Spirit of a Fighter – Chapter 174
"पहले से," मीरा ने कहा। "और सुन टिंकू, तू हमारे साथ चल। घर। अभी।"
"घर?" टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि हम आज एक घड़ी खोलने वाले हैं," मैंने कहा।
हम तीनों गली से भागे। रास्ते में मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, और पैर जैसे ज़मीन नहीं छू रहे थे। जो काग़ज़ मैं बीस साल से ढूँढ रहा था — वो मेरे सामने, रोज़, दीवार पर टंगा था। और मैं उसे देखता भी नहीं था।
घर पहुँचे तो माँ आँगन में बैठी थीं, गुड़िया उनके पास। दोनों चुप। माँ ने हमें देखा और उठ खड़ी हुईं।
"क्या हुआ?"
"माँ," मैंने कहा, "वो घड़ी। आँगन की।"
माँ का चेहरा एक पल के लिए पत्थर हो गया। फिर वो धीरे से बोलीं, "तूने सोच लिया।"
"तूने जानबूझकर नहीं बताया?"
"मैंने कभी ढूँढा ही नहीं," माँ ने कहा। "तेरे पापा ने कहा था — 'जिस दिन वीर खुद इस घड़ी के बारे में पूछे, उस दिन उसे खोल देना।' मैं बीस साल से इंतज़ार कर रही थी।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। "आज पूछ रहा हूँ।"
माँ ने सिर हिलाया। "फिर खोल।"
गुड़िया पहले ही कुर्सी ले आई थी। मैं उस पर चढ़ा और घड़ी की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसका काँच धूल से भरा था, किनारे पर ज़ंग लगी थी। उसे उतारते वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे। माँ नीचे खड़ी थीं, आँखें ऊपर, होंठ भींचे।
घड़ी उतरी। पीछे की तरफ़ एक छोटा ढक्कन था, चार पेच। मैंने टिंकू की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "पेंचकस।"
"मेरे पास चाकू है," उसने कहा, और एक छोटा चाकू निकाला। "मिठाई काटने वाला।"
"दे।"
पेच एक-एक करके खुले। आख़िरी पेच निकला और ढक्कन हिला। मैंने उसे खींचा।
घड़ी के अंदर, पुराने पुर्जों के बीच, एक छोटी सी पीली लिपटी चीज़ थी। बहुत सावधानी से मोड़ी हुई। मैंने उसे बाहर निकाला। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मेरी आँखें जल रही थीं।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "ये… ये ही है।"
काग़ज़ खोला। पीला, पुराना, किनारों से टूटता हुआ। ऊपर पापा की लिखाई — वही लिखाई जो मैंने फटी तस्वीर के पीछे देखी थी। बीस साल की धूल उस पर जमी थी, पर अक्षर साफ़ थे। जैसे कल ही लिखे गए हों।
पहली लाइन पढ़ते ही मेरा हाथ रुक गया।
"जो इसे पढ़े, वो मेरा बेटा हो — वीर सिंह।"
मैंने आँखें ऊपर कीं। माँ मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनकी आँखों में पानी था। गुड़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने आगे पढ़ा।
"बेटा, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मैं नहीं हूँ। और शायद भैरव अब भी वहीं है। मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूँ जो मैंने किसी को नहीं बताई।
भैरव का ज़हर पानी में नहीं है। वो पानी में घुलता है, पर उसकी जड़ मिट्टी में है। उसने बीस साल पहले कुएँ के नीचे की मिट्टी खोदी और उसमें अपना बीज बोया। वो बीज अब तक ज़िंदा है। जब तक वो बीज ज़मीन में है, भैरव का पानी बनता रहेगा।
मैंने एक बार उस बीज को जलाने की कोशिश की। नहीं जला। मैंने उसे पानी से डुबोया। नहीं डूबा। फिर मैंने उसे तेरी माँ की चक्की के नीचे दबा दिया — पत्थर के नीचे। मैंने सोचा, पत्थर सबसे भारी होता है। पर अब मुझे लगता है, यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।
बेटा, वो बीज चक्की के नीचे है। और जब भैरव ने तेरी माँ की चक्की जलवाई — तो उसे पता था कि वो क्या जला रहा है। अगर चक्की टूट गई, तो बीज खुल गया। अगर बीज खुल गया, तो अब वो हवा में है।
जल्दी कर, बेटा। वो हवा में ज़्यादा देर नहीं रहेगा। उसे किसी ज़िंदा चीज़ में घुसना है। मिट्टी में, पानी में, या किसी आदमी के सीने में।
अगर तू देर करेगा, तो भैरव का ज़हर अब पानी नहीं, हवा से फैलेगा। और तब गाँव में कोई नहीं बचेगा।
तेरा पापा — रघुवीर सिंह।"
काग़ज़ मेरे हाथ से फिसल गया। टिंकू ने उसे झट से पकड़ लिया।
"भाई…" उसकी आवाज़ भारी थी। "ये… ये तो…"
"चक्की," माँ ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ जैसे किसी और की थी। "भैरव ने मेरी चक्की क्यों जलाई थी। बीस साल बाद।" उन्होंने अपने हाथों की तरफ़ देखा, जो अब भी चक्की चलाने की आदत में हिल रहे थे। "मुझे लगा वो मुझे तोड़ना चाहता है। पर वो… वो अपना बीज ढूँढ रहा था।"
गुड़िया ने रोते हुए कहा, "तो अब वो बीज कहाँ है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर बाहर आँगन में जली हुई चक्की की जगह की तरफ़, जहाँ अब सिर्फ़ काली मिट्टी और राख थी।
"हवा में," मैंने कहा। "और हवा में होने का मतलब है — किसी के अंदर। किसी के सीने में।"
माँ ने अचानक अपना हाथ सीने पर रख लिया। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"माँ?" मैंने कदम बढ़ाया।
"मुझे… मुझे कुछ नहीं," उन्होंने कहा, पर उनकी साँस तेज़ थी। "बस… बस सीने में जलन।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी नाड़ी तेज़ चल रही थी, पर और कुछ नहीं। फिर हवा का एक झोंका आया, और मैंने सूँघा।
और मेरे भीतर सब कुछ ठंडा हो गया।
हवा में वो गंध थी। वही कड़वाहट। वही धातु जैसी बदबू जो भैरव के पानी में थी। पर इस बार वो किसी बोतल से नहीं, खुद हवा से आ रही थी। फैल रही थी। धीरे-धीरे। जैसे कोई साँस ले रहा हो और छोड़ रहा हो।
मैंने पलटकर टिंकू की तरफ़ देखा। उसके होंठ भी सूखे थे। मीरा ने अपना मुँह कपड़े से ढक लिया था।
"मीरा," मैंने तेज़ी से कहा, "तू आयुर्वेद पढ़ती है। इस गंध को रोकने का कोई तरीका?"
मीरा ने कपड़ा हटाया, और उसकी आँखें तेज़ थीं। "हवा में फैली चीज़ को रोकना मुश्किल है, पर उसे बाँधना आसान है।" उसने अपना बैग खोला। "नमक। गीला नमक। और काली मिर्च का धुआँ। अगर हम घर के चारों कोनों पर गीला नमक रखें और अंदर काली मिर्च जलाएँ, तो कुछ देर के लिए वो रुक जाएगा।"
"कुछ देर कितनी?"
"शायद एक रात।"
"तो हमें एक रात में कुछ करना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब भी पानी से भरी थीं, पर उनकी आवाज़ साफ़ थी। "बेटा, तेरे पापा ने लिखा है — बीज हवा में है। तो उसे ज़मीन पर लाना होगा।"
"कैसे?"
"वही जो वो करते थे," माँ ने कहा। "मिट्टी से। मिट्टी हवा को खींच लेती है। तू जानता है ना? तेरी नाक जो कर सकती है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। और मुझे समझ आया। मेरी नाक सिर्फ़ सूँघ नहीं सकती थी। वो हवा में क्या है, कहाँ है, कितना है — ये भी बता सकती थी। और अगर मैं हवा में फैले ज़हर को सूँघकर उसकी दिशा पकड़ सकूँ, तो मैं उसे मिट्टी तक खींच सकता था।
पर उसके लिए मुझे अपनी शक्ति की आख़िरी हद तक जाना होगा। और माँ ने कहा था — ज़्यादा इस्तेमाल से नाक से खून आता है। और सिर फटने लगता है।
टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा। "भाई, मैं जानता हूँ तू क्या सोच रहा है। मत कर।"
"करना पड़ेगा।"
"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने पहली बार सुना। "तू हमेशा अकेले सब करता है। अब नहीं। मीरा नमक और मिर्च का इंतज़ाम करेगी। माँ घर के अंदर रहेगी। गुड़िया…"
"मैं क्या करूँगी?" गुड़िया ने कहा।
टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा। "तू… तू गाँव में सबको बताएगी। सुक्खी बुआ के पास जा। वो पूरे रामपुर को बुला सकती है। बोल — हवा में ज़हर है। सब अपने घरों में गीला नमक रखें।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो भाग गई।
और मैं आँगन के बीच खड़ा रहा, हवा में वो कड़वाहट सूँघता हुआ, जो हर पल बढ़ रही थी। मेरी आँखें बंद हो गईं। मैंने हवा को अंदर खींचा — बहुत धीरे, बहुत गहरा। और फिर छोड़ा। फिर खींचा।
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