Spirit of a Fighter195 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 195

7 min read November 5, 2026

मैंने खाया। बेसन और घी की गंध मेरे मुँह में फैल गई, और उसके साथ एक छोटी सी राहत भी। जैसे आज की रात में एक कोना साफ़ हो गया हो।

फिर हवा बदली।

मैंने अपना सिर उठाया। मेरी नाक में कुछ घुसा — हल्का, तेज़, चुभता हुआ। वो गंध मैंने पहले भी सूँघी थी। हाशिये पर। रस्सी और जंग की। और उसके ऊपर एक कड़वाहट जो अब तक सिर्फ़ भैरव के गिलासों से आती थी।

मैं खड़ा हो गया। दुकान के पीछे, नीम के पेड़ की तरफ़।

"कौन है वहाँ?" मेरी आवाज़ तेज़ थी।

पत्ते हिले। फिर सन्नाटा।

"भाई?" टिंकू मेरे पीछे आ गया।

मैंने उसे हाथ से रोका। और इस बार जब गंध आई, तो मैंने उसे पहचान लिया। वही गंध — जो मैंने भैरव के आदमियों की साँस में सूँघी थी। पर इस बार कुछ अलग था। इसके साथ एक और गंध थी। मिट्टी। सूखी, पर अखाड़े की लाल मिट्टी।

मैं नीम के पेड़ की तरफ़ बढ़ा। पेड़ के नीचे ज़मीन पर कुछ पड़ा था। मैंने झुककर उठाया।

एक तरफ़ा जूता। पुराना, फटा हुआ। अखाड़े के मज़दूरों का जूता।

टिंकू ने उसे देखा और उसकी साँस रुक गई। "भाई, ये तो…"

"क्या?"

"ये जूता… मैंने कहीं देखा है।"

"कहाँ?"

वो कुछ देर सोचता रहा, फिर उसका चेहरा बदल गया। "कालू काका के पास। जब वो मिट्टी गूंधते हैं, तब इसे पहनते हैं। ये उनका जूता है।"

मेरे हाथ में जूता था, और मेरा दिल किसी और दिशा में भाग रहा था। अगर ये कालू काका का जूता है, तो वो यहाँ क्यों था? और अगर वो यहाँ था, तो उसका दूसरा जूता कहाँ है?

मैंने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। मेरी नाक ने काम करना शुरू किया। मैंने हवा को पढ़ा — गंध की परतों को अलग किया।

नीम के पत्ते। कीचड़। टूटा हुआ टीन। लड्डू का घी। और फिर वो — मिट्टी, हल्की सी सोंधी। जो अखाड़े की लाल मिट्टी में पड़ी पुरानी परत से आती है। वो परत जिसे कालू काका ने खुद बिछाया था। वो गंध यहाँ तक आ रही थी। इसका मतलब जूते वाला यहीं से गुज़रा। और पीछे-पीछे नहीं, बल्कि यहीं से रुककर गया। ज़मीन पर राख भी थी — जैसे कोई बीड़ी पीकर फेंक गया हो। पर गाँव में बीड़ी कोई नहीं पीता सिवाय… सिवाय मज़दूरों के।

"टिंकू," मैंने कहा। "तेरी दुकान के पीछे से अखाड़े का रास्ता है?"

"हाँ। एक गली है। सीधे पिछवाड़े की दीवार तक।"

"तो जो आदमी ये जूता छोड़ गया, वो अखाड़े की तरफ़ गया है।"

मैंने जूता उठाया और कमर में खोंस लिया। "तू यहीं रुक। दरवाज़ा बंद कर और किसी को मत खोलना।"

"भाई, मैं—"

"टिंकू।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "तूने आज मेरी माँ का हाल पूछा, अपनी चोट भुलाकर। इससे ज़्यादा बहादुरी कोई नहीं कर सकता। अब मैं तेरी दुकान का हिसाब लेने जा रहा हूँ। और तू यहाँ रहकर उसका इंतज़ार कर।"

उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया।

मैं गली में मुड़ा।

रास्ता पतला था और अंधेरा। मेरे कदमों की आवाज़ मुझे अपनी ही लग रही थी। दस कदम चला, और मेरी नाक ने फिर काम किया। अब गंध साफ़ थी — जूते वाला आगे है। पास है। बहुत पास।

मैंने रफ़्तार बढ़ाई।

अचानक सामने से एक परछाई निकली और मेरे सामने आकर रुक गई।

छोटा कद। कुबड़ा। सफ़ेद दाढ़ी।

कालू काका।

उनके पैरों में एक ही जूता था। दूसरा पैर नंगा, कीचड़ में धँसा हुआ। उनकी साँस फूल रही थी, और उनके हाथ में एक लालटेन थी जो बुझी हुई थी।

"काका?" मेरी आवाज़ में हैरानी थी। "आप यहाँ?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर था — पर वो डर उस चीज़ का नहीं जो उन्होंने देखी थी। वो डर उस चीज़ का था जो वो कर रहे थे।

