Spirit of a Fighter – Chapter 186
मीरा ने बैग उठाया और उसे अपने कंधे पर टिकाया। उसकी आँखें भैरव की आँखों से नहीं हटीं।
"मेरे पिता कुर्सी पर आपकी वजह से हैं, सर।" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "और मैं वो गलती नहीं करूँगी जो वो कर गए। मैं चुप नहीं रहूँगी।"
भैरव का चेहरा पहली बार बदला। सच में बदला। जैसे किसी पुराने पत्थर पर दरार पड़ गई हो। उसने मीरा को देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शायद अफ़सोस, शायद डर।
वो कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से एक आवाज़ आई। श्यामू की पत्नी, अपनी साड़ी के पल्ले से आँखें पोंछती हुई, दरवाज़े तक आई।
"सर," उसकी आवाज़ टूट रही थी, "मेरा आदमी मरने वाला है। आप यहाँ क्या करने आए हो? उसे और डराने?"
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ पल। फिर वो पलटा और बाहर चला गया। पर दरवाज़े पर रुककर उसने कंधे के ऊपर से कहा, बिना पलटे —
"जो मेरे पानी से बचता है, वो मेरे हिसाब से नहीं मरता। पर वो मेरे हिसाब से जीता भी नहीं।"
उसके कदमों की आवाज़ दूर गई।
मैंने दीवार के पीछे से निकलकर मीरा को देखा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसकी आँखें सूखी थीं।
"जल्दी करो," वो बोली, आवाज़ दबाकर। "वो पलट सकता है।"
मैं पीछे के रास्ते से नहर की तरफ़ गया। श्यामू पुरानी नाव के नीचे पड़ा था, उसकी साँसें भारी थीं। मैंने उसे सहारा दिया और उसने मेरी कलाई पकड़ ली — उसकी पकड़ में जान नहीं थी, पर उसकी आँखों में कुछ जल रहा था।
"मैंने तुझे बताया था," वो हाँफते हुए बोला, "वो आता है।"
"अब बोलो, श्यामू।" मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। "वो काग़ज़ कहाँ है?"
उसने मेरी कलाई और कसकर पकड़ी। "मेरे पास कुछ है… भैरव के हाथ का लिखा हुआ… पुराना काग़ज़… मेरी झोपड़ी की दीवार के अंदर, ईंट के नीचे। जब वो मुझे पहली खुराक देने आया था, तब उसने कुछ लिखा था और गलती से वो मेरे पास छोड़ गया।"
मेरी आँखें चमक उठीं। "क्या लिखा था?"
श्यामू ने आँखें बंद कीं, जैसे याद करने में दर्द हो रहा हो। फिर उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि नहर की आवाज़ में लगभग गुम हो गया —
"किसी का नाम… और नीचे लिखा था — 'चौथी खुराक।'"
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"किसी का नाम… और नीचे लिखा था — 'चौथी खुराक।'"
श्यामू की आवाज़ खत्म हो गई। उसका हाथ मेरी कलाई पर ढीला पड़ गया, जैसे बोलने में ही उसकी आख़िरी ताकत चली गई हो।
मैंने उसका सिर नाव के नीचे रखे पुराने बोरे पर टिका दिया। उसकी पत्नी पास आई और उसके माथे पर हाथ रखकर बैठ गई।
"अब जाओ," वो बोली, मेरी तरफ़ देखे बिना। "दिन में यहाँ कोई नहीं आता। पर शाम को उसके आदमी आते हैं। तुम दिखे, तो सब खत्म।"
मीरा ने श्यामू की नाड़ी देखी और अपनी जेब से एक छोटी पुड़िया निकाली। "ये सुबह-शाम पानी में घोलकर देना। मैं कल फिर आऊँगी।"
श्यामू की पत्नी ने पुड़िया ली और मुट्ठी में कसकर दबा ली। उसकी आँखों में वो देखा जो आमतौर पर तब होता है जब कोई औरत आख़िरी उम्मीद को हाथ में पकड़ती है।
रास्ते में मीरा ने कुछ नहीं कहा। टिंकू भी चुप था। हम तीनों नहर के किनारे-किनारे चल रहे थे, और पानी की आवाज़ हमारे पैरों की आवाज़ को दबा रही थी।
फिर मीरा रुकी।
"दिन में नहीं जा सकते," उसने कहा। "श्यामू की बात सही है। भैरव के आदमी झोपड़ी पर नज़र रखते हैं।"
"तो रात का इंतज़ार करते हैं," मैंने कहा।
