Spirit of a Fighter – Chapter 194
लालटेन की रोशनी बुझी, और मेरे पैर अपने आप हिलने लगे।
मैं घर से बाहर निकला तो रात का अंधेरा ऐसा था जैसे किसी ने आसमान पर काला कपड़ा तान दिया हो। गुड़िया ने पीछे से आवाज़ दी — "भैया, मैं भी चलूँ" — पर मैंने पलटकर भी नहीं देखा। बस एक बात कही, "माँ के पास रह।" और मैं भागा।
गली का कीचड़ मेरी चप्पलों में भर गया। दो कदम चला और फिसला। घुटने के बल गिरा। हथेली पर चुभन हुई, पर मैंने देखा भी नहीं। उठा, और फिर भागा। साँस ऐसी चल रही थी जैसे सीने में आग जल रही हो।
टिंकू की दुकान सामने आई, और मेरी रफ़्तार अपने आप रुक गई।
शेड टूटा पड़ा था। टीन का पत्ता एक तरफ़ झूल रहा था, हवा में खड़खड़ करता हुआ। मिठाई की डिब्बियाँ ज़मीन पर बिखरी थीं — कुछ खुली, कुछ पैरों के नीचे कुचली हुई। और हवा में एक अजीब सी गंध थी।
घी की। जली हुई बूंदी की। और उसके नीचे… धुएँ की बदबू।
पर आग नहीं थी। कोई जला नहीं था।
मैंने चारों तरफ़ देखा। "टिंकू!" मेरी आवाज़ फटी हुई निकली। "टिंकू!"
कोई जवाब नहीं।
मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने डिब्बों को पैर से हटाया और अंदर झाँका। चूल्हा ठंडा था। कड़ाही उलटी पड़ी थी। मैंने फिर आवाज़ दी — "ओए टिंकू! कहाँ है तू? बोल!"
तभी शेड के पीछे से एक हल्की सी आवाज़ आई। जैसे कोई रो रहा हो और मुँह दबा रहा हो।
मैं दौड़कर पीछे गया।
वहाँ खुले तख्तों का ढेर पड़ा था। और उनके नीचे, सबसे कोने में, एक सिकुड़ी हुई परछाई बैठी थी। हाथ में लोहे का बेलन कसकर पकड़े हुए।
"टिंकू।"
वो उठा नहीं। बस बेलन को और कसकर पकड़ लिया, जैसे किसी को मारने की तैयारी में हो। फिर उसने सिर उठाया, और मुँह से एक आवाज़ निकली — "भाई…"
बस इतना। उसके बाद वो फूट पड़ा।
मैंने तख्ते हटाए और उसके पास बैठ गया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। बेलन उसकी मुट्ठी से छूटा नहीं। आँखों में आँसू थे, और उन आँसुओं में वो डर था जो आदमी बड़े होकर भी नहीं भूलता।
"दो आदमी आए थे," वो हाँफते हुए बोला। "मुँह पर कपड़ा बाँधा हुआ था। काले कपड़े। मैंने पूछा कौन हो, तो कुछ नहीं बोले। बस… बस डिब्बे पटकने लगे।"
"फिर?"
"फिर एक ने मेरा गला पकड़ा।" टिंकू ने अपना गला छुआ, जैसे अब भी उसमें उँगलियाँ महसूस हो रही हों। "बोला — 'अखाड़े से दूर रह, वरना अगली बार ये दुकान नहीं, तू जलेगा।'"
मेरी मुट्ठी भर गई। मैंने उसका हाथ पकड़कर उठाया, और तभी मेरी नज़र उसकी हथेली पर पड़ी।
काँच का टुकड़ा उसमें धँसा था। खून की बूँदें धीरे-धीरे टपक रही थीं, और वो ज़मीन पर गिरकर कीचड़ में घुल जाती थीं।
"तूने हाथ क्यों नहीं बचाया?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ में गुस्सा था, पर वो गुस्सा टिंकू पर नहीं था।
टिंकू ने काँपते होंठों से कहा, "भाई… तेरी माँ ठीक है?"
मैं रुक गया।
वो बैठा था, हाथ से खून बह रहा था, दुकान टूटी पड़ी थी, और उसने पहला सवाल यह पूछा — "तेरी माँ ठीक है?"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने बस सिर हिलाया। टिंकू ने देखा, और उसकी आँखों से एक आँसू और गिरा — इस बार राहत का।
"अच्छा हुआ," उसने कहा। "अच्छा हुआ।"
मैंने अपनी धोती का कोना फाड़ा और उसकी हथेली पर कसकर बाँध दिया। खून का रंग सफ़ेद कपड़े पर फैल गया। मैंने गाँठ कसी, और टिंकू ने दाँत भींच लिए पर एक आवाज़ नहीं निकली।
"सुन," मैंने उसका कंधा पकड़कर कहा। "तेरा नाम जिसने छुआ, उसका हिसाब मैं लूँगा। ये मेरा वादा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब भी डर था, पर उसके नीचे एक नई चीज़ जन्म ले रही थी — भरोसा। और उस भरोसे ने मुझे डरा दिया। क्योंकि मैं खुद नहीं जानता था कि मैं वो वादा पूरा कर पाऊँगा या नहीं।
"उठ," मैंने कहा।
वो उठा। फिर अचानक रुक गया, जैसे उसे कुछ याद आया हो। उसने मेरी आस्तीन पकड़ी और धीरे से, बहुत धीरे से बोला, "भाई, एक बात और…"
"क्या?"
