Spirit of a Fighter – Chapter 180
"मैंने नहीं माना," श्यामू ने कहा। और उसकी आवाज़ में एक चीज़ थी जो मैंने पहले कभी किसी आदमी की आवाज़ में नहीं सुनी। शर्म। असली, गहरी शर्म। "मैं जवान था। मुझे जीतना था। भैरव ने मुझे बड़ा मुकाबला दिखाया — शहर का पहलवान, दो सौ रुपये का इनाम। दो सौ रुपये, वीर। उन दिनों दो सौ रुपये मेरे घर को छह महीने चला देते थे। मैंने सोचा — रघुवीर डरता है, मैं नहीं डरता।"
वो रुका। उसकी साँस फूलने लगी। मीरा आगे आई और उसके होंठों पर पानी की बूँदें डालीं। उसने पानी निगला, और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने वो पानी पिया," उसने कहा। "और मैं जीत गया। उस दिन लगा कि मैंने कुछ बड़ा कर दिया। पर फिर… फिर रघुवीर अखाड़े से गायब हो गया।"
"गायब?" मेरी आवाज़ निकली, पर फटी हुई।
"किसी ने कहा वो भाग गया। किसी ने कहा बीमार पड़ गया। भैरव ने कहा — 'वो आदमी कमज़ोर निकला, मिट्टी ने उसे कबूल नहीं किया।' और मैं… मैं चुप रहा। क्योंकि मैंने पानी पी लिया था, और मुझे लगा कि अगर मैं बोलूँगा, तो मेरा भी वही हाल होगा।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। पर गुस्सा नहीं आया। आता तो आसान होता। जो आया, वो कुछ और था — एक अजीब सी तरस। इस आदमी पर, जो मेरे पापा का दोस्त था और बीस साल से खुद को कोस रहा था।
"एक बात और," श्यामू ने कहा, और अचानक उसकी आवाज़ में जान आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसके हाथ सूखे थे, पत्तों जैसे, और वो काँप रहे थे। "एक रात। रघुवीर के जाने के कुछ दिन बाद। मैं अखाड़े में सोया था, देर रात उठा — पेशाब के लिए। और मैंने देखा…"
वो रुक गया। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, जैसे वो उस रात को आज भी सामने देख रहा हो।
"क्या देखा?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर अंदर सब कुछ तेज़ चल रहा था।
"भैरव कुएँ की तरफ़ जा रहा था। हाथ में लालटेन थी। और उसके पीछे एक और आदमी था।"
"कौन?"
"अंधेरा था। चेहरा नहीं दिखा। पर उस आदमी के हाथ में लाठी थी, और वो अजीब तरह से चलता था — एक पैर थोड़ा घसीटता हुआ।"
मेरे भीतर एक ठंडी सी लहर दौड़ी।
"और…" श्यामू ने आँखें मींच लीं, जैसे याद करने की कोशिश कर रहा हो। "और वो आदमी रघुवीर की तरह चलता था। वैसे ही कंधा हिलाता था। मैंने सोचा — अरे, रघुवीर तो लौट आया! पर फिर मैंने देखा… नहीं। वो रघुवीर नहीं था। वो बूढ़ा था। बहुत बूढ़ा।"
मेरे दिमाग़ में एक चेहरा आया। कुबड़ा। छोटा। सफ़ेद दाढ़ी। एक पैर थोड़ा घसीटता हुआ। हाथ में लाठी। और बीस साल की चुप्पी।
कालू काका।
मेरे हाथ से मेरा ही हाथ छूट गया। मैं पीढ़ी पर पीछे झुक गया। मेरे कानों में एक सीटी बजने लगी।
मीरा ने मुझे देखा। उसने मेरे चेहरे पर सब पढ़ लिया, और उसकी आँखें भी बड़ी हो गईं। "वीर," उसने धीरे कहा। "वो कह रहा है…"
"मुझे पता है वो क्या कह रहा है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी।
श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा। "तू उसे जानता है?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्या कहता? कि वो आदमी मुझे कुएँ के पास ले गया? कि उसने मुझे अखाड़े की मिट्टी दी? कि उसने मुझे बताया कि वो बीस साल से उस कुएँ की आवाज़ सुनता है?
"वो आदमी," श्यामू ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर काँपने लगी, "उसने मुझे बाद में एक दिन रोका था। अखाड़े के बाहर। मैं पानी भरने जा रहा था। उसने मेरा रास्ता रोका और बोला — 'श्यामू, उस रात तूने कुछ देखा था। भूल जा। वरना तेरी भी वही गति होगी जो रघुवीर की हुई।'"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"मैंने उससे पूछा — तुम कौन हो? तुमने क्या देखा है?" श्यामू ने कहा। "वो हँसा। सिर्फ़ हँसा। और चला गया। उस दिन के बाद मैंने उससे कभी बात नहीं की। अखाड़े में वो मुझे देखता भी तो मैं आँख चुरा लेता था।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैर मुझे संभाल नहीं रहे थे।
"वीर, बैठ," मीरा ने कहा। "बैठ।"
"वो कालू काका है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी और की हो। "मीरा, वो कालू काका है। जिसने मुझे तहखाने का रास्ता दिखाया। जिसने मुझे मिट्टी गूंधना सिखाया। जिसने कहा कि मेरी आँखों में मेरे पापा की बात है।"
मीरा ने मेरा कंधा पकड़ा और मुझे नीचे बैठाया। "शांत हो। साँस ले। अभी हमें सब कुछ पता नहीं है। श्यामू ने चेहरा नहीं देखा था। वो सिर्फ़ अंदाज़ा लगा रहा है।"
"पर उसने लाठी कही," मैंने कहा। "घसीटता पैर कहा। बूढ़ा कहा। मीरा, कितने बूढ़े लोग इस गाँव में आधी रात को कुएँ की तरफ़ जाते हैं?"
मीरा कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी भी एक जवाब थी।
श्यामू ने मेरा हाथ फिर पकड़ा। इस बार उसकी पकड़ कसी हुई थी, जैसे वो मुझे किसी और बात से रोक रहा हो।
"बेटा, एक बात सुन," उसने कहा। "मैंने उस दिन रघुवीर की बात नहीं मानी। मैंने पानी पिया। और आज मैं इस हाल में हूँ। मेरी उम्र के दस साल इस ज़हर ने खा लिए। मेरे बच्चे मुझे पहचान नहीं पाते। मेरा बेटा शहर में काम करता है और जब वो आता है, मुझे ऐसे देखता है जैसे कोई अजनबी हो।"
उसकी आवाज़ रुक गई। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो सब था जो शब्द नहीं कह सकते।
"मैंने तेरे पापा की बात नहीं मानी। मैं उसके साथ नहीं खड़ा रहा। जब वो गायब हुआ, मैं चुप रहा। और आज…" उसने मेरा हाथ अपने दोनों सूखे हाथों में भर लिया, और उसकी पकड़ काँपने लगी, "आज अगर तुझे कुछ चाहिए — कोई गवाही, कोई नाम, कोई सच — तो मैं खड़ा हूँ। मरने से पहले एक बार सच बोल दूँ, ताकि मेरा बेटा मुझे पहचान सके।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे। झोपड़ी में सिर्फ़ उसकी साँस की आवाज़ थी, और बाहर से किसी पक्षी की आवाज़ आ रही थी जो दूर नहर पर थी।
मीरा उठी। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी कॉपी और कलम निकाली। उसका चेहरा अब शांत था, पर आँखों में वो चमक थी जो मैंने नीम के नीचे पहली बार देखी थी — सबूत की चमक।
"यह गवाही है, वीर," उसने कहा, और मेरे पास आकर बैठ गई। "यह श्यामू की ज़ुबान से निकली है। अब इसे लिखवाना है।"
"मैं लिखवाऊँगी," बाई दरवाज़े से बोली। "मैं पढ़-लिख लेती हूँ। श्यामू बोलेगा, मैं लिखूँगी, और हम दोनों अँगूठा लगाएँगे।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। "आपको पता है कि ये ख़तरनाक है? भैरव जान जाएगा तो…"
"भैरव ने मेरे घर में ज़हर बोया है," बाई ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ उस औरत में आती है जिसका सब कुछ लुट चुका हो। "अब मैं डरने से थक गई हूँ।"
मीरा ने कॉपी खोली। उसने पहला पन्ना लिया और तारीख़ लिखी। फिर उसने श्यामू की तरफ़ देखा।
"श्यामू भाई, धीरे-धीरे बोलिए। जो आपने अभी कहा, वो सब। पहले से।"
श्यामू ने साँस भरी। फिर उसने बोलना शुरू किया — धीरे, रुक-रुककर। वो रघुवीर का दोस्त था। वो अखाड़े का पहलवान था। भैरव ने उसे पानी दिया। रघुवीर ने मना किया था। उसने नहीं माना। और फिर रघुवीर गायब हो गया।
मैं बैठा सुन रहा था, और मेरे भीतर हर शब्द ईंट की तरह जम रहा था। मीरा लिख रही थी, तेज़ी से, बिना रुके। उसकी कलम की आवाज़ काग़ज़ पर ऐसी थी जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा हो।
जब श्यामू रुका, तो मीरा ने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। "पढ़ लीजिए। जो ग़लत हो, बता दीजिए।"
श्यामू ने पढ़ा। उसके होंठ हिल रहे थे, और उसकी आँखें भर रही थीं। "ये… ये सब मैंने कहा?"
"आपने कहा," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ नरम थी। "अब ये आपका ही सच है। अब ये आपके पास रहेगा, और आपके बेटे के पास भी पहुँचेगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno