Spirit of a Fighter – Chapter 179
“तो तुमने देख लिया,” उसने धीरे कहा। “और तुम दोनों मेरे पास आए। अकेले। रात में।”
“क्या तुमने उसे ज़हर दिया?” मैंने पूछा।
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में हँसी नहीं थी। थी कोई ठंडी चीज़, जैसे पीतल का पानी का लोटा सुबह-सुबह। “तेरे पापा ने भी पूछा था, वीर। बिलकुल ऐसे ही। सीधा।”
मेरी साँस रुक गई।
“तू जानता है ना?” भैरव आगे बढ़ा। “तू सब जानता है। तेरे पास वो चीज़ है। जो मैं बीस साल से ढूँढ रहा हूँ। तूने उसे खोला, तूने उसे पढ़ा, और अब तू समझदार बन रहा है।”
“कौन-सी चीज़?” मैंने कहा, पर मेरा गला सूख रहा था और आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी।
“वही बीज,” भैरव ने कहा। “जो तेरे पापा ने मुझसे छुपाया और मरते वक़्त अपने बेटे के पास भेज दिया। अरे, रघुवीर मूर्ख था। उसने सोचा था कि तू उसे उगा देगा। पर तू तो ईंट ढोता है, वीर। तुझसे बीज उगाना नहीं होगा।”
मेरे भीतर कहीं, ज़हर की तरह, एक बात फैल गई — वो बीज मेरे पास है, और भैरव को पता है।
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। उसका दबाव साफ़ था — चुप रहो, कुछ मत कहो।
“अब सुनो,” भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर मीठी हो गई, जैसे कोई शिक्षक बच्चे को समझा रहा हो। “तुम दोनों जाओ। श्यामू मर गया, ये खबर सही है या ग़लत, इससे मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ इससे पड़ता है कि तुम अंदर आओ और मुझसे बात करो। मैं तुम्हें कुछ दूँगा। सच। जो तू ढूँढ रहा है, वो मेरे पास है।”
“मुझे कुछ नहीं चाहिए,” मैंने कहा।
“तो जाओ,” भैरव ने कहा, और वो मुड़ गया। “जाओ, और कल सुबह देखना — पुलिस तुम्हें श्यामू की हत्या के इल्ज़ाम में पकड़ेगी। तेरी नई माई को भी। और उस औरत को भी जो तुम्हें रात में मिली।”
मेरा पैर पीछे हटा। मीरा का हाथ मेरी कलाई पर और कस गया।
“वो झूठ बोल रहा है,” उसने धीरे से कहा, सिर्फ़ मेरे लिए।
“झूठ नहीं,” भैरव ने पीछे से कहा, बिना मुड़े। “पुलिस में मेरा आदमी है। सबूत मैं दूँगा। तुम गिरफ़्तार होगे। और तब तक वो बीज मेरे पास पहुँच चुका होगा।”
हम नहर की तरफ़ लौटे। मेरे कदम भारी थे। मीरा चुप चल रही थी, और उसकी चुप्पी अब सहूलियत नहीं दे रही थी — उसमें कुछ गिनती चल रही थी।
“वो सच बोल रहा था?” मैंने पूछा। “पुलिस वाली बात?”
“हो सकता है,” मीरा ने कहा। “पर अभी ज़रूरी ये है कि श्यामू ज़िंदा है, और उसने तुम्हारे पापा का नाम लिया। वो बात भूल मत।”
मैं रुक गया। “कैसे भूलूँ?”
“मत भूलो। पर सोचो — श्यामू ने वो नाम नींद में क्यों लिया? बीस साल बाद? उसे क्या दिखा?”
मैंने सोचा। और मेरे भीतर एक ठंडी सी बात चमकी।
“उसने वही पानी पिया,” मैंने धीरे कहा। “जो मेरे पापा ने पिया था।”
मीरा मेरी तरफ़ देखने लगी। “तो वो नाम उसने पहले कभी नहीं लिया?”
“मैंने कभी नहीं सुना। श्यामू गाँव में दस साल से है, और मैंने आज तक उसके मुँह से रघुवीर का नाम नहीं सुना।”
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया और कहा, “कल सुबह हम श्यामू के पास जाएँगे। और जब वो जागेगा, तो मैं उससे ये नाम पूछूँगी।”
“और भैरव?”
“भैरव को लगता है कि वो हमें डरा रहा है,” मीरा ने कहा। “पर उसने एक बात बता दी जो उसे नहीं बतानी चाहिए थी।”
“क्या?”