"उनमें से एक ने… तेरा नाम लिया।"
मेरे पूरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।
"क्या कहा?"
टिंकू ने निगल लिया। "वो जाते-जाते बोला — 'वीर को अब अखाड़े में पैर रखने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उसकी जगह किसी और ने ले ली है।'"
उसकी बात खत्म हुई, और मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला जो शब्दों में नहीं था। "किसी और ने ले ली है।" कौन? कौन मेरी जगह ले सकता है? मैं तो अभी लड़ा भी नहीं, जीता भी नहीं। मेरी जगह क्या है? मैं तो बस एक मज़दूर हूँ जो अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरे चेहरे को पढ़ रहा था, और शायद उसे मेरे अंदर का सवाल दिख गया, क्योंकि उसने कहा, "भाई, तेरे चेहरे पर मत आने दे। ये वही चाल है जो माँ ने बताई थी। डराने की चाल।"
"माँ ने कब बताई?"
"जब तू भागा था।" टिंकू ने कहा। "माँ ने मुझे बुलाया और कहा — 'टिंकू, उसके पीछे जा। और अगर वो अपने आप से बात करे, तो उसे टोकना मत।'"
मेरे पैर रुक गए। "मैं अपने आप से बात करता हूँ?"
टिंकू ने कुछ नहीं कहा। उसने बस धीरे से अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
और तभी मुझे एहसास हुआ — पिछले कुछ पल से जो मैं सुन रहा था, वो सिर्फ़ हवा नहीं थी। मैंने कुछ बोला था। बहुत कुछ। पर मुझे याद नहीं कि क्या। मेरे होंठ सूखे थे, और मेरे हाथ में मिट्टी थी — गीली, ठंडी मिट्टी। मैंने उसे कब उठाया, पता नहीं।
"टिंकू," मैंने धीरे से कहा। "मैं जब भाग रहा था… मैंने क्या कहा था?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, "तू बार-बार यही कह रहा था — 'पापा, मैं आ रहा हूँ। मुझे रास्ता दिखा।'"
मैं चुप हो गया।
रात का अंधेरा मेरे चारों तरफ़ सिकुड़ने लगा। मैंने आसमान की तरफ़ देखा। कोई तारा नहीं था। बादल थे। और उसी वक़्त मुझे अपने भीतर वो सुर महसूस हुआ — वही जो उस रात सीने से आया था, वही जो शीशी जलाने के बाद शुरू हुआ था। धीमा। गुनगुनाता हुआ। जैसे कोई बहुत दूर से रस्सी खींच रहा हो।
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ी। "भाई, तेरे हाथ ठंडे हैं।"
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा। पर वो सच नहीं था।
मैंने उसका हाथ अपने हाथ से निकाला और उसकी दुकान की तरफ़ बढ़ा। उलटी कड़ाही उठाई, सीधी रखी। फिर मैंने ज़मीन पर बिखरे डिब्बे समेटने शुरू किए।
"भाई, ये तू क्या—"
"साफ़ कर," मैंने कहा। "कल सुबह जब लोग यहाँ आएँ, तो उन्हें ये नहीं दिखना चाहिए कि डर ने तेरी दुकान को गिरा दिया।"
टिंकू मेरे पास आया और झुककर डिब्बे समेटने लगा। एक डिब्बा मेरे हाथ में आया — टूटा हुआ, पर अंदर मिठाई सही सलामत थी। बेसन के लड्डू। टिंकू ने उन्हें रोज़ शाम बनाता था।
मैंने एक लड्डू उठाया और उसे देखता रहा।
"ये नहीं गिरा," मैंने कहा। "दो आदमी आए, डिब्बे पटके, पर ये लड्डू टूटे नहीं। तूने उन्हें बचाया।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उसके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान लौटी। "मैंने सोचा, भाई — मिठाई तो मिठाई है। अगर ये बच गई, तो कल भी बन जाएगी।"
उसकी इस बात पर मेरे अंदर कुछ गरम हुआ। मैंने वो लड्डू उसे दिया। उसने मना किया, पर मैंने ज़बरदस्ती उसके मुँह में डाल दिया। वो हँसा — हँसी में आँसू मिले हुए थे — और फिर उसने भी एक लड्डू उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"तेरे हिस्से का," उसने कहा।
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