Spirit of a Fighter – Chapter 181
श्यामू ने काग़ज़ सीने से लगा लिया। और फिर वो रोने लगा — बिना आवाज़, बिना हिले। बस आँसू, और उसके होंठ काँपते हुए।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे अपनी माँ याद आई। माँ जो रोज़ चार बजे उठती है और चक्की चलाती है। माँ जिसने बीस साल चुप रहकर ये सब सहा। और मुझे लगा कि इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं — जो ज़ुल्म करते हैं, और जो चुप रहकर उसे बढ़ने देते हैं। और एक तीसरे तरह के भी होते हैं। जो देर से सही, पर खड़े हो जाते हैं।
श्यामू आज खड़ा हो रहा था। अपनी चारपाई पर लेटा हुआ, पर खड़ा।
मैंने कॉपी उठाई और उसे ध्यान से देखा। मीरा की लिखाई छोटी और साफ़ थी। और उसमें वो नाम था जो मेरे सीने में चुभ रहा था — कालू। नहीं, श्यामू ने नाम नहीं लिया था। उसने सिर्फ़ "बूढ़ा आदमी, लाठी वाला" कहा था। मीरा ने वही लिखा था। साफ़ और ईमानदार। कोई अंदाज़ा नहीं। सिर्फ़ सच।
"अब क्या?" बाई ने पूछा।
मैंने कॉपी मेज़ पर रखी। "अब ये काग़ज़ किसी ऐसी जगह जाएगा जहाँ भैरव का हाथ न पहुँचे।"
"कहाँ?" मीरा ने पूछा।
मैंने सोचा। पुलिस? नहीं, भैरव के आदमी वहाँ हैं। मंदिर? नहीं। गाँव का कोई घर? भैरव किसी भी दरवाज़े को खुलवा सकता है।
"रामपुर के बाहर," मैंने कहा। "शहर में। मीरा, तेरे पापा के पास। रणवीर सिंह के पास।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ बदला। जैसे उसने मेरी बात को तौला हो। फिर उसने सिर हिलाया। "हाँ। पापा के पास। वो इस काग़ज़ को छुपा सकते हैं। और वो जानते हैं कि भैरव से कैसे निपटना है।"
"पर एक बात," बाई ने कहा, और उसकी आवाज़ सख़्त हो गई। "ये काग़ज़ यहाँ से निकलेगा तो किसी ऐसे आदमी के हाथ से निकलेगा जिस पर भैरव की नज़र न हो।"
हम तीनों चुप हो गए।
और फिर मेरे दिमाग़ में एक नाम आया। ऐसा नाम जिस पर भैरव की नज़र कभी नहीं पड़ती। जो अखाड़े में आता-जाता है, मिठाई बेचता है, हँसता है, और जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता।
"टिंकू," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई। "टिंकू," उसने दोहराया। "हाँ। टिंकू।"
"पर टिंकू की दुकान जल गई," मैंने कहा। "वो अब भी डरा हुआ है।"
"डरा हुआ आदमी ही सबसे अच्छा छुपाने वाला होता है," बाई ने कहा। "क्योंकि उसे कोई ताकता नहीं।"
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, और मेरे भीतर एक अजीब सी बात जगी। ये काग़ज़ बीस साल की चुप्पी का पहला टुकड़ा था। और ये टुकड़ा मेरे पास था। मेरे हाथ में। भैरव के ज़हर से बना नहीं, मेरे पापा के सच से बना।
मैंने काग़ज़ मोड़ा और अपनी धोती की कमर में खोंसा।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "पहले इसे दो जगह लिखवाऊँगा। एक बाई के पास रहेगा, एक मेरे पास। और एक मीरा के पास। अगर किसी एक को कुछ हो जाए, तो बाक़ी दो बोलेंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। कुछ ऐसा जो मुझे अंदर तक गरम कर गया।
"तुम सीख रहे हो," उसने धीरे कहा।
"तेरे साथ रहकर," मैंने कहा, और फिर मुझे एहसास हुआ कि मैंने क्या कहा, और मैंने नज़र नीची कर ली।
मीरा हँसी। हल्की सी। और उस हँसी में वो सब था जो हम दोनों के बीच अभी तक नहीं कहा गया था।
मैंने कलम उठाई और एक और काग़ज़ पर सब कुछ लिखना शुरू किया। मेरी लिखाई टेढ़ी-मेढ़ी थी, पर साफ़। जब मैं लिख रहा था, तो मेरे हाथ काँप रहे थे। पर इस बार डर से नहीं। इस बार कुछ और था।
जब मैं लिख चुका, तो मैंने काग़ज़ श्यामू की तरफ़ बढ़ाया। "अँगूठा लगाइए।"
उसने अँगूठा लगाया। उसका अँगूठा काँप रहा था, पर निशान साफ़ बना।
मैंने दूसरा काग़ज़ बाई को दिया। उसने भी अँगूठा लगाया।
और तभी —
दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक हुई।
हम सब रुक गए। बाई के हाथ से लालटेन हिली और उसकी लौ काँपी। श्यामू की आँखें बड़ी हो गईं। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी, और उसकी पकड़ ठंडी थी।
दस्तक फिर हुई। इस बार और ज़ोर से। जैसे कोई मुट्ठी से पीट रहा हो।
और फिर आवाज़ आई। वो आवाज़ जिसे मैं पहचानता था। मीठी, पर उसके नीचे कुआँ जैसी ठंडक।
"श्यामू! खोल दरवाज़ा। मेहमान आया है तेरे पास, और मुझे बुलाया नहीं?"
