Spirit of a Fighter – Chapter 173
और मेरे हाथ में वो फटी तस्वीर थी। श्यामू एक तरफ़, गोविंद दूसरी तरफ़। बीच से फटी। मैंने उसे उलटा किया।
पीछे कोयले वाली लिखाई के नीचे, बहुत छोटा सा, किसी पुराने पेन से लिखा था। मैंने आँखें सिकोड़ीं। वो लिखाई जानी-जानी थी।
पापा की लिखाई थी।
"भैरव के पास जो काग़ज़ है, वो नक़ल है। असली मेरे पास।"
मैंने पलटकर माँ की तरफ़ देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, और उनके हाथ में एक लाल धागा था, जो उनकी उँगली पर लिपटा हुआ था।
"माँ," मैंने काग़ज़ ऊपर किया, "ये तुमने देखा था?"
माँ ने देखा। और उनका चेहरा बदल गया।
"मैंने ये लिखाई नहीं देखी," वो धीरे से बोलीं। "पर मुझे पता है ये क्या है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पापा ने असली काग़ज़ घर में ही छिपाया था। बीस साल। मेरे सामने। और मैंने कभी ढूँढा नहीं।"
गुड़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"भैया," वो बोली, "तो अब असली काग़ज़ कहाँ है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर हाथ में पकड़ी फटी तस्वीर की तरफ़, जहाँ श्यामू और गोविंद अब भी मुस्कुरा रहे थे — दोनों अलग-अलग, पर एक ही काग़ज़ पर।
और मुझे पहली बार लगा कि भैरव ने आज ग़लती की है।
वो मुझे डराना चाहता था। पर उसने मुझे रास्ता दे दिया।
॥
मैंने वो फटी तस्वीर मेज़ पर रखी और सीधा अखाड़े की तरफ़ चल दिया। रास्ते में टिंकू मेरे पीछे-पीछे चल रहा था, मुँह में कुछ बड़बड़ाता हुआ, पर मैंने एक बात नहीं सुनी। मेरे भीतर एक ही आवाज़ चल रही थी — पापा की लिखाई। बीस साल से छिपा हुआ काग़ज़। घर में। मेरे ही सामने।
अखाड़े का गेट खुला था, पहली बार। और गेट पर लुट्टन खड़ा था।
उसने मुझे देखा और होंठ टेढ़े कर दिए। वो मुस्कान जो पहले कभी नहीं देखी थी। जैसे कोई जानता हो कि मैं आऊँगा, और ठीक उसी वक़्त आऊँगा।
"सर ने बुलाया है," उसने कहा। "अंदर आ जा।"
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। "भाई, ये नई चाल है।"
"पता है," मैंने कहा, और उसकी उँगलियाँ खोल दीं। "तू बाहर रुक। अगर मैं आधे घंटे में न निकलूँ, तो शोर मचा देना।"
"आधा घंटा? भाई, मैं तो दो मिनट में…"
"टिंकू।"
वो चुप हो गया। उसने सिर हिलाया और गेट की दीवार से टिक गया।
अंदर की मिट्टी आज अलग लग रही थी। गीली नहीं थी, सूखी नहीं थी। जैसे किसी ने उसे जानबूझकर छुपा दिया हो। मैंने साँस से खींचा — नमक, पुराना पसीना, और ऊपर से कुछ मीठा। चाय। भैरव के कमरे से।
उसका दरवाज़ा खुला था। वो अंदर बैठा था, सामने एक छोटी मेज़ पर दो कप चाय रखी थी। भाप उठ रही थी। कमरे में हल्की अदरक की गंध थी, और पीछे कहीं दालचीनी की।
मैं दरवाज़े पर ही रुक गया।
"बैठ, बेटा। चाय पी।" उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। कोई मिठास भी नहीं। बस सपाट, ठंडी बात।
"मैं प्यासा नहीं हूँ।"
"तो खड़ा रह।" उसने अपना कप उठाया, घूँट लिया, और खिड़की की तरफ़ देखने लगा। "तू श्यामू के पास गया। अच्छा किया। उसकी हालत देखी?"
मेरा हाथ मुट्ठी में बंध गया। मैंने कुछ नहीं कहा।
"वो मेरी गलती नहीं, बेटा," भैरव ने कहा, और कप नीचे रख दिया। "वो उसकी किस्मत है। जिसने ताकत माँगी, उसने कीमत भी देनी पड़ी। श्यामू ने माँगी थी। मैंने दी।"
"कीमत तू वसूलता है, भैरव।" मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी अजीब लगी — धीमी, पर काँप रही थी। "तू ज़हर देता है और उसे किस्मत कहता है।"
वो पलटा। उसकी आँखें अब भी ठंडी थीं, पर आवाज़ पहली बार थोड़ी ऊँची हुई। "ताकत तो सबमें है, बेटा। फर्क सिर्फ़ यह है कि किसकी ताकत किसके हाथ में है।"
"मेरी ताकत मेरे हाथ में है।"
भैरव हँसा। वो हँसी कमरे में फैल गई, दीवारों से टकराई और मेरे सीने में उतर गई। उसने चाय का कप फिर उठाया और उसकी भाप में देखते हुए बोला — "अभी नहीं है। अभी वो टिंकू के हाथ में है। तेरी माँ के हाथ में है। उस मीरा के हाथ में है। जिस दिन तू समझ जाएगा कि तेरी ताकत तेरे पास नहीं है — उस दिन तू मेरा हो जाएगा।"
मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि कहने को कुछ था भी नहीं। मेरे भीतर एक चुभन उठी, तेज़ और साफ़। जैसे किसी ने मेरी ही बात मुझे वापस लौटा दी हो।
मैंने जेब से वो फटी तस्वीर निकाली और उसकी मेज़ पर रख दी। श्यामू एक तरफ़, गोविंद दूसरी तरफ़, बीच से फटी।
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसकी उँगलियाँ कप पर कस गईं। बस एक पल। फिर वो वैसा ही हो गया।
"ये तूने कहाँ से लिया?"
"तेरे आदमी ने मेरे घर में छोड़ा था," मैंने कहा। "धमकी के साथ। पर तूने एक बात नहीं सोची, भैरव।"
"क्या?"
"तूने मुझे रास्ता दे दिया।"
मैं पलटा और बाहर चल दिया।
रास्ते में मेरी नज़र अखाड़े के कोने पर पड़ी। मीरा वहाँ खड़ी थी। दीवार से टिकी, हाथ में उसका किताबों का बैग, आँखें मुझ पर। उसने सब सुना था। पूरा।
मैं उसके पास पहुँचा। मेरी आवाज़ में वो दम नहीं थी जो भैरव के सामने था। मीरा के सामने खड़े होकर मुझे अपनी ही बात पर शक होने लगा।
"तूने सुना?"
"सब," उसने कहा। "हर शब्द।"
"वो झूठ बोल रहा था।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर धीरे से बोली — "वो झूठ नहीं बोला। पर एक बात वो भूल गया।"
"क्या?"
"तेरी ताकत जिनके हाथ में है, वो सब तेरे साथ हैं।" उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। "और उसके हाथ में सिर्फ़ पानी है।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा। उसके माथे पर पसीने की एक बूँद थी, और उसके होंठ सूखे थे, पर उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहली बार नहर के मोड़ पर सुनी थी। वो ज़िद जो किसी से नहीं डरती।
"तू यहाँ क्यों आई?" मैंने पूछा। "मैंने तुझे बबूल के पेड़ के पास बुलाया था। तू नहीं आई।"
"मैं आई थी," उसने कहा। "पर तू नहीं था। तू अपनी माँ के पीछे भाग रहा था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने सोचा, अगर तू भाग सकता है, तो मैं भी भाग सकती हूँ। यहाँ आ गई। यहाँ तुझे रोकने के लिए।"
"रोकने के लिए क्यों?"
"क्योंकि मुझे पता था तू सीधा भैरव के पास जाएगा। और भैरव तुझे बातों में उलझा देगा।" उसने मेरे हाथ की तरफ़ देखा, जो अब भी मुट्ठी में था। "देखा? मैं सही थी।"
मैंने मुट्ठी खोली। हथेली पर पसीना था, और उस पर फटी तस्वीर का एक कोना चिपका हुआ था।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "पापा ने असली काग़ज़ घर में छिपाया था। बीस साल। माँ को पता है। पर कहाँ है, ये नहीं पता।"
मीरा ने एक पल सोचा। "काग़ज़ छिपाने की जगह कभी ऐसी नहीं होती जहाँ कोई ढूँढे। वो ऐसी होती है जहाँ कोई देखे ही नहीं।"
"क्या मतलब?"
"घर में सबसे ज़्यादा कौन सी चीज़ है जिसे हर रोज़ सब देखते हैं, पर कभी नहीं देखते?"
मैं रुक गया। और तभी मेरे दिमाग़ में वो घड़ी चली — माँ के आँगन की दीवार पर टंगी टूटी घड़ी। जो कभी चली नहीं। जिसे हर रोज़ सब देखते हैं, पर कोई नहीं देखता।
"घड़ी," मैंने कहा। "आँगन की टूटी घड़ी।"
मीरा ने सिर हिलाया। "तेरे पापा ने उसे कभी बदला नहीं, ना? बीस साल में एक बार भी नहीं?"
मेरा सीना धक-धक करने लगा। "नहीं। माँ कहती थी कि वो उनकी याद है।"
"कभी सोचा क्यों?"
टिंकू उसी वक़्त गेट से अंदर घुसा, हाँफता हुआ। "भाई! मैंने तुझे दो मिनट… मतलब आधा घंटा… अरे, मैंने सोचा अंदर घुस जाऊँ।" उसने मीरा को देखा और रुक गया। "अरे, तू यहाँ कब आई?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno