Spirit of a Fighter – Chapter 197
"माँ, आप घर चलिए। आपके बिना मैं कुछ नहीं करूँगा। पर मुझे भैरव को ये जताना है कि मैं डरा नहीं।"
"कैसे?" माँ ने पूछा।
मैंने ज़मीन से पीतल की डिब्बी उठाई। उसका ढक्कन टूटा हुआ था, और पीला काग़ज़ अब भीग चुका था। मैंने उसे सावधानी से खोला। अक्षर धुँधले पड़ रहे थे, पर पढ़े जा सकते थे — "चौथी खुराक। सरस्वती।"
माँ के हाथ से लाठी फिसल गई।
वो मेरी तरफ़ झुकीं, और उनकी आँखें उस काग़ज़ पर टिक गईं। उनकी साँस रुक गई।
"ये…" उन्होंने धीरे से कहा, "ये तो मेरा नाम है।"
"हाँ," मैंने कहा। "भैरव ने आपको चौथी खुराक देने का लिखा था। और नीचे लिखा है — 'पहले उसका बेटा।'"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा था — वो डर जो माँ को अपने बेटे के लिए होता है, अपने लिए नहीं।
"तो उसने मुझे ज़हर देने से पहले तुझे चुना," उन्होंने कहा। "वो मेरी जान लेकर मुझे नहीं मारना चाहता। वो मेरे बेटे को मारकर मुझे मारना चाहता है।"
मेरे पेट में एक ठंडी सी चीज़ फैल गई।
"माँ," मैंने कहा, "मैं आपको अब अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"तू मुझे छोड़ेगा," माँ ने कहा, और उन्होंने लाठी फिर उठाई। "क्योंकि अगर तू मेरे पास बैठा रहेगा, तो वो अपना काम करने लगेगा। और मैं तेरे पीछे छुपने वाली माँ नहीं हूँ।"
गुड़िया ने अचानक झुककर ज़मीन की तरफ़ देखा।
"भैया," वो बोली, "ये क्या है?"
वो कीचड़ में से कुछ उठा रही थी। मैंने लालटेन की रोशनी उसकी तरफ़ की।
उसकी हथेली में एक टूटी हुई अंगूठी थी। सोने की, पर पुरानी, और उसका एक कोना टूटा हुआ। अंगूठी के ऊपर एक निशान बना था — छोटा-सा, जैसे कोई अक्षर हो, या कोई मोहर।
"ये तो भागते हुए आदमियों में से किसी की गिरी होगी," गुड़िया ने कहा। "दुकान के पास।"
मैंने अंगूठी उसकी हथेली से ली। वो ठंडी थी, और उस पर कीचड़ की पतली परत थी। मैंने उसे अपनी हथेली में पोंछा और ध्यान से देखा।
और तभी माँ ने एक आवाज़ निकाली। कोई शब्द नहीं — बस एक आवाज़, जैसे किसी ने उनके सीने में हवा भर दी हो।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
उनका चेहरा पीला पड़ गया था। नहीं — सफ़ेद। ऐसा सफ़ेद जैसे चक्की का आटा। उनकी आँखें अंगूठी पर टिकी हुई थीं, और उनके होंठ खुल गए थे, पर कुछ बोल नहीं रहे थे।
"माँ?" मैंने कहा। "माँ, क्या हुआ?"
उन्होंने धीरे-धीरे मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे वो किसी बहुत दूर से बोल रही हों।
"ये अंगूठी…" उन्होंने कहा। "ये तो हरनाम की है।"
मेरे हाथ में अंगूठी भारी हो गई।
"हरनाम की?"
"हाँ।" माँ ने लाठी और कसकर पकड़ी। "मैंने ये अंगूठी उसकी उँगली में देखी है। बीस साल पहले। उस दिन, जब तेरे पापा की कुर्सी आई थी।"
मैंने अंगूठी को उजाले में और ऊपर उठाया। उसका टूटा हुआ कोना मेरी आँखों के सामने चमका।
"तो हरनाम खुद आया था?" मेरी आवाज़ कड़की। "टिंकू की दुकान जलाने? अपने ही आदमियों के साथ? अपनी अंगूठी उतारकर?"
कालू काका ने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।
"नहीं," उन्होंने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "बेटा, तू समझ नहीं रहा। हरनाम ये अंगूठी कभी नहीं उतारता। ये उसके बेटे की निशानी है। उसने ये उस दिन पहनी थी जिस दिन उसका बेटा मरा था। उसने कहा था कि जिस दिन बदला लेगा, उसी दिन उतारेगा।"
मैंने अंगूठी को अपनी हथेली पर रखा और देखा। उस पर लगी कीचड़ की परत के नीचे, टूटे हुए कोने के पास, कुछ खुदा हुआ था। मैंने लालटेन और करीब लाई।
यह एक तारीख़ थी। कोई साल, कोई महीना, कोई दिन — जो पत्थर पर लिखा हो, ऐसे अक्षरों में।
"काका," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ में अब वो गुस्सा नहीं था जो अभी था। बस एक ठंडी, साफ़ चीज़ थी। "अगर ये अंगूठी हरनाम ने उतारी है, तो इसका मतलब है कि उसने अपना बदला लेने की क़सम तोड़ दी।"
"या," टिंकू ने धीरे से कहा, "इसका मतलब है कि उसने अपना बदला पूरा कर लिया।"
सन्नाटा छा गया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो बात थी जो मैं समझ गया — पर समझना नहीं चाहता था।
"वीर," उन्होंने कहा, "अगर हरनाम ने अपनी अंगूठी उतार दी है, तो वो कहीं और है। और जो आदमी अपनी क़सम उतारकर कहीं और होता है, वो वहाँ होता है जहाँ सबसे बड़ा काम बाकी है।"
मैंने अंगूठी मुट्ठी में कस ली। टूटा हुआ कोना मेरी हथेली में चुभा, और इस बार मैंने दर्द महसूस किया।
"अखाड़ा," मैंने कहा। "वो अखाड़े में है।"
कालू काका ने अचानक मेरी बाँह पकड़ ली। उनकी पकड़ में वो ताक़त नहीं थी जो कभी मिट्टी गूंधने में थी, पर उनकी आँखों में वो डर था जो सब कुछ कह रहा था।
"बेटा, तू वहाँ नहीं जा सकता। आज रात नहीं। तहखाने की मिट्टी अब भैरव के पास नहीं है। हरनाम उसे उठा चुका है। अगर वो दोनों एक साथ हैं, तो…"
"तो क्या?" मैंने कहा। "तो मैं बैठा रहूँ? काका, आपने अभी-अभी कहा कि वो मेरी जगह लेना चाहता है। अब कह रहे हैं कि वो मिट्टी उठा चुका है। काका, मुझे साफ़ बताइए — हरनाम किसके साथ है? भैरव के, या अपने?"
कालू काका ने मेरी बाँह छोड़ दी। उन्होंने अपना चेहरा हाथों से ढक लिया।
"मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "और यही सबसे बुरी बात है, बेटा। मैं बीस साल से ये मिट्टी सींच रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि कौन किसके साथ है। पर आज… आज पहली बार मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।"
माँ ने अपना दुपट्टा ठीक किया। उन्होंने उसे सिर पर साधा, और फिर गुड़िया का हाथ पकड़ा।
"अब सुनो सब," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो बात लौट आई जो चक्की के पत्थर में होती है। "आज रात कोई अखाड़ा नहीं जाएगा। न वीर, न टिंकू, न कालू। आज रात सब मेरे घर में सोएँगे।"
"माँ—"
"चुप।" उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसी नज़र से देखा कि मेरा मुँह अपने आप बंद हो गया। "तेरे पापा भी इसी तरह गए थे। रात में, अकेले, गुस्से में। और सुबह मुझे कुआँ मिला। बीस साल बाद भी मैं सोचती हूँ — काश उस रात कोई उनके रास्ते में खड़ा होता।"
उनकी आवाज़ लड़खड़ाई। उन्होंने एक गहरी साँस ली और खुद को सँभाला।
"आज मैं तेरे रास्ते में खड़ी हूँ," उन्होंने कहा। "और तू मुझे दोबारा वो सुबह नहीं देखने देगा।"
मेरी आँखें भर आईं। गुड़िया ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"ठीक है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी थी। "आज रात हम घर जाएँगे।"
टिंकू ने सिर हिलाया। कालू काका ने आँखें पोंछीं। और हम सब पलटकर गाँव की तरफ़ चलने लगे।
पर मैंने अंगूठी अपनी जेब में नहीं रखी। मैंने उसे अपनी मुट्ठी में रखा, और चलते-चलते उसे बार-बार दबाया। टूटा हुआ कोना मेरी हथेली में चुभता रहा, और हर बार मुझे याद दिलाता रहा — हरनाम ने अपनी क़सम उतार दी है। हरनाम कहीं और है।
घर पहुँचकर माँ ने सबको चारपाई पर बिठाया। उन्होंने चूल्हा जलाया और उसमें गुड़ और अदरक डालकर चाय बनाई। चाय में वो स्वाद था जो सिर्फ़ माँ के हाथ में आता है — कड़वी, पर पीछे से मीठी।
मैंने चाय का प्याला दोनों हाथों में पकड़ा और उसकी गर्माहट को अपनी हथेलियों में जाने दिया।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "अगर हरनाम ने अपना बदला पूरा कर लिया है, तो उसका बदला क्या है?"
माँ ने चूल्हे की तरफ़ देखा। आग की रोशनी उनके चेहरे पर नाच रही थी।
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