मेरे भीतर सब कुछ ठहर गया।
बाई ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर उसने लालटेन नीचे नहीं की। श्यामू की साँस तेज़ हो गई और वो काँपने लगा।
मीरा ने मेरे कान के पास धीरे कहा, "काग़ज़। छुपाओ। अभी।"
मैंने काग़ज़ अपनी धोती में और अंदर खोंसा, और श्यामू के बिस्तर के नीचे जूते के अंदर वाला काग़ज़ भी निकालकर अपने पास रख लिया।
"खोल दरवाज़ा, श्यामू!" भैरव की आवाज़ अब गुस्से में थी। "मुझे पता है वो अंदर है। मैंने उसकी चप्पल देखी है दरवाज़े के बाहर।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मेरी चप्पल। मैंने बाहर उतारी थी।
मेरी गलती।
भैरव ने दरवाज़ा फिर पीटा, और इस बार दरवाज़े की लकड़ी चरमराई।
"बाई!" भैरव चिल्लाया। "अगर तूने दरवाज़ा नहीं खोला, तो मैं इसे जला दूँगा। तुझे पता है मैं मज़ाक नहीं कर रहा।"
बाई ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैर अब काँप नहीं रहे थे। मेरे भीतर कुछ ठंडा और साफ़ हो गया था, जैसे कुएँ का पानी।
"मैं खोलता हूँ," मैंने कहा।
"वीर, नहीं," मीरा ने कहा।
"वो जानता है मैं यहाँ हूँ," मैंने कहा। "अगर मैं नहीं खोलूँगा, तो वो ये झोपड़ी जला देगा। और श्यामू अंदर है।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे पीछे मीरा ने कहा, "काग़ज़ मुझे दे दो।"
मैंने एक पल सोचा। फिर मैंने काग़ज़ निकाला और उसके हाथ में रख दिया। उसने उसे अपने बैग की अंदरूनी जेब में रखा, और बैग का चेन खींच दिया।
"चाबी?" मैंने धीरे पूछा।
"बैग में," उसने कहा।
मैंने सिर हिलाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
बाई ने लालटेन ऊँची की और दरवाज़े की तरफ़ आई। "मैं खोल रही हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सख़्त थी। "पर तू अंदर आकर मेरे मेहमान को छूएगा नहीं। ये मेरा घर है।"
बाहर से हँसी आई। "बाई, तू तो फ़िलॉसफ़र हो गई है। खोल।"
बाई ने कुंडी खोली।
दरवाज़ा खुला, और भैरव सिंह अंदर आया। उसका भारी शरीर दरवाज़े के फ्रेम में ऐसा भरा कि बाहर की रोशनी बंद हो गई। उसने लाल मिट्टी वाली धोती पहनी थी, और उसकी मूँछों के सिरे आज भी तेल से चमक रहे थे। उसके पीछे दो आदमी थे, जिनके हाथों में लाठियाँ थीं।
उसकी नज़र सीधी मुझ पर पड़ी।
"अरे, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मुझे अब उल्टी जैसी लगती है। "मैंने सोचा कि तू इस वक़्त अखाड़े में होगा, कुश्ती की तैयारी में। पर तू यहाँ? श्यामू के पास?"
"वो मेरा दोस्त है," मैंने कहा।
"दोस्त?" भैरव ने भौंहें चढ़ाईं। "ये आदमी तो बीमार है। तड़प रहा है। तू इसे क्या देने आया? दवा?" उसने मेरी तरफ़ झुककर देखा। "या कुछ और?"
"दवा," मीरा ने कहा, और वो आगे आई। "मैं आयुर्वेद की पढ़ाई करती हूँ। मैंने सुना कि ये बीमार है, तो दवा लेकर आई।"
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें थोड़ी देर उस पर रुकीं। "मीरा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "तू यहाँ? मैंने तुझे पहचाना नहीं। तेरे पापा जानते हैं तू इस गाँव में घूम रही है?"
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