Spirit of a Fighter – Chapter 175
और तीसरी बार में मुझे दिशा मिल गई। ज़हर पूरब से आ रहा था। अखाड़े की तरफ़ से। कुएँ की तरफ़ से।
मेरी आँखें खुलीं। "मीरा, ये ज़हर अखाड़े से आ रहा है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो बीज वहीं है।"
"नहीं," मैंने कहा। "बीज चक्की के नीचे था। चक्की यहाँ थी। पर ज़हर अखाड़े से आ रहा है। मतलब — भैरव ने उसे जानबूझकर अखाड़े की तरफ़ खींचा है।"
मीरा का चेहरा बदला। "वो जानता है। वो जानता है कि अब ज़हर हवा में है। और वो चाहता है कि वो अखाड़े में जमा हो।"
"क्यों?"
"क्योंकि अखाड़े में मिट्टी है," माँ ने धीरे से कहा। "बहुत मिट्टी। और अगर ज़हर मिट्टी में जमा हो गया, तो वो मिट्टी ज़हरीली हो जाएगी। और जो भी उस मिट्टी में उतरेगा…"
वो रुक गईं।
"वो मरेगा," मैंने कहा।
आँगन में सन्नाटा छा गया। हवा की आवाज़ भी रुक गई, जैसे वो भी सुन रही हो।
टिंकू ने धीरे से कहा, "तो अब?"
मैंने अपनी मुट्ठी देखी। उसमें पापा की लिखाई वाला काग़ज़ था, जो अब भी मेरे पसीने से गीला हो रहा था। मैंने उसे मोड़कर कमीज़ की जेब में रखा।
"अब हमें ज़हर को अखाड़े की मिट्टी तक पहुँचने से रोकना है," मैंने कहा। "और उससे पहले, उसे ज़मीन पर लाना है।"
"कैसे?" मीरा ने पूछा।
मैंने आँगन की जली चक्की की तरफ़ देखा। फिर अपने हाथों की तरफ़, जिनमें बीस साल की मेहनत और मिट्टी थी।
"पापा ने लिखा है — मिट्टी हवा को खींच लेती है। तो मैं अखाड़े जाऊँगा। उस मैदान के बीच खड़ा हो जाऊँगा जहाँ कालू काका ने पुरानी परत बिछाई थी। और हवा को अपनी तरफ़ खींचूँगा। ज़हर जहाँ से आ रहा है, उसे अपने सीने तक लाऊँगा। और फिर…"
"और फिर?" मीरा ने कहा।
"और फिर उसे मिट्टी में डालूँगा। माँ की चक्की वाली मिट्टी में। जो अब भी ज़िंदा है।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर मज़बूत। "बेटा, उससे तेरा सीना जल जाएगा।"
"माँ, अगर मैं नहीं करूँगा, तो पूरे गाँव का सीना जलेगा।"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर। फिर उन्होंने अपना हाथ छोड़ दिया और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
"जा," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन। अगर तेरे पापा ने ये सब सोचकर लिखा था, तो उन्होंने एक रास्ता ज़रूर छोड़ा होगा। जो आदमी अपने बेटे को खतरे में डालने से पहले इतना लिखता है, वो उस खतरे से बचने का रास्ता भी लिखता है।"
मैंने काग़ज़ फिर निकाला। पूरा पढ़ा — दोबारा। हर लाइन। हर शब्द।
और आख़िरी लाइन में, जिसे मैंने पहली बार में जल्दी से पढ़ लिया था, कुछ और था। मैंने उँगली उस पर रखी।
"जल्दी कर, बेटा। वो हवा में ज़्यादा देर नहीं रहेगा। उसे किसी ज़िंदा चीज़ में घुसना है। मिट्टी में, पानी में, या किसी आदमी के सीने में।"
मेरी आँखें उस लाइन पर अटक गईं। "या किसी आदमी के सीने में।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। "माँ, जब भैरव ने तेरी चक्की जलाई — तू वहाँ थी?"
"थी," उन्होंने कहा। "मैं उस वक़्त चक्की पर बैठी थी।"
"और तूने धुआँ अंदर खींचा?"
वो रुक गईं। फिर धीरे से बोलीं, "हाँ। बहुत। मैं रो रही थी और… और मैंने धुआँ अंदर खींचा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा और उनकी नाड़ी देखी। वो तेज़ चल रही थी, पर वो भी सिर्फ़ डर से नहीं। उनकी साँस में वो कड़वाहट अब भी थी। बहुत हल्की। पर थी।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "तेरे अंदर भी है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनके चेहरे पर वो डर नहीं था जो मैंने सोचा था। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
"मुझे पता है, बेटा," उन्होंने कहा। "सुबह से सीने में जलन है।"
"तूने कुछ नहीं बताया?"
