Spirit of a Fighter – Chapter 178
मैं जड़ हो गया।
मेरे पैर वहीं रुक गए, जैसे ज़मीन ने उन्हें पकड़ लिया हो। मेरी साँस रुक गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा, और उसका चेहरा भी वैसा ही सफ़ेद था।
"उसने…" मीरा ने फुसफुसाया। "उसने तुम्हारे पापा का नाम लिया?"
मैं पलटा और झोपड़ी की तरफ़ दौड़ा। पर्दा हटाया। श्यामू अब भी पड़ा था, आँखें बंद, चेहरा शांत। पर उसके होंठ अब भी हिल रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना गीत गा रहा हो।
"रघुवीर… रघुवीर…"
मैं उसके पास बैठ गया। मेरे हाथ उसकी चारपाई पर थे, और मेरी आवाज़ धीमी थी।
"श्यामू भाई," मैंने कहा। "श्यामू भाई, जागो।"
पर वो नहीं जागा। वो गहरी नींद में था, और उसकी बेचैन आवाज़ उसके सपने से आ रही थी — बीस साल पुराने किसी सपने से।
मीरा मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने श्यामू की नाड़ी पकड़ी और कुछ पल उसे देखती रही।
"उसे बुखार है," उसने कहा। "हल्का। ये अच्छा नहीं है, पर उसकी नींद असली है। उसे जगाना मत।"
मैं उठा। मेरी आँखें श्यामू पर टिकी थीं।
"वो मेरे पापा का नाम कैसे जानता है?" मैंने कहा। "श्यामू उस उम्र का नहीं है जो पापा के साथ अखाड़े में था। वो तो बीस साल पहले बच्चा रहा होगा।"
मीरा ने कुछ देर सोचा। फिर बोली, "या शायद वो उन्हें जानता था। या शायद उसने कोई कहानी सुनी हो। या शायद…" वो रुकी। "या शायद श्यामू उस आदमी के परिवार से है जिसने तुम्हारे पापा को ज़हर दिया था।"
मेरे पेट में एक ठंडी लहर दौड़ी।
"मतलब?"
"मतलब, अगर श्यामू का कोई अपना भैरव के साथ था," मीरा ने कहा, "तो उसने श्यामू को ये कहानी सुनाई होगी। और श्यामू ने वो कहानी याद रखी होगी — शायद बचपन में, शायद डर से।"
मैंने अपने हाथ देखे। मेरी हथेली पर बीज अब भी गरम था, और उसके साथ एक नई उम्मीद भी।
"तो श्यामू सिर्फ़ पीड़ित नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "वो गवाह भी है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक लौट आई थी, पर इस बार वो सख़्त नहीं थी — वो उम्मीद की चमक थी।
"हाँ," उसने कहा। "और अगर वो जानता है कि रघुवीर को ज़हर कैसे मिला, तो हमें ये भी पता चल सकता है कि बीस साल पहले उस रात कुएँ पर क्या हुआ था।"
मैंने एक गहरी साँस ली। फिर मैंने श्यामू की तरफ़ देखा — उसका चेहरा, जो अब थोड़ा शांत था, और उसके होंठ, जो अब भी कुछ बड़बड़ा रहे थे।
"मीरा," मैंने कहा। "कल सुबह, जब वो जागेगा, मुझे उससे बात करनी है।"
"मुझे भी," उसने कहा। "पर पहले हमें भैरव से निपटना है। और भैरव को ये नहीं पता होना चाहिए कि श्यामू कुछ जानता है।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने श्यामू की पत्नी की तरफ़ देखा, जो कोने में बैठी हमारी बातें सुन रही थी।
"बाई," मैंने कहा। "कल सुबह तक कोई इस झोपड़ी के पास न आए। हम आएँ, तो ही दरवाज़ा खोलना। और अगर कोई और आए — कोई भी, भैरव का आदमी हो या पुलिस — तो कह देना कि तुम्हारा आदमी मर गया।"
औरत की आँखें फैल गईं। "मर गया?"
"सिर्फ़ कहने के लिए," मीरा ने धीरे से कहा। "जब तक हम लौटें, तब तक ये खबर गाँव में फैल जाएगी। और अगर भैरव को लगे कि श्यामू मर गया, तो वो हमारी तरफ़ से आँख हटा लेगा।"
औरत ने एक पल सोचा। फिर उसने सिर हिलाया, और उसकी आँखों में एक नई मज़बूती आई।
"अगर मेरे आदमी के लिए है," उसने कहा, "तो मैं सब कुछ कह सकती हूँ। मैंने बीस साल से सिर्फ़ रोना सीखा है। अब मैं कुछ और भी सीख लूँगी।"
मैंने उसे देखा और मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिलाया।
हम बाहर निकले। मीरा ने अपना बैग कंधे पर रखा और अपने हाथ झाड़े।
"अब चल," उसने कहा। "भैरव इंतज़ार कर रहा है, और मुझे लगता है वो हमसे ज़्यादा इंतज़ार नहीं करेगा।"
हम नहर के किनारे-किनारे चलने लगे। पानी अंधेरे में काला दिख रहा था, और उसकी आवाज़ धीमी और लगातार थी।
रास्ते में मीरा ने अचानक कहा, "वीर, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तुम्हारे पापा… रघुवीर… वो कैसे थे?"
