Spirit of a Fighter – Chapter 185
मीरा ने श्यामू को उठाने में मदद की। हमने उसे रास्ते तक पहुँचाया, जहाँ से मीरा का घर जाता था। श्यामू की पत्नी और बच्चा पीछे-पीछे चले। जाते वक़्त श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ था — वो सवाल जो हर आदमी पूछता है जब वो अपनी आख़िरी उम्मीद किसी और के हाथ में रखता है।
"वीर…"
"कुछ मत बोलिए, काका। बस जाइए।"
वो चला गया, मीरा के सहारे से, धीरे-धीरे, हर कदम पर कराहता हुआ। मैंने उन्हें दूर जाते देखा, और फिर मैं पलटा।
झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। भीतर लालटेन मद्धम जल रही थी, जैसे कोई उसे भूल गया हो। मैं अंदर गया और खिड़की के नीचे झुका। तीसरी ईंट। चूल्हे की कालिख लगी हुई।
मैंने उसे छुआ। वो हिली। मैंने उसे खींचा, और वो आसानी से निकल आई — जैसे बीस साल से किसी ने उसे छुआ भी न हो। ईंट के पीछे एक खोखला था, और उसमें एक मुड़ा हुआ काग़ज़ रखा था। पुराना, पीला, किनारों से फटा हुआ।
मैंने उसे निकाला और खोला।
काग़ज़ पर लिखाई खुरदरी थी, जल्दी में लिखी हुई, जैसे किसी ने खड़े-खड़े लिखा हो। मैंने पहली लाइन पढ़ी — एक नाम। फिर नीचे — "चौथी खुराक।"
और जब मैंने वो नाम पढ़ा, तो मेरे हाथ से काग़ज़ छूट गया। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी। मेरे कानों में एक आवाज़ गूँजने लगी, और वो आवाज़ मेरी अपनी थी — "ऐसा नाम जो मेरे घर से जुड़ा है।"
क्योंकि वो नाम था — सरस्वती।
मेरी माँ।
मैं वहीं बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से उठाया और फिर से पढ़ा। वो नाम साफ़ था। सरस्वती। और उसके नीचे लिखा था — "पहली खुराक — शादी के बाद? नहीं। अभी नहीं। पहले उसका बेटा।"
मेरा दम घुटने लगा। पहले उसका बेटा। मतलब मैं। मेरा नाम अगला था। और माँ का नाम उसके बाद।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरी माँ। जो चक्की चलाती थी। जो हर सुबह चार बजे उठती थी। जो रात को मेरे सिर पर हाथ रखती थी और कहती थी — "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।" मेरी माँ, जिसके सीने में भी ज़हर की जलन थी। मैंने वो जलन पहचानी थी, पर मैंने उसका मतलब नहीं समझा था।
अब समझ आया।
भैरव ने मेरी माँ को भी ज़हर दिया था। और मैं उसके सामने खड़ा था, मुस्कुरा रहा था, ये सोचकर कि मैंने उसे बेनकाब कर दिया। जबकि वो मेरी माँ को बीस साल से खा रहा था।
मैंने काग़ज़ को मोड़ा और अपनी जेब में रखा। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे। अब उनमें वो ठंडक आ गई थी जो गुस्से से पहले आती है।
मैंने मुड़कर दरवाज़े की तरफ़ देखा। दरवाज़े पर कोई खड़ा था।
मैं चौंका नहीं। मैंने गंध पहचानी — केले के पत्ते की, और नारियल के तेल की, और उस पुरानी मिट्टी की जो सिर्फ़ अखाड़े की दीवारों से आती है।
"कालू काका," मैंने कहा।
वो अंदर आए। उनकी पीठ और झुकी हुई थी, और उनके हाथ में एक छोटी लालटेन थी जो उनके चेहरे को नीचे से रोशन कर रही थी। उनकी आँखें मेरी आँखों में थीं।
"मैंने सुना," उन्होंने धीरे कहा। "श्यामू के पास से आ रहा हूँ। मीरा बेटी ने सब बता दिया।"
"काका—"
"वो काग़ज़ मिल गया?"
मैंने जेब से निकालकर उन्हें दिया। उन्होंने लालटेन उठाई और पढ़ा। उनका चेहरा नहीं बदला। पर उनके हाथ थरथराने लगे, और लालटेन की लौ हिलने लगी।
"मुझे पता था," उन्होंने धीरे कहा। "मुझे पता था कि वो सिर्फ़ पहलवानों तक नहीं रुका।"
"काका, मेरी माँ—"
"तेरी माँ को पहली खुराक नहीं मिली," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सख्त हो गई। "ये देख — यहाँ लिखा है 'पहली खुराक — शादी के बाद? नहीं। अभी नहीं।' मतलब उसने तेरी माँ को तब नहीं दिया जब वो शादी कर रही थी। उसने सोचा, फिर टाल दिया।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर 'पहले उसका बेटा' — ये लिखकर उसने तुझे निशाना बनाया। मतलब वो तेरे पैदा होने का इंतज़ार कर रहा था।"
मेरे भीतर कुछ ऐसा उठा जो मैंने पहले कभी नहीं महसूस किया। गुस्सा नहीं। गुस्से से भी गहरा। जैसे मेरे भीतर कोई पुरानी मिट्टी हिल गई हो।
"इसका मतलब," मैंने धीरे कहा, "वो मेरी माँ को जानता था। और मेरी माँ उसे।"
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। "वीर, बीस साल पहले जो हुआ, उसकी जड़ तेरे घर में है। तेरी माँ के पास कोई राज़ है जो उसने तुझे नहीं बताया।"
मैंने काग़ज़ वापस अपनी जेब में रखा। "तो मैं अभी जाकर पूछता हूँ।"
"नहीं।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "अभी नहीं। अभी वो काग़ज़ भैरव के हाथ में नहीं आना चाहिए। और तेरी माँ… तेरी माँ को सब पता है। अगर तू अभी उससे पूछेगा, तो वो डर जाएगी। और डरा हुआ आदमी सच नहीं बोलता, वीर। वो और छिपाता है।"
"तो मैं क्या करूँ?"
उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "ये काग़ज़ भैरव के हाथ का लिखा हुआ है। मतलब ये उसका जुर्म कबूल करना है। पर सिर्फ़ एक काग़ज़ काफ़ी नहीं। हमें उसका हिसाब चाहिए। पूरा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और तेरी माँ… वो कुंजी है। वो जानती है कि भैरव ने क्या किया और क्यों किया। क्योंकि वो बीस साल से उसके ज़हर से जल रही है, और चुप है।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा। मेरे हाथ की हथेली में काग़ज़ की गर्मी थी, जैसे वो अभी भी ज़िंदा हो।
"काका," मैंने कहा, "मेरी माँ ने मुझे कभी नहीं बताया। बीस साल से वो मुझे कुछ नहीं बताया।"
"क्योंकि वो तुझे बचा रही थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भारी थी। "जिस दिन तू जान जाता कि भैरव तेरे पीछे है, तू उसी दिन मर जाता। वो तुझे ज़िंदा रखना चाहती थी। चुप रहकर।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। माँ। मैंने तुझे बीस साल से देखा। तूने हर सुबह चक्की चलाई। तूने मेरे हिस्से की रोटी कम खाई। तूने मेरे घाव पर पट्टी बाँधी। और तू खुद अंदर से जल रही थी, और मुझे कभी पता नहीं चला।
"मुझे घर जाना है," मैंने कहा।
"अभी नहीं," कालू काका ने कहा। "अभी तेरे पास ये काग़ज़ है और भैरव को इसका पता नहीं। ये हमारा हथियार है। इसे छिपाकर रख।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और सुबह जब तेरी माँ चक्की पर बैठे, तब उसके पास जाना। जब वो थकी हो, जब उसके हाथ चक्की पर हों। तब वो सच बोलेगी। क्योंकि तब वो भूल जाएगी कि वो तुझे बचा रही है।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और अपनी मुट्ठी से उसे दबाया।
मैं बाहर निकला। रात गहरी थी और आसमान में तारे साफ़ दिख रहे थे। मैंने एक लंबी साँस ली। मेरे भीतर सब कुछ हिल रहा था — माँ, भैरव, मेरा बचपन, रघुवीर, जगदीश। सब एक-दूसरे से उलझे हुए।
मैं घर की तरफ़ चला, पर रास्ते में मेरे पैर रुक गए। श्यामू। मैं उसे भूल कैसे गया? वो अभी भी उस झोपड़ी में था, और भैरव को पता चल गया था। मैं पलटा और भागा।
झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन की पीली रोशनी में मीरा खड़ी थी, और उसके सामने — भैरव। उसकी लालटेन नीचे रखी थी, और वो दरवाज़े के चौखट में खड़ा था, जैसे कोई पुराना पेड़ जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी हों।
मैं दीवार के पीछे रुक गया। मेरी साँस रुक गई थी।
"सर, आप यहाँ?" मीरा की आवाज़ में ज़रा भी काँपन नहीं था। "ये आदमी बीमार है। मैं इसे दवा देने आई थी।"
भैरव ने अंदर झाँका। बिस्तर खाली था। उसकी आँखें सिकुड़ गईं, जैसे कोई चीज़ ढूँढ रही हों जो अभी-अभी यहाँ थी। फिर उसने मीरा के बैग की तरफ़ देखा।
"बेटी," उसने धीरे कहा, और उसकी आवाज़ में कोई मिठास नहीं थी, सिर्फ़ थकान। "तू अपने पिता की बेटी है। तेरे पिता ने भी एक बार मेरे पीछे पड़कर खुद को कुर्सी पर बैठा लिया था। तू वो गलती मत कर।"
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