Spirit of a Fighter – Chapter 172
"पता है," मैंने कहा। "कुर्सी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "पर कुर्सी पर बैठकर भी मैं मिट्टी से बात करता रहूँगा। तू नहीं कर पाया।"
भैरव पलटा और चला गया। उसकी पीठ अब पहले जैसी नहीं थी। धीमी थी। भारी थी।
मैं कुएँ के पास खड़ा रहा। फिर मैं झुका और मिट्टी को दोनों हाथों में भर लिया। उसे सीने से लगाया।
"मैं आ रहा हूँ," मैंने फुसफुसाया। "अब जल्दी आ रहा हूँ।"
घर लौटते वक़्त टिंकू गेट पर मिला। उसने सीटी जेब में रखी और पूछा, "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "पर कुछ होने वाला है।"
वो कुछ देर मेरे चेहरे को देखता रहा। फिर बोला, "तेरे चेहरे पर मिट्टी लगी है।"
"अच्छा है," मैंने कहा। "आज के बाद ये मेरा श्रृंगार होगा।"
टिंकू हँसा। "भाई, तू पागल हो गया है।"
"हो गया हूँ," मैंने कहा। "और आज पहली बार अच्छा लग रहा है।"
घर पहुँचा तो दरवाज़े पर एक थैली टँगी थी। जूट की थैली। मेरे पैर रुक गए।
टिंकू ने पीछे से कहा, "ये किसने टाँगी?"
मैंने थैली खोली। अंदर एक काग़ज़ था। