Spirit of a Fighter – Chapter 196
मुझे याद आया। उस रात की हवा, संदूक के अंदर से उठती धूल, और हरनाम की टूटी हुई आवाज़ — "मेरा बेटा भी…"
"तो वो भैरव के खिलाफ़ है?"
"वो भैरव के खिलाफ़ है," कालू काका ने कहा, "पर तेरे साथ नहीं है। वो अपना बदला खुद लेना चाहता है। और उसके हिसाब से तू उसके रास्ते में खड़ा है।"
टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ ली। उसका हाथ काँप रहा था, पर उसकी आवाज़ में वो पुरानी हिम्मत लौट आई थी।
"भाई," वो बोला, "अगर हरनाम दोनों तरफ़ से खेल रहा है, तो हम बीच में फँसे हैं। आज रात हमें कुछ नहीं करना चाहिए।"
"कुछ नहीं करना?" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "टिंकू, तेरी दुकान जल गई। तेरे गले पर हाथ पड़ा। और तू कह रहा है कुछ नहीं करना?"
"मैं कह रहा हूँ सोचकर करना," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो पहले कभी नहीं थी। "भाई, मैं डरा हुआ हूँ। पर डरकर भागना और डरकर सोचना — दोनों अलग बातें हैं।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। उसकी टोपी गायब थी, बाल बिखरे हुए थे, और कान के पीछे वाली पेंसिल टूटी हुई लटक रही थी।
उसी पल मुझे एहसास हुआ कि मेरे हाथ में क्या है।
मैंने नीचे देखा। मेरी मुट्ठी में श्यामू की झोपड़ी से उठाई वो फटी हुई डिब्बी थी — पीतल की, जिसका ढक्कन टूटा हुआ था और जिसमें से वो पीला काग़ज़ निकला था। मैं उसे भूल ही गया था।
और उसी वक़्त मेरे भीतर कुछ ऐसा उबला जो मैं रोक नहीं पाया।
भैरव ने माँ को ज़हर दिया। भैरव ने चक्की जलाई। भैरव ने टिंकू की दुकान जलाई। भैरव ने गुड़िया की कॉपी फाड़ी। भैरव ने पापा को कुएँ में बंद किया। भैरव ने हरनाम के बेटे को मारा। भैरव ने लुट्टन को ज़हर पिलाया। भैरव ने रणवीर सिंह को व्हीलचेयर पर बिठाया।
और अब भैरव ने हरनाम को भी अपने खिलाफ़ कर दिया — और हरनाम मेरे खिलाफ़ खड़ा हो गया।
मैंने डिब्बी को कसकर पकड़ा। पीतल के किनारे ने मेरी हथेली में चुभन दी, पर मुझे दर्द महसूस नहीं हुआ।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसी मैंने पहले कभी नहीं सुनी। "आप घर जाइए। टिंकू, तू भी। मैं अखाड़े जा रहा हूँ।"
"वीर—"
"मैं अखाड़े जा रहा हूँ," मैंने दोहराया, और मैंने किसी को कुछ कहने का मौका नहीं दिया। मैं पलटा और गली की तरफ़ बढ़ने लगा।
पर मैं दो कदम ही चल पाया था।
सामने, अंधेरे में, कोई खड़ा था।
दुपट्टा सिर से खिसका हुआ। हाथ में लाठी। साँस फूलती हुई, जैसे वो दौड़कर आई हो। और उसके पीछे, दो चोटियों वाली एक छोटी परछाई, जो रो रही थी।
माँ।
मेरे पैर अपने आप रुक गए।
गुड़िया माँ के पीछे से भागकर मेरी तरफ़ आई और मेरी कमर से लिपट गई। उसका शरीर काँप रहा था। उसने अपना चेहरा मेरे पेट में छिपा लिया, और उसकी सिसकियाँ मेरी नाभि तक पहुँच रही थीं।
"भैया," वो रो रही थी, "मैंने सुना… मैंने सुना दुकान जल गई… मुझे लगा तुम…"
मैंने उसका सिर सहला दिया। मेरा गला सूख रहा था।
माँ मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं। उन्होंने लाठी ज़मीन पर टिकाई और सीधा मेरी आँखों में देखा।
और फिर उन्होंने वो बात कही जो मैंने उनके मुँह से पच्चीस साल में कभी नहीं सुनी थी।
"अगर तू गुस्से में गया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो सिर्फ़ चक्की के पत्थर में होती है, "तो तेरी माँ को कौन देखेगा?"
मैं ठिठक गया।
"मरे हुए बाप का बदला लेने से पहले ज़िंदा माँ की फ़िक्र कर।"
वो शब्द मेरे सीने पर पत्थर की तरह लगे।
मेरे हाथ ढीले पड़ गए। डिब्बी मेरी उँगलियों से फिसली और कीचड़ में गिर पड़ी। उसके टूटे ढक्कन से वो पीला काग़ज़ बाहर निकल आया, और बारिश ने उसे भिगोना शुरू कर दिया।
मैं माँ के पैरों के पास बैठ गया।
नहीं सोचकर। नहीं। मेरे घुटने अपने आप मुड़ गए, जैसे किसी ने मेरे भीतर की सारी हड्डियाँ निकाल ली हों।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लगी। "माँ, मैं… मैं उसे छोड़ नहीं सकता। वो मेरे सामने खड़ा होकर मेरी माँ का नाम लेता है। वो कहता है कि तीन दिन में तू अपनी माँ को खो देगा। और मैं यहाँ बैठा…"
माँ झुकीं। उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। उनका हाथ ठंडा था, और उसमें आटे की वो पुरानी गंध थी जो मेरे बचपन से है। मैंने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे पता है," उन्होंने धीरे से कहा। "मुझे पता है तेरे भीतर क्या जल रहा है। तू सोचता है मुझे नहीं दिखता? जब से तेरे पापा गए, मैं रोज़ सुबह चक्की चलाते वक़्त तेरा चेहरा देखती हूँ। और मैं जानती हूँ कि उस चेहरे पर जो सवाल लिखा है, उसका जवाब मेरे पास नहीं है।"
मेरी आँखें खुल गईं। उनमें पानी भर आया था, और वो पानी मेरे गालों से बहकर मेरे होंठों पर आ गया। नमकीन।
"पर सुन," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो नरमी थी जो सिर्फ़ तब आती है जब वो कोई बहुत बड़ी बात कहने वाली हों। "गुस्सा तेज़ है। गुस्सा तेरे पापा की तरह है — मिट्टी की तरह, जो तुझे ऊपर उठाती है। पर अंधा गुस्सा भैरव का हथियार है। उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी उसी हथियार से जीती है। वो चाहता है कि तू भी वही उठाए।"
"माँ—"
"उसे अपना हथियार मत बना," उन्होंने मेरा माथा चूमते हुए कहा। "उसके हथियार से नहीं, अपने हाथ से लड़। और अभी, इस वक़्त, तेरा हाथ किसी को गिराने के लिए नहीं, इस लड़की को सहारा देने के लिए है।"
गुड़िया ने अपना चेहरा मेरे पेट से उठाया। उसके गाल भीगे हुए थे और उसकी नाक बह रही थी, और फिर भी उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो उसने माँ से ली है।
"भैया," उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छोटी थीं, पर पकड़ थी। "मैं डर गई थी। जब दुकान जलने की बात सुनी, तो मेरे हाथ-पैर ठंडे हो गए। मुझे लगा कि तुम…"
वो रुक गई। उसने गला साफ़ किया।
"पर अब नहीं डरूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हिम्मत थी जो किसी स्कूल की कॉपी में लिखे "जो लड़ता है, वही जीतता है" से आती है। "मैंने आज फैसला कर लिया। जो मेरे भैया को छुएगा, मैं उसका नाम उसकी माँ के पास जाकर बोलूँगी।"
मेरी हँसी फूट पड़ी। कीचड़ में बैठे हुए, आँसुओं के बीच, मैं हँसा। और माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो बहुत कम आती है — दाँत भी नहीं दिखते, बस होंठ हिलते हैं।
"देख," माँ ने कहा, "ये तेरी बहन है। इसे देखकर सीख। ये डरती है, पर डर के आगे खड़ी हो जाती है।"
टिंकू मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"भाई," वो बोला, "मैं भी कुछ कहूँ?"
"आज तो तू बहुत कुछ कह ही रहा है।"
"तो सुन।" उसने एक गहरी साँस ली। "मेरी दुकान जली है। मैं उसी ज़मीन पर नई दुकान बनाऊँगा। मिट्टी से, पत्थर से, अपने हाथों से। और उस दिन मैं तेरे लिए नहीं, खुद के लिए मिठाई बनाऊँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, पर बारिश में, और उसकी टूटी हुई पेंसिल अभी भी कान के पीछे लटक रही थी।
"तू मिठाई बनाएगा," मैंने कहा, "तो शक्कर की जगह नमक डाल देगा।"
"नमक क्यों डालेगा?" वो गुस्से से बोला, फिर रुका, और फिर हम दोनों हँस पड़े। कालू काका ने भी हँसने की कोशिश की, पर उनकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी।
मैं उठा। मेरी धोती पर कीचड़ लगा था, और मैंने उसे झाड़ा नहीं। मैंने माँ का हाथ पकड़ा।
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