से कहा।
हरनाम ने अपना हाथ उठाया। उसकी उँगली खाली थी।
"मेरी अंगूठी आज सुबह चोरी हो गई थी," उसने धीरे से कहा। "मैं समझा, गिर गई होगी।"
माँ ने टूटी अंगूठी को उजाले में उठाया।
"तो ये अंगूठी यहाँ कैसे आई?" उन्होंने पूछा। "हरनाम खुद आया था?"
॥
माँ ने टूटी अंगूठी को उजाले में उठाया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"मैंने ये अंगूठी बीस साल पहले देखी थी," उन्होंने कहा। "उस दिन।"
हरनाम ने अपना सिर उठाया। उसके चश्मे के पीछे कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर नहीं था वो। कुछ और था।
"कौन-सा दिन, माँजी?" उसने पूछा। आवाज़ धीमी, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छू रहा हो।
माँ ने अंगूठी मेज़ पर रख दी। फिर चूल्हे की तरफ़ देखा, जैसे वहाँ से जवाब आएगा।
"जिस दिन तुम अखाड़े का हिसाब लेने आए थे," वो बोलीं। "रघुवीर के सामने तुमने काग़ज़ फेंके थे। कहा था — ये पैसे कहाँ गए, ये मिट्टी किसने बेची। रघुवीर ने तुम्हारा हाथ पकड़ा था और कहा था — हरनाम, तू भाई है, पर तेरी उँगली में ये अंगूठी किसने पहनाई?"
हरनाम ने अपनी खाली उँगली की तरफ़ देखा। बीस साल से वहाँ अंगूठी थी, और आज पहली बार उसे खालीपन दिख रहा था।
"रघुवीर भाई ने पकड़ा था," उसने धीरे से कहा। "मेरा हाथ। और मैंने झटक दिया था।" उसने आँखें बंद कर लीं। "बीस साल से मैं उस झटके को याद करता हूँ।"
माँ चूल्हे के पास से एक गर्म रोटी उठाकर उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
"खा ले," वो बोलीं। "भूखे पेट की बात सीधी ऊपर जाती है।"
हरनाम ने रोटी देखी। फिर उसने देखा, जैसे बहुत दिनों बाद किसी ने उसे कुछ दिया हो। उसने रोटी थामी और उसकी आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया ताकि कोई देख न ले।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। हम दोनों के मन में एक ही बात थी — ये आदमी हमारा दुश्मन है, पर आज वो टूटा हुआ बैठा है।
"हरनाम," मैंने कहा। "तुम भैरव के लिए क्यों काम करते हो?"
उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ा। बहुत देर तक चबाया, जैसे जवाब मुँह में ही अटका हो।
"क्योंकि मेरा बेटा उसके हाथ में है," उसने कहा।
कमरे में हवा रुक गई।
"क्या मतलब?" मैंने पूछा।
हरनाम ने रोटी रख दी। उसके हाथ अब काँप रहे थे।
"मेरा बेटा, मुन्ना। उम्र अठारह साल। दो साल पहले वो अखाड़े में उतरना चाहता था। भैरव ने कहा — पहले पानी पी। मुन्ना ने पी लिया।" उसकी आवाज़ टूट गई। "छह महीने में वो बीमार पड़ गया। अब वो शहर के एक अस्पताल में है। बिस्तर से उठ नहीं सकता। और भैरव कहता है — जब तक तू मेरे काम आएगा, तब तक मुन्ना को दवा मिलती रहेगी। बंद कर दिया तो वो मर जाएगा।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
टिंकू ने अपना मुँह फेर लिया। उसकी आँखें लाल थीं।
"तो तुमने अपनी अंगूठी क्यों उतारी?" गुड़िया ने पूछा। वो अब तक चुप बैठी थी। बारह साल की बच्ची ने वो सवाल पूछा जो हम तीनों नहीं पूछ पाए थे।
हरनाम ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि आज सुबह भैरव ने कहा — कल तू अखाड़े में खड़ा होकर गवाही देगा कि वीर ने ही मिट्टी में ज़हर घोला था।" उसने अपना सिर झुका लिया। "मैंने मना किया। तो उसने मेरी उँगली से अंगूठी खींच ली और कहा — तेरी ये अंगूठी तेरे बेटे की दवा से ज़्यादा कीमती है क्या?"
माँ ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
"तो तुमने उसे उतार दिया," मैंने कहा।
"नहीं।" हरनाम ने सिर उठाया। उसकी आँखों में अब कुछ और था। गुस्सा। बीस साल का गुस्सा। "मैंने उससे छीन ली। गुस्से में। फिर भागकर यहाँ आ गया। बारिश में। अंधेरे में। रास्ते में वो गिर गई।"
"तो अंगूठी तुम्हारी खुद की है," मैंने कहा। "ये टूटी कैसे?"
हरनाम ने अपनी हथेली खोली। उसमें एक छोटा-सा ज़ख्म था।
"अंगूठी छीनते वक़्त भैरव ने मेरी उँगली मरोड़ दी। अंगूठी दब गई और टूट गई।" उसने हाथ बंद कर लिया। "दर्द अब भी है।"
माँ उठीं। वो रसोई से पोंछा लेकर आईं और हरनाम के हाथ पर लपेट दिया। पोंछे पर पानी था, ठंडा।
हरनाम ने माँ की तरफ़ देखा। कुछ ऐसे देखा जैसे किसी ने बहुत सालों बाद उसका नाम लिया हो।
"तुम बैठो," माँ ने कहा। "और पूरी बात बताओ। कैसे भैरव ने तुम्हें अपना बनाया।"
हरनाम बैठा। फ़ाइल खोली। उसके अंदर काग़ज़ थे — पुराने, पीले, कुछ फटे हुए।
"बीस साल पहले," उसने शुरू किया, "मैं इसी अखाड़े का हिसाब रखता था। ईमानदारी से। रघुवीर भाई मुझे अपना भाई कहते थे। उस दिन मैंने काग़ज़ों में कुछ गड़बड़ देखी — मिट्टी बेचने का हिसाब, पैसों की हेराफेरी। मैंने रघुवीर भाई को बताया, और उन्होंने भैरव को बुलाया। भैरव उस वक़्त सिर्फ़ मज़दूरों का मुखिया था।"
वो रुका। रोटी का एक टुकड़ा मुँह में डाला, जैसे बोलने से पहले अपना गला गीला कर रहा हो।
"रघुवीर भाई ने उसे डाँटा। भैरव ने सिर झुकाया, माफ़ी माँगी। मैं उस वक़्त समझा — मामला खत्म।" हरनाम ने कराहकर साँस ली। "पर एक हफ़्ते बाद रघुवीर भाई की तबीयत बिगड़ने लगी। फिर उनके पैर सुन्न हो गए। फिर वो व्हीलचेयर पर आ गए।"
"और तुम?" मैंने पूछा।
"और मैंने उसी हफ़्ते अपना बेटा खो दिया।" उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे ये बात वो बहुत बार खुद से कह चुका हो। "मेरा पहला बेटा। दो साल का। बुखार आया और चला गया। उस वक़्त मैंने सोचा — भगवान ने ले लिया। पर अब सोचता हूँ, कहीं भैरव ने उस वक़्त भी…"
वो पूरा नहीं बोला। बोलने की ज़रूरत नहीं थी।
माँ ने उसका कंधा थपथपाया।
"तू डर के मारे उसके साथ चला," वो बोलीं। "डर कोई गुनाह नहीं है, बेटा। गुनाह तब होता है जब इंसान डर को अपना मालिक बना ले।"
हरनाम ने माँ की तरफ़ देखा। उसकी आँखों से एक आँसू गिरा और रोटी पर गिरा।
"आज तक किसी ने मुझसे ऐसे बात नहीं की," उसने कहा।
टिंकू ने अपनी टोपी उतार दी और घुटनों पर रख ली, जैसे उसने भी कुछ भारी सुना हो।
"तो तुमने मुझे ज़हर क्यों बेचा?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ में पहली बार सच्चा दर्द था। "मेरी दुकान जल गई, हरनाम। मेरी माँ का सपना जल गया।"
हरनाम ने सिर झुकाया।
"मैंने तुम्हारी दुकान नहीं जलाई। मैंने सिर्फ़ पैसे दिए।" उसने फ़ाइल की तरफ़ देखा। "ये सब यहाँ लिखा है — कब, किसको, कितना। मैंने हर चीज़ का हिसाब रखा है। बीस साल का। क्योंकि मुझे पता था, एक दिन इसकी ज़रूरत पड़ेगी।"
"यही हरी कवर वाली कॉपी?" मैंने पूछा।
हरनाम का चेहरा बदल गया।
"तुम्हें कैसे पता?"
"मुंशीजी ने बताया था।"
वो हँसा। कड़वी हँसी।
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