Spirit of a Fighter198 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 198

7 min read November 5, 2026

"उसका बेटा मरा," उन्होंने कहा। "उसके हिसाब से बदला यही है कि जिसने उसे मारा, उसका भी कोई मरे।"

"तो वो किसे मारेगा?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैं पढ़ नहीं पाया।

"वो चाहता है," उन्होंने कहा, "कि भैरव को वही मौत मिले जो उसके बेटे को मिली। धीरे-धीरे। बूँद-बूँद। और उसके लिए उसे भैरव को ज़िंदा चाहिए।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"तो अगर हरनाम भैरव को मारेगा," टिंकू ने धीरे से कहा, "तो हमारा सबूत मर जाएगा। हमारा गवाह मर जाएगा। सब कुछ मर जाएगा।"

"और अगर भैरव हरनाम को मारेगा," मैंने कहा, "तो जो उसने बीस साल में जाना, वो सब अपने साथ ले जाएगा।"

माँ ने चूल्हे में और लकड़ी डाली। आग भड़की, और उसकी लपटों में मुझे कुछ दिखा — शायद मेरा ही चेहरा, शायद कुछ और।

"तो तेरा काम क्या है?" माँ ने पूछा।

मैंने अंगूठी जेब से निकाली और सामने रख दी।

"मेरा काम है," मैंने कहा, "इन दोनों में से किसी को भी दूसरे को मारने से पहले सच सामने लाना। अगर हरनाम भैरव को मारेगा, तो सच उसके साथ मरेगा। और अगर भैरव हरनाम को मारेगा, तो सच भैरव के पास रहेगा। दोनों में से किसी में भी पहलवानों को इंसाफ़ नहीं मिलेगा।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने वो किया जो उन्होंने बहुत कम किया था — मुस्कुराईं, और उनकी आँखों में पानी था।

"अब तू बात कर रहा है," उन्होंने कहा। "मुझे तेरे पापा की बात याद आ गई। उन्होंने भी एक बार कहा था — 'मुझे कुश्ती नहीं, इंसाफ़ चाहिए।' और वो उसी दिन गए।"

उन्होंने मेरा सिर सहलाया।

"पर तू अकेले नहीं जाएगा," उन्होंने कहा। "कल सुबह हम सब साथ जाएँगे। मैं, तू, गुड़िया, टिंकू, कालू, और वो लड़की — मीरा। और बाकी जो भी हमारे साथ खड़ा होना चाहे।"

गुड़िया ने चाय का प्याला नीचे रखा।

"माँ," वो बोली, "मैं भी जाऊँगी?"

"तू तो सबसे आगे होगी," माँ ने कहा, और गुड़िया का चेहरा खिल उठा। "क्योंकि तेरे भैया को जब गुस्सा आता है, तो उन्हें रोकने वाली सिर्फ़ तू है।"

मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, और उसके गालों पर चाय की भाप से लाली आ गई थी।

"पर एक बात," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ फिर कड़ी हो गई। "कल जो होगा, वो मिट्टी में नहीं, दिमाग़ से लड़ा जाएगा। तू जो भी करेगा, सोचकर करेगा। मेरा वादा है — जब तक तू मेरे साथ है, तू अकेला नहीं गिरेगा।"

मैंने चाय खत्म की और प्याला नीचे रख दिया।

"माँ," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"आपने कहा कि हरनाम की अंगूठी आपने बीस साल पहले देखी थी। उस दिन, जब पापा की कुर्सी आई थी।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "आपने वो अंगूठी कहाँ देखी थी? किसकी उँगली में?"

माँ ने चूल्हे की तरफ़ देखा। आग अब धीमी हो रही थी, और उसकी रोशनी में उनका चेहरा और भी पुराना लग रहा था।

"मैंने वो अंगूठी भैरव की उँगली में देखी थी," उन्होंने धीरे से कहा।

मेरे हाथ से प्याला फिसल गया।

वो ज़मीन पर गिरा। मिट्टी का प्याला टूट गया, और चाय फर्श पर फैल गई।

पर मुझे उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। मुझे सिर्फ़ माँ की वो बात सुनाई दी, जो हवा में लटकी रह गई।

"भैरव की उँगली में?" मेरी आवाज़ फटी हुई निकली। "माँ, आपने कहा ये हरनाम की अंगूठी है।"

"हाँ," माँ ने कहा, और उनकी आँखें अब भी आग में टिकी थीं। "उस दिन भैरव ने ये अंगूठी पहनी हुई थी। और उसने मुझे देखकर कहा था — 'ये मेरे भाई की निशानी है।'"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"भाई?" टिंकू ने धीरे से कहा। "हरनाम भैरव का भाई है?"

