Spirit of a Fighter184 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 184

7 min read November 5, 2026

अंदर फिर चुप्पी। फिर कदमों की आवाज़। भारी कदम, जो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहे थे। फिर दरवाज़े पर रुककर भैरव बोला। उसकी आवाज़ में अब वो सब कुछ वापस आ गया था — मिठास, और उसके नीचे वो कुछ जो मैं नहीं समझ सका।

"जो मेरे पानी से बचता है, वो मेरे हिसाब से नहीं मरता। पर वो मेरे हिसाब से जीता भी नहीं।" फिर उसने जोड़ा, बहुत धीमे से, मानो खुद से बोल रहा हो। "बीस साल से मैं यही देख रहा हूँ। कोई जीता नहीं।"

कदम दूर गए। लालटेन की रोशनी दीवारों से सरककर गायब हो गई। मैंने अपनी साँस छोड़ी और श्यामू को उठाया।

"चलिए, काका। अब सब खत्म। नहर यहाँ से बस सौ कदम है।"

हम नहर की तरफ़ बढ़े। पीछे की ओर, झोपड़ी के बगल से, एक पुरानी नाव पड़ी थी, उलटी, टूटी, जिसकी लकड़ी में सालों की धूप बसी थी। मैंने श्यामू को उसके नीचे लिटाया। उसकी साँस तेज़ थी और उसका शरीर ठंडा पसीने से भीगा हुआ था।

"काका, यहीं रुकिए। मैं अभी मीरा को लेकर आता हूँ।"

उसने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ में अचानक ताकत आ गई थी, वो ताकत जो आदमी के पास सिर्फ़ आख़िरी बात कहने के लिए बचती है।

"वीर… मेरे पास कुछ है।"

"क्या?"

"भैरव के हाथ का लिखा हुआ। पुराना काग़ज़। मेरी झोपड़ी की दीवार के अंदर। ईंट के नीचे।"

मैं झुका। "कब का?"

"जब वो मुझे पहली खुराक देने आया था। तब उसने कुछ लिखा था। और गलती से वो मेरे पास छोड़ गया। मैंने उसे तुरंत दीवार में छिपा दिया।" उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखों में अब भी वो पानी था, पर उसके पीछे कुछ और भी था। "मैंने उसे बीस साल से उसी ईंट के नीचे रखा है। उम्मीद में कि कोई आएगा। कोई पूछेगा।"

मेरी आँखें चमक उठीं। "क्या लिखा था?"

उसने मेरी कलाई और कसकर पकड़ी। उसका मुँह मेरे कान के पास आया। उसकी साँस में वो कड़वाहट थी जो अब मैं पहचानता हूँ — भैरव के ज़हर की कड़वाहट। वो धीरे से बोला, एक-एक शब्द तौलकर, जैसे बीस साल का बोझ उतार रहा हो।

"किसी का नाम।" उसने रुककर साँस ली। "और नीचे लिखा था — चौथी खुराक।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा सा फैल गया। चौथी खुराक। मतलब तीन लोग पहले ही जा चुके थे। और चौथा नाम किसी और का था। कोई ऐसा जो अब भी ज़िंदा हो सकता है।

"किसका नाम, काका?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट रही थी। "किसका नाम लिखा था?"

उसने मेरी आँखों में देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में भरा। "काका। प्लीज। मेरे पापा का नाम है क्या? रघुवीर?"

उसने सिर हिलाया। एक बार बाईं तरफ़, फिर दाईं तरफ़। "ना। तेरे पापा का नहीं।" उसने साँस ली। "किसी और का। जो अब भी उस पानी के साए में जी रहा है।"

"कौन?"

उसने आँखें बंद कर लीं। "मुझे याद नहीं… मैंने उसे सिर्फ़ एक बार पढ़ा था। पर जब मैंने पढ़ा था, तब मेरे हाथ काँप गए थे। क्योंकि वो नाम मैंने उससे पहले कहीं और सुना था। और वो जगह…" उसने आँखें खोलीं, और उनमें डर था। सच्चा डर। "वो जगह तेरे घर से जुड़ी है, वीर।"

मेरे घर से।

"मेरे घर से?"

"जब तू उस काग़ज़ को निकाले, तब मुझे मत बताना।" उसने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई दुआ माँग रहा हो। "क्योंकि अगर वो नाम मेरी सोच से भी बड़ा निकला, तो मैं उसे सह नहीं पाऊँगा।"

मैंने पीछे देखा। झोपड़ी की तरफ़। वहाँ रोशनी अब भी जल रही थी।

"मैं मीरा को बुलाकर आता हूँ," मैंने कहा। "आप यहाँ रहिए। कोई आए तो आवाज़ मत कीजिएगा। मैं गंध से पहचान लूँगा।"

मैं नाव के नीचे से निकला और झोपड़ी की तरफ़ चल पड़ा। मेरे पैर मिट्टी में धँस रहे थे, और रात की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। मेरे भीतर एक ही बात घूम रही थी — चौथी खुराक। चौथा नाम। और वो नाम मेरे घर से जुड़ा है।

मैं दरवाज़े के पास पहुँचा। मीरा दीवार के साथ खड़ी थी, उसका बैग उसके कंधे पर था, और उसकी आँखें अंधेरे में मेरी आँखों से मिलीं।

"निकल गया?" उसने फुसफुसाया।

"हाँ। नाव के नीचे है।" मैंने अंदर झाँका। श्यामू की पत्नी कोने में बैठी थी, और उसका बच्चा उसकी गोद में सो रहा था। "तू ठीक है?"

"मैं ठीक हूँ," उसने कहा, और फिर कुछ पल रुककर उसने जोड़ा, "पर वो जो बोला — 'मेरे हिसाब से जीता भी नहीं' — वीर, उसमें कुछ था।"

"क्या?"

"वो अकेला नहीं बोल रहा था। वो खुद से बोल रहा था। जैसे कोई हिसाब लगा रहा हो, और हिसाब उसका भी न मिल रहा हो।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही थीं, और उनमें वो चीज़ थी जो मैंने उसमें पहले भी देखी थी — ज़िद। मगर इस बार उसमें कुछ और भी था। जैसे उसने भैरव की आवाज़ में वो दरार पकड़ ली हो जिसे बीस साल में किसी ने नहीं पकड़ा।

"मीरा," मैंने धीरे कहा, "श्यामू काका ने कुछ बताया। उसकी झोपड़ी की दीवार में भैरव के हाथ का लिखा काग़ज़ है। चौथी खुराक का हिसाब।"

उसकी आँखें फैल गईं। "चौथी?"

"हाँ। और उसमें किसी का नाम है। ऐसा नाम जो मेरे घर से जुड़ा है।"

वो कुछ पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तो हमें वो काग़ज़ आज रात ही निकालना होगा।"

"आज रात?"

"वीर, भैरव ने अभी-अभी चेतावनी देकर छोड़ा है। जब वो चेतावनी देकर जाता है, तो वो सिर्फ़ डराने के लिए नहीं जाता। वो देखने जाता है कि डर काम कर रहा है या नहीं। अगर काम नहीं कर रहा, तो वो अगला कदम उठाता है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अगर उसे शक हो गया कि श्यामू काका ने कुछ छिपाया है, तो वो ईंट खुद उखाड़ देगा।"

मैंने कुछ सोचा। मेरी गंध अभी भी भैरव के जाने की दिशा में लगी थी — वो दूर जा रहा था, नहर के किनारे से। मुझे पता था वो रास्ता। वो अखाड़े के पीछे जाता था।

"तो अभी चलते हैं," मैंने कहा। "पर पहले श्यामू काका को कहीं सुरक्षित रखना होगा। भैरव लौटकर झोपड़ी नहीं आएगा, मुझे लगता है। वो अखाड़े गया है। पर सुबह कुछ भी हो सकता है।"

"उन्हें मेरे घर ले चलते हैं," मीरा ने कहा। "पापा हैं। भैरव वहाँ नहीं आ सकता। आज तक नहीं आया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू अपने घर? भैरव के सामने?"

"मेरे पापा कुर्सी पर हैं, वीर। उन्हें जानता है पूरा गाँव। अगर भैरव मेरे घर आया, तो पूरा रामपुर जान जाएगा। वो इतना जोखिम नहीं लेगा।" उसने अपना बैग उठाया। "चल।"

हम नाव के पास पहुँचे। श्यामू की आँखें खुली थीं, पर उनमें वो चमक नहीं थी जो अभी थी। उसके होंठ हिले। "मीरा… बेटी…"

"काका, हम आपको पापा के पास ले चल रहे हैं," मीरा ने धीरे कहा, उसके पास बैठकर। "वहाँ आप सुरक्षित रहेंगे। कोई आपकी झोपड़ी में नहीं जाएगा।"

"पर वो काग़ज़…"

"मैं निकाल लाऊँगा," मैंने कहा। "आप बस बताइए, कौन-सी ईंट?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। "खिड़की के नीचे, तीसरी ईंट। जिस पर चूल्हे की कालिख लगी है। वो हिलती है। उसके पीछे एक खोखला है। वहीं रखा है।"

मैंने सिर हिलाया। "आप मीरा के साथ जाइए। मैं पीछे से आता हूँ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तू अकेले?"

"अकेले नहीं।" मैंने मुट्ठी भींची। "मेरे साथ पापा की मिट्टी है।"

उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जिसका नाम मैं नहीं जानता था, पर जो मेरे पैरों में ताकत भर रही थी।

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