"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैं तुझे ही ढूँढ रहा था।"

"काका, आपका जूता—"

"गिर गया था," उन्होंने कहा, बहुत जल्दी। "भागते वक़्त।"

"भागते वक़्त?" मैंने आगे कदम बढ़ाया। "काका, मिठाई की दुकान में दो आदमी आए। उन्होंने टिंकू का गला पकड़ा। उन्होंने मेरी जगह लेने की बात की। और आप यहाँ भागते हुए मिल रहे हैं।"

कालू काका ने लालटेन अपनी छाती से लगा ली, जैसे उसमें कोई जान ही बची हो।

"बेटा, तेरी माँ… मैंने सुना तेरी माँ को…"

"माँ ठीक हैं," मैंने कहा। "और आप मेरा सवाल टाल रहे हैं।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने नज़रें चुरा लीं। और उसी पल मेरे पेट में एक झटका लगा — वही झटका जो तब लगता है जब कोई अपना ही कुछ छुपा रहा हो।

"काका," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। "आप उस दुकान के पीछे क्या कर रहे थे?"

उनके हाथ काँपे। लालटेन उनके हाथ से फिसल गई और कीचड़ में गिर पड़ी। उन्होंने उसे उठाने की कोशिश की, पर हाथ नहीं लगा।

"बेटा," उन्होंने कहा, और उनका गला रुँधा हुआ था। "मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ। पर पहले तू मुझसे एक वादा कर।"

"कैसा वादा?"

"जो मैं बताऊँ, उसे सुनकर तू गुस्सा मत करना।"

मेरी नसें खींच गईं। "काका, आप मुझे डरा रहे हैं।"

"मैं तुझे डरा नहीं रहा, बेटा।" उन्होंने एक गहरी साँस ली, और फिर बोले, "मैं तुझे बचाने आया हूँ।"

रात लंबी थी। और मेरे पीछे, टिंकू की टूटी दुकान की तरफ़ से एक और आवाज़ आई। कोई रो रहा था।

पर वो टिंकू नहीं था।

वो आवाज़ किसी और की थी। और वो आवाज़ मेरे ही नाम से बुला रही थी।

मैंने पलटकर देखा। अंधेरे में कुछ सफ़ेद हिला। फिर रुक गया। फिर फिर हिला।

"वीर…" आवाज़ आई। "वीर, मुझे माफ़ कर दे।"

मेरे हाथ के जूते की तरफ़ मेरी नज़र गई। कालू काका का जूता। पर अब मेरे दिमाग़ में एक और सवाल उभर रहा था।

अगर काका वो आदमी हैं जिन्होंने टिंकू की दुकान पर हमला करवाया, तो वो खुद क्यों यहाँ खड़े हैं, एक पैर नंगा, और माफ़ी माँग रहे हैं?

और अगर वो माफ़ी माँग रहे हैं, तो किस बात की?

मैंने लालटेन उठाई, और उसमें आग लगाकर कालू काका के चेहरे के सामने रख दी। उनकी आँखों में पानी था। और उस पानी में, मुझे वो सच दिख रहा था जिसे वो बीस साल से छुपा रहे थे।

"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब कोई डर नहीं था। "आपने मेरे पापा को कुएँ में बंद होते देखा था। और आज आपने मेरी जगह किसी और को खड़ा करने की बात सुनी। अब बताइए — वो कौन है जो मेरी जगह लेना चाहता है?"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनके होंठ काँपे, और फिर उन्होंने एक ऐसा नाम लिया जिससे मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

॥

नाम सुनकर मेरा खून जम गया।

"हरनाम?" मैंने कहा। "ठेकेदार हरनाम? जो भैरव के साथ मिलकर मौतों का हिसाब रखता है?"

कालू काका ने सिर नीचे कर लिया। उनका नंगा पैर कीचड़ में धँसा हुआ था, और वो उसे निकालने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे।

"वही," उन्होंने कहा। "पर बेटा, बात वो नहीं है जो तू सोच रहा है।"

"तो क्या है?" मेरी आवाज़ कड़की। "आपने खुद कहा — मेरी जगह कोई और लेने आया है। और अब कह रहे हैं हरनाम। काका, साफ़ बोलिए।"

कालू काका ने लालटेन उठाई, उसे जलाया, और उसकी रोशनी में उनका चेहरा और भी पुराना लगने लगा। झुर्रियों में कीचड़ भरा था।

"दुकान पर जो दो आदमी आए थे," उन्होंने धीरे से कहा, "उन्हें हरनाम ने भेजा था। पर हरनाम ने भैरव के कहने पर नहीं भेजा।"

मैं रुक गया।

"मतलब?"

"मतलब ये कि हरनाम अब भैरव का आदमी नहीं रहा।" कालू काका ने चारों तरफ़ देखा, जैसे हवा में भी कोई सुन रहा हो। "हरनाम का बेटा भी इसी ज़हर से गया था, बेटा। तुझे याद है? उसने खुद तहखाने में बताया था।"

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