“कि वो बीस साल से उस बीज को ढूँढ रहा है। जिसका मतलब ये है — वो बीज ख़तरनाक है। उससे डरता है। और जो आदमी किसी चीज़ से डरता है, उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी वही चीज़ होती है।”
हम झोपड़ी के पास पहुँचे। दरवाज़े पर बाई खड़ी थी, और उसके हाथ में लालटेन थी।
“आ गए?” उसने कहा। “अंदर आओ, उसने आँखें खोल दी हैं।”
मैं दरवाज़े पर रुका। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
श्यामू चारपाई पर लेटा था।
॥
मैं दरवाज़े पर रुका था, और मेरे पैर अंदर नहीं जा रहे थे। मेरे भीतर एक अजीब सा डर बैठा था — वो डर नहीं जो भैरव से लगता है। ये डर अलग था। ये डर ये सोचकर था कि अंदर जो आदमी लेटा है, वो मेरे पापा को जानता है। मेरे असली पापा को। जिसे मैंने कभी जीते-जागते नहीं देखा। जिसकी सिर्फ़ एक फटी तस्वीर मेरे पास है, और एक नाम — रघुवीर।
बाई ने लालटेन ऊँची की। "अंदर आ जा, बेटा। वो तेरा ही इंतज़ार कर रहा है।"
मीरा ने मेरी कुहनी पकड़ी। उसका हाथ ठंडा था, पर दबाव पक्का था — चलो।
मैं अंदर गया। झोपड़ी में मिट्टी और घी की गंध थी, और उसके ऊपर एक हल्की कड़वी बू — वही बू जो मैं अब कहीं भी पहचान लेता हूँ। श्यामू चारपाई पर लेटा था। उसका शरीर ऐसा लग रहा था जैसे हड्डियों पर चमड़ा खींचकर मढ़ दिया गया हो। आँखें खुली थीं, छत की तरफ़। साँस चल रही थी, पर वो साँस किसी चलती हुई घड़ी की तरह थी — रुकने से पहले की आवाज़।
मैं उसके पास रखी पीढ़ी पर बैठ गया। मेरे हाथ घुटनों पर थे, और उँगलियाँ अपने आप हिल रही थीं।
"श्यामू भाई," मैंने धीरे कहा।
उसकी आँखें मेरी तरफ़ घूमीं। धीरे, बहुत धीरे। जैसे कोई भारी चीज़ खींचकर घुमाई जा रही हो।
और फिर उसने मुझे देखा। पहले तो कुछ समझा नहीं। फिर उसकी आँखें सिकुड़ीं। फिर फैलीं। और उसके होंठ खुले रह गए।
"तू…" उसकी आवाज़ काँपी। "तू कौन है?"
"मेरा नाम वीर सिंह है।"
वो कुछ देर चुप रहा। उसकी आँखें मेरे चेहरे पर चलीं — माथे पर, आँखों पर, ठुड्डी पर। जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना पलटकर कोई पुरानी लिखाई पढ़ रहा हो।
"वीर सिंह…" उसने दोहराया। फिर उसकी आवाज़ अचानक भर आई। "तू… तू रघुवीर का बेटा है? वो जो रोज़ अखाड़े की दीवार के बाहर खड़ा रहता था? जो मिट्टी सूंघता था?"
मेरे सीने में कुछ ज़ोर से धड़का। "तुम मेरे पापा को कैसे जानते हो?"
उसने जवाब नहीं दिया। उसकी आँखों से एक आँसू निकला और कान तक चला गया, और उसने उसे पोंछा भी नहीं। जैसे उसे पता ही नहीं चला।
"बीस साल," वो बोला, और उसकी आवाज़ फट गई। "बीस साल मैंने सोचा कि उसका कोई नहीं बचा। मैंने सोचा कि उसका बेटा भी उसके साथ चला गया।"
मैंने उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर हिम्मत नहीं हुई। मेरा गला सूख रहा था।
"मेरे पापा को क्या हुआ?" मैंने पूछा। "कैसे हुआ?"
श्यामू ने आँखें बंद कर लीं। उसकी साँस लंबी चली गई, और मुझे लगा कि वो बेहोश हो गया। पर फिर वो बोला, आँखें बंद ही रखकर।
"तेरे पापा… तेरे पापा अखाड़े के सबसे अच्छे पहलवान थे। मुझसे दो साल बड़े थे, पर मेरे दोस्त थे। रोज़ सुबह मिट्टी में साथ गूंथते थे। वो मिट्टी को हाथ लगाकर बता देते थे कि कल किसने कसरत की और किसने नहीं। हम हँसते थे — अरे रघुवीर, तेरी नाक तो कुत्ते से भी तेज़ है।"
मेरे भीतर कुछ ढीला पड़ गया। मैंने सुना था ये बात, पर किसी और के मुँह से, किसी और के लिए। आज पहली बार किसी ने ये बात मेरे पापा के लिए कही। और वो भी हँसकर।
"फिर एक दिन," श्यामू ने कहा, और उसकी आवाज़ बदल गई, "रघुवीर ने मुझे अखाड़े के पीछे खींचा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने भूत देखा हो। उसने मेरा कंधा पकड़ा और बोला — 'श्यामू, भैरव के पानी में कुछ मिला है। इसे मत पीना। बिलकुल मत पीना।'"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के पास खड़ी थी, बैग सीने से लगाए, और उसकी आँखें श्यामू पर जमी थीं।
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