Spirit of a Fighter – Chapter 182
"मेरे पापा जानते हैं कि मैं कहाँ हूँ," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में ज़रा भी डर नहीं था। "और मैं बड़ी हो गई हूँ। मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है।"
भैरव हँसा। "बिलकुल। बिलकुल। तू तो पढ़ी-लिखी है।" फिर उसकी नज़र झोपड़ी में घूमने लगी। "पर एक बात बता, मीरा — तूने ये बताया नहीं कि तू इस बीमार आदमी के पास क्या ढूँढने आई है?"
"मैंने कहा — दवा।"
"दवा नहीं," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ नरम हो गई, जैसे कोई बच्चे को बहला रहा हो। "तू सच ढूँढने आई है। जैसे तेरे पापा बीस साल से ढूँढ रहे हैं। और मैं जानता हूँ तेरे पापा क्या ढूँढ रहे हैं।"
मीरा चुप रही।
"तेरे पापा को लगता है कि मैंने उनके पैर ख़राब किए," भैरव ने कहा। "मैंने उन्हें कई बार समझाया — रणवीर भाई, तुम्हारी क़िस्मत ख़राब थी। मिट्टी ने तुम्हें छोड़ दिया। पर वो मानते नहीं। और अब तू भी वही ढूँढ रही है जो वो ढूँढ रहे हैं।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया, और मैंने अपने आप को उसके और मीरा के बीच पाया।
भैरव मुस्कुराया। "देखा? ये लड़का आ गया बीच में। जैसे कोई दीवार हो। पर दीवार, वीर, ईंटों की होती है। तेरे जैसे आदमी की नहीं।"
"तू जो कहना चाहता है, कह," मैंने कहा। "मीरा को मत घेर।"
"मैं घेर नहीं रहा," भैरव ने कहा। "मैं सिर्फ़ बता रहा हूँ कि ये जगह ख़तरनाक है। श्यामू बीमार है। उसके साथ जो चाहे हो सकता है। अगर कल सुबह खबर आए कि श्यामू मर गया, तो पुलिस किसे पकड़ेगी? उसी को जो उसके पास आख़िरी में बैठा था।"
"तो तू पुलिस को ये बताएगा?" मैंने पूछा।
"मैं क्यों बताऊँगा?" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक नरम हो गई। "मैं तो तेरा भला चाहता हूँ, वीर। तू अखाड़े का होनहार लड़का है। मैं तुझे बर्बाद नहीं होने देना चाहता। इसलिए मैं आया हूँ।"
वो मेरे पास आया और उसने मेरा कंधा थपथपाया। उसका हाथ भारी था, और उसकी गंध में वो कड़वाहट थी जो मैं हर बार पहचानता हूँ — कस्तूरी, तेल, और उसके नीचे… ज़हर।
"मैं तुझे एक रास्ता देता हूँ," उसने धीरे कहा, सिर्फ़ मेरे लिए। "आज रात तू मेरे कमरे में आ जा। अकेला। मैं तुझे वो सब दूँगा जो तू ढूँढ रहा है — काग़ज़, सच, नाम। और बदले में मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए।"
"क्या?"
"वो बीज।"
मेरे भीतर कुछ जम गया।
"मैं नहीं जानता कि बीज कहाँ है," मैंने कहा।
भैरव हँसा। "जानता है। गुड़िया ने मुझे बताया कि तू उसकी थैली में कुछ देखकर चौंका था। वो थैली अब खाली है। मतलब बीज तेरे पास है।"
"मैं नहीं जानता कि बीज कहाँ है," मैंने फिर कहा। इस बार आवाज़ थोड़ी ऊँची। "गुड़िया ने झूठ बोला।"
"गुड़िया झूठ नहीं बोलती," भैरव ने कहा, और मेरे कंधे पर रखा उसका हाथ ज़रा और भारी हो गया। "वो डरती है मुझसे, बस। और डरा हुआ आदमी सच बोलता है।"
मैंने उसका हाथ अपने कंधे से हटाया। धीरे से, पर पूरे ज़ोर से। वो हटा। भैरव की आँखों में कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले नहीं देखा था। गुस्सा नहीं। हिसाब। जैसे कोई दुकानदार तौल रहा हो कि ये लड़का कितना बोझ उठा सकता है।
"सुन, वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ वही नरम थी, पर उसके पीछे अब ठंड थी। "तेरे पापा ने भी मेरी बात नहीं मानी थी। एक ही रात में उसका सब कुछ चला गया — नाम, काम, अखाड़ा। बीस साल से वो गाँव में मुँह छिपाए बैठा है, और लोग सोचते हैं वो भाग गया था। तू भी वही रास्ता चुन रहा है।"
मेरा गला सूख गया। वो जानता था। मेरे पापा गाँव में हैं? ज़िंदा हैं? ये बात मुझे कोई नहीं बताता था।
"तू मेरे पापा को जानता है?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ काँपी।
भैरव मुस्कुराया। "मैं हर उस आदमी को जानता हूँ जो इस अखाड़े की मिट्टी में पसीना बहाता है।" वो पलटा। "आज रात, मेरा कमरा। अकेला आना। बीज लेकर। नहीं तो कल सुबह श्यामू की लाश यहाँ से उठेगी, और तेरे पापा की खबर भी तुझे कभी नहीं मिलेगी।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दहलीज़ पर रुका, और बिना पलटे बोला — "और वीर, उस लड़की को साथ मत लाना। मेरा काम लड़कों से है, लड़कियों से नहीं।"
वो गया। उसके पीछे की रोशनी लौटी, और झोपड़ी में ज़्यादा अंधेरा लगने लगा।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथ ठंडे थे। मेरे भीतर एक ही आवाज़ घूम रही थी — मेरे पापा गाँव में हैं। ज़िंदा हैं। बीस साल से मेरे पास, और मैं उन्हें ढूँढता फिर रहा हूँ।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। "वीर। वीर, सुन।"
"मेरे पापा—"
"मैंने सुना," उसने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, पर उसकी पकड़ मज़बूत। "पर ये जाल है। तू समझ रहा है ना? वो तुझे बुला रहा है, अकेले।"
"मैं जानता हूँ।"
"तो तू जाएगा नहीं।"
मैं उसकी तरफ़ पलटा। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं, और उनमें डर था। सच्चा डर। मैंने पहली बार देखा कि मीरा भी डर सकती है।
"मीरा," मैंने धीरे कहा, "मुझे जाना है।"
"वीर।"
"नहीं, सुन।" मैंने उसका हाथ अपनी बाँह से हटाया, पर छोड़ा नहीं। मेरे हाथ में उसकी उँगलियाँ थीं। "मैं बीस साल से उस आदमी को ढूँढ रहा हूँ। अगर जाने से मुझे अपने पापा मिल जाएँ, तो मैं जाऊँगा। पर वो जगह मेरे लिए नहीं होगी।"
"तो किसके लिए?"
"उसके लिए।" मैंने मुड़कर देखा। श्यामू अपने बिस्तर पर हिल रहा था, आँखें अभी बंद थीं, पर उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई सपना देख रहा हो। "वो जानता है कि मेरे पापा के साथ क्या हुआ था। और भैरव को ये पता नहीं कि श्यामू अब भी बोल सकता है। ये हमारा हथियार है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ छुड़ाया, और अपना बैग उठाया। "ठीक है। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"जो भी श्यामू बोलेगा, मैं सुनूँगी। और मैं उसे लिखूँगी। तेरे जाने से पहले।" उसने मेरी आँखों में देखा। "अगर तू उस कमरे में जाकर नहीं लौटा, तो ये काग़ज़ बाहर जाएगा। पूरे गाँव को पता चलेगा। पुलिस को भी।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा। फिर मैं हँसा। डर के बीच भी हँसी आ गई। "तू सच में अखाड़े की बेटी है।"
"मैंने तुझे अपनी बात कहने से कब मना किया था?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार मेरे लिए कोई गर्मी थी। "अब चल। बैठ उसके पास।"
मैं श्यामू के बिस्तर के पास गया। उसकी आँखें खुल गई थीं। वो मुझे देख रहा था। उसका मुँह हिला, और उससे एक आवाज़ निकली, सूखी, टूटी।
"वीर…"
"मैं हूँ, काका। मैं यहीं हूँ।"
उसने अपना हाथ उठाया। सूखा, पतला, हड्डियों का ढाँचा भर। उसने मेरा हाथ पकड़ा, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने पहले कभी किसी आदमी को इतना काँपते नहीं देखा।
"मैंने… मैंने उस दिन रघुवीर की बात नहीं मानी," उसने कहा, और उसकी आँखों से पानी बहने लगा। "उसने कहा था — श्यामू, इस पानी में कुछ मिला है। मत पी। पर मैंने पी लिया। क्योंकि भैरव ने कहा था — जीत जाएगा तो क्या कमी है। मैं जीत गया, वीर। जीतकर मैं ये हाल हो गया। और आज मैं… मैं इस हाल में हूँ।"
उसकी आवाज़ टूट गई। मैंने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में भर लिया। उसकी हथेली में गर्मी थी, बुखार की गर्मी, और उसकी उँगलियों में वो कंपकंपी जो अब मेरे हाथ में आ गई थी।
"काका," मैंने कहा, "मेरे पापा कहाँ हैं? बताइए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उस आदमी में होती है जिसने बीस साल से कोई बोझ उठा रखा हो।
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