"क्या बताती?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वही पुरानी सख्ती लौट आई। "तू पहले से भैरव से लड़ रहा था। मैं तुझे और क्या बोझ देती?"
मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
"माँ, तू मेरा बोझ नहीं है। तू मेरी ताकत है।"
माँ मुस्कुराईं। और उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। "फिर तेरी ताकत कहे रही है — जा। मुझे कुछ नहीं होगा। मैं इंतज़ार करूँगी।"
मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "मैं तेरी माँ के पास रहूँगी। जब तक तू लौटे। मैं उन्हें दवा दूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी, पर उसके होंठ काँप रहे थे।
"मीरा…"
"जा," उसने कहा। "और लौटकर आ। वरना मैं तेरी घड़ी लेकर बैठी रहूँगी, और वो अभी भी नहीं चल रही।"
मैंने एक गहरी साँस ली। फिर पलटा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
रास्ते में मेरी नज़र आँगन के कोने पर पड़ी। गुड़िया की लाल मिट्टी की थैली वहीं पड़ी थी, जो कुएँ में गिरी थी और वापस मिली थी। मैंने उसे उठाया। उसकी गाँठ खोली।
अंदर लाल मिट्टी थी, और उसके नीचे एक और चीज़ — एक छोटा सा सूखा बीज। काला, चमकदार, जैसे जला हुआ कोयला।
मैंने उसे हथेली पर रखा। वो गरम था। बीस साल बाद भी।
और तभी मुझे समझ आया — पापा ने बीज को चक्की के नीचे नहीं दबाया था। उन्होंने उसे गुड़िया की थैली में, मेरे लिए छोड़ दिया था। इसीलिए थैली कुएँ से वापस आई थी। इसीलिए वो मेरे हाथ में थी।
मैंने थैली को जेब में रखा और बाहर निकल पड़ा।
गली में हवा तेज़ थी। और उसमें वो कड़वाहट अब साफ़ थी। मैंने अखाड़े की तरफ़ देखा। आसमान में बादल जमा हो रहे थे, और दूर कुएँ की तरफ़ से एक लालटेन की रोशनी झिलमिला रही थी।
भैरव इंतज़ार कर रहा था।
मैंने मुट्ठी कसी। हथेली में बीज धधक रहा था। और मेरे भीतर एक आवाज़ उठी — पापा की।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा।"
मैंने आँखें मूंदीं और मिट्टी को सूँघा। और इस बार मुझे सिर्फ़ ज़हर नहीं मिला। मुझे रास्ता मिला — उस ज़हर से उस बीज तक, और बीज से उस मिट्टी तक जो मेरे पैरों के नीचे बीस साल से सो रही थी।
मैंने आँखें खोलीं और अखाड़े की तरफ़ चल दिया, और मेरे पीछे आँगन से माँ की आवाज़ आई —
"बेटा, भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।"
मैं रुका। पलटा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, और उनके हाथ में एक रोटी थी, जो अभी गरम थी।
"खा ले," उन्होंने कहा। "लड़ाई से पहले।"
मैंने रोटी ली। वो गरम थी, और उसमें घी की गंध थी। मैंने एक टुकड़ा मुँह में डाला। और मेरी आँखें भर आईं, क्योंकि उसमें नमक ठीक था।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर्रा गई, "आज दाल में नमक ठीक है।"
माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। "अब तक तो मैंने तुझे कम नमक ही दिया था। आज पहली बार ठीक डाला है।"
मैं हँसा। और उस हँसी में मेरा डर थोड़ा हल्का हुआ।
फिर मैं मुड़ा और अखाड़े की तरफ़ चल दिया। लालटेन की रोशनी अब पास थी, और हवा में वो कड़वाहट अब इतनी घुल चुकी थी कि मेरी आँखें जल रही थीं।
पर मैं रुका नहीं।
क्योंकि आज मुझे पता था — भैरव ने ज़हर को हवा में छोड़ा था, पर वो एक बात भूल गया था।
मेरे पापा ने बीस साल पहले उस ज़हर के बीज को मेरी जेब में रख दिया था।
और बीज जिसके हाथ में हो, ज़हर उसी के हाथ में होता है।
॥
गली के मोड़ पर पहुँचकर मैंने एक बार पीछे देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, और उनका हाथ अब भी आधा उठा था, जैसे अभी भी मुझे रोकना चाहती हों पर जानती हों कि रोक नहीं सकतीं। मैंने हाथ हिलाया। और फिर मैं मुड़ा और तेज़ चलने लगा।
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