कालू काका अचानक उठ खड़े हुए। उनकी आँखें फटी हुई थीं, और उनके होंठ काँप रहे थे।

"नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने कभी नहीं सुना। "नहीं, ये नहीं हो सकता। मैंने हरनाम को… मैंने उसे…"

वो रुक गए। उन्होंने अपना मुँह हाथ से ढक लिया, और उनकी आँखों से पानी बहने लगा।

"काका?" मैंने कहा। "काका, क्या हुआ?"

कालू काका ने अपना हाथ नीचे किया। उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके भीतर से बीस साल का बोझ निकाल दिया हो।

"मैंने हरनाम को कभी भाई नहीं कहते सुना," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने हमेशा सोचा कि वो भैरव का नौकर है। पर अगर वो भैरव का भाई है…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तो बेटा, ये लड़ाई सिर्फ़ ज़हर की नहीं है। ये दो भाइयों की लड़ाई है। और दो भाइयों की लड़ाई में बाहर वाला हमेशा बीच में कुचलता है।"

मैंने टूटे हुए प्याले की तरफ़ देखा। चाय फर्श पर फैल रही थी, और उसमें आग की रोशनी नाच रही थी।

"तो हमें उन्हें बताना होगा," मैंने कहा, "कि हम बाहर वाले नहीं हैं।"

मैंने अंगूठी उठाई। टूटा हुआ कोना अब भी उतना ही तेज़ था।

"माँ," मैंने कहा, "कल सुबह हम अखाड़े जाएँगे। पर पहले मुझे मीरा से मिलना है।"

"क्यों?"

"क्योंकि उसके पास पापा की टूटी घड़ी है," मैंने कहा, "और अब मुझे पता है कि उसे कब चलाना है।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। एक लंबे पल के लिए। और फिर उन्होंने सिर हिलाया।

"जा," उन्होंने कहा। "पर सुबह होने से पहले लौट आ। और ये याद रख — जो लड़ाई सच के लिए लड़ी जाती है, उसमें हारने का डर नहीं होता। सिर्फ़ देर से पहुँचने का डर होता है।"

मैंने अंगूठी अपनी जेब में रखी और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

पर जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, मेरे पैर ठिठक गए।

बाहर, आँगन में, बारिश के पानी के बीच, एक आदमी खड़ा था।

लंबा, पतला, चश्मा, हाथ में फ़ाइल। उसकी धोती कीचड़ से भरी हुई थी, और उसके चश्मे पर बारिश की बूँदें टपक रही थीं।

हरनाम।

हरनाम ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में टूटी अंगूठी पर नज़र गई। उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। सिर्फ़ थकान।

"अंदर आ जाओ," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में न डर था, न गुस्सा। "बारिश में खड़े रहोगे तो बुखार आ जाएगा।"

हरनाम अंदर आया। उसने अपने चश्मे पर जमी बूँदें पोंछीं और चौखट पर झुककर बैठ गया। फ़ाइल उसने गोद में रख ली।

"मैं लड़ने नहीं आया," उसने कहा। "मैं बताने आया हूँ।"

"क्या?" टिंकू बोला, और उसकी आवाज़ में ताना था। "कि तुमने हमारी दुकान में ज़हर घोला?"

हरनाम ने टिंकू की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोला, "मैंने नहीं घोला। मैंने बेचा ज़रूर था। ये मेरा काम था। पर ज़हर मेरा नहीं था।"

"तो किसका था?" मैंने पूछा।

वो चुप रहा। फ़ाइल की तरफ़ देखता रहा।

"भैरव का," माँ ने कहा। जैसे वो जवाब पहले से जानती हों।

हरनाम ने सिर हिलाया। "बीस साल से मैं उसके लिए यही कर रहा हूँ। जो वो कहे, बेचो। जो वो कहे, चुप रहो।" उसने अपनी कलाई घुमाई। उस पर भी एक अंगूठी थी। वैसी ही, पर साबुत। "ये अंगूठी पहनने का मतलब था — मैं उसका हूँ। न भाई, न दोस्त। सिर्फ़ उसका।"

"तुम उसके भाई हो," मैंने कहा।

वो हँसा। छोटी, सूखी हँसी। "भाई उसे कहते हैं जिसे वो अपने साथ खड़ा रहने दे। मुझे उसने हमेशा बाहर खड़ा रखा। कल से तुम अखाड़े में जाकर उससे पूछना — वो खुद बताएगा कि भाई किसे कहते हैं।"

"तुम क्यों आए?" माँ ने पूछा। "आज, इस बारिश में।"

हरनाम ने फ़ाइल खोली। उसमें कुछ काग़ज़ थे, सूखे और साफ़।

"क्योंकि कल वो तुम्हें बर्बाद कर देगा," उसने कहा। "और उसके बाद मेरा भी कोई काम नहीं रहेगा। मैं बीस साल उसकी परछाईं बना रहा। अब परछाईं भी थक गई है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरका दिए। "इनमें लिखा है कि वो कहाँ से ज़हर लाता है, किसे बेचता है और किसको डराता है। कल सुबह अखाड़े में सब पहुँच जाएगा।"

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