"रात भी खाली नहीं है," टिंकू बोला, और उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी डरी हुई थी। "भैरव ने अखाड़ा बंद किया है, पर वो खुद कुएँ के पास जाता है। कालू काका ने बोला था न, तीन रात में मिट्टी उठाने की तैयारी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी टोपी अब भी सिर पर थी, पर उसके हाथों में जो पट्टी थी वो पसीने और राख से गंदी हो चुकी थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू घर जा। माँ तेरे लिए चिंता करेगी।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया, एक ही बार, पर ऐसे जैसे कोई दीवार में कील ठोंक रहा हो। "आज रात मैं भी चलूँगा।"
"वहाँ खतरा है।"
"मेरी दुकान जल गई, भाई।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — न मुस्कान, न शरारत, सिर्फ़ सीधी बात। "अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा, सिवाय तेरे।"
मैं कुछ नहीं बोला। मेरे गले में कुछ अटक गया था।
घर पहुँचे तो सूरज ढल रहा था। आँगन में चूल्हे की आग जल रही थी और उस पर माँ की हल्दी वाली उँगलियाँ किसी बर्तन में कुछ मिला रही थीं।
गुड़िया दरवाज़े पर बैठी मेरा इंतज़ार कर रही थी। मुझे देखते ही उसकी आँखें भर आईं, पर वो रोई नहीं। उसने अपनी कॉपी सीने से लगाई रखी थी।
"भैया," वो बोली, "आज स्कूल में मैडम ने कहा कि जो डरता है वो हारता है।"
"तो तूने क्या कहा?" मैंने पूछा।
"मैंने कहा — मेरा भैया नहीं डरता।" उसने अपनी छोटी ठुड्डी ऊपर की। "पर मैं डरती हूँ।"
मैं उसके पास बैठ गया। मेरे हाथ अब भी श्यामू की कलाई की गरमाहट लिए हुए थे।
"डरना ठीक है," मैंने कहा। "माँ कहती हैं न — डर के साथ लड़।"
"माँ को कैसे पता?" गुड़िया ने पूछा।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने बर्तन से आँखें नहीं उठाईं, पर उनके होंठ हिले — "तू बड़ी होकर समझेगी।"
तभी गली के मोड़ से पैरों की आवाज़ आई। मैं सतर्क हो गया। पर वो टिंकू था।
उसके हाथ में एक टीन का डिब्बा था, जला हुआ, काला पड़ा। उसने वो डिब्बा मेरे सामने रखा और ढक्कन खोला।
"दुकान से बची हुई मिठाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब भी हल्की मुस्कान की कोशिश थी। "ज्यादा नहीं बची। पर बची है।"
डिब्बे में चार-पाँच लड्डू थे, कुछ जले हुए, कुछ टूटे हुए। उन पर राख की परत जमी थी।
"भाई," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक भर आई, "अब मैं डरता नहीं। बस भूखा हूँ।"
मेरे सीने में कुछ हिला। मैंने वो डिब्बा उठाया, उसमें से एक लड्डू निकाला, राख झाड़ी और उसका आधा हिस्सा अपने मुँह में रख लिया। जला हुआ था। कड़वा था।
"अच्छी है," मैंने कहा।
"झूठ बोल रहा है।" टिंकू की आँखों में पानी आ गया, पर वो हँसा। "कड़वी है। मुझे पता है।"
"तो तू खा और बता।" मैंने बाकी का लड्डू उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
उसने लिया और खाया। फिर दोनों हँस पड़े — ऐसे हँसे जैसे बहुत दिनों से हँसना भूल गए थे।
माँ चूल्हे से उठीं और टिंकू के पास आईं। उन्होंने उसके हाथ पकड़े और पलटकर देखा। उसकी हथेली पर आग से फफोले पड़ गए थे और कलाई पर जले के निशान थे। उसने हाथ खींचने की कोशिश की, पर माँ ने नहीं छोड़ा।
वो कुछ बोलीं नहीं। बस बर्तन से हल्दी निकाली, उसमें थोड़ा पानी मिलाया और उसकी हथेली पर धीरे-धीरे लगाने लगीं।
टिंकू की आँखें फटी रह गईं। "माँ जी, आप—"
"हाथ ठीक हो जाएगा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख्ती थी जो बहुत कम आती थी। "डर नहीं।"
उनके हाथ हल्दी लगाते वक़्त हल्के काँप रहे थे। मैंने देखा। गुड़िया ने भी देखा। पर किसी ने कुछ नहीं कहा।
माँ ने पट्टी बाँधी और उठकर फिर चूल्हे के पास चली गईं। उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी, पर उनके कंधे थोड़े झुके हुए थे — जैसे कोई बोझ उठाया हो।
"माँ," मैंने धीरे कहा।
"खाना खा ले," उन्होंने कहा, बिना पलटे। "रात में जाना है न।"
मैं सन्न रह गया। मैंने कुछ नहीं बताया था।
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