मैं कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "मैं उन्हें जानता नहीं। मैंने उन्हें कभी देखा नहीं। मेरे पापा जगदीश थे — जिन्होंने मुझे गोद लिया। रघुवीर तो सिर्फ़ काग़ज़ों में है। थैली में, चिट्ठियों में, और अब उस बीज में।"
"तो तुम उनके लिए क्यों लड़ रहे हो?"
मैं रुका। मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "मेरे पास एक ही चीज़ है जो उन्होंने मुझे दी — और वो ये नाक है। वो मेरी पहचान है, और वो उनसे आई है। अगर मैं उस आदमी से नहीं लड़ूँगा जिसने उन्हें मारा, तो ये नाक किस काम की?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले उनमें नहीं देखा था — नरमी, बहुत गहरी।
"तुम्हारे पापा," उसने धीरे से कहा, "अगर आज देखते, तो गर्व करते।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मेरा गला भर आया था, और उस वक़्त मुझे कोई शब्द नहीं मिला।
हम कुछ देर चुपचाप चलते रहे। नहर कहीं पीछे छूट गई, और सामने अखाड़े की मिट्टी की दीवार दिखने लगी थी — लाल, ऊँची, और उसके पीछे एक लालटेन की रोशनी धीरे-धीरे आगे-पीछे हो रही थी। जैसे कोई आदमी टहल रहा हो, और उसके हाथ में लालटेन हो।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें एक दबाव था।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "मैं डर रही हूँ।"
"मैं भी," मैंने कहा।
"पर हम रुक नहीं रहे।"
"नहीं रुक रहे।"
हम आगे बढ़े। रास्ते में मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और बीज निकाला। उसे हथेली पर रखा।
मुझे नहीं पता था कि वो बीज क्या था, या उससे क्या उगेगा। पर मुझे पता था कि मेरे पापा ने उसे बीस साल पहले इसीलिए रखा था — ताकि एक दिन कोई इसे मिट्टी में डाले, और ज़हर की जड़ पर ऐसा पेड़ उगे जो उसे सुखा दे।
मैंने बीज को वापस जेब में रखा और अखाड़े की तरफ़ बढ़ गया।
लालटेन की रोशनी अब बड़ी हो गई थी, और उसके साथ एक आवाज़ आई — भैरव की, मीठी, जैसे किसी पुराने गाने की धुन।
"आ गया, ईंट ढोने वाला? मैंने सोचा तू आज नहीं आएगा।"
मैंने मुट्ठी कसी। बीज मेरी हथेली में धधक रहा था।
और मेरे भीतर, दूर कहीं, श्यामू की बड़बड़ाहट गूँज रही थी — "रघुवीर… उस पानी को मत पीना…"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। और हम दोनों साथ आगे बढ़े।
भैरव ने लालटेन ऊपर उठाई। रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी और वो हँसा।
“अंदर आ। तेरे लिए भी कुछ है।”
“मैं अंदर नहीं आ रहा,” मैंने कहा।
भैरव ने लालटेन नीचे की और मेरी तरफ़ देखा, जैसे कोई बच्चा ज़िद कर रहा हो। “अरे, आज तो तू अपनी नई माई के साथ आया है। बहुत बढ़िया। मैडम, अंदर आइए, अखाड़े में औरतों की इज़्ज़त है।”
“हम अंदर नहीं आ रहे,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, जैसे वो कोई दवा बता रही हो। “हम श्यामू के बारे में बात करने आए हैं।”
भैरव का हाथ लालटेन पर कस गया। बस एक पल। फिर वो फिर हँसा, और उसकी हँसी पहले से ज़ोर की थी — जैसे किसी ने उसे मजबूर कर दिया हो।
“श्यामू? वो तो मर गया। सुबह खबर आई थी।”
“नहीं,” मीरा ने कहा। “वो मरा नहीं। मैंने उसे देखा है।”
भैरव की हँसी बीच में ही रुक गई। उसने लालटेन अपने बाएँ हाथ में ली और दाएँ हाथ की उँगलियाँ मुट्ठी में भींच दीं। मैंने उसकी मुट्ठी देखी — कभी वो पहलवानी करता था, और हाथ में वो दम अभी भी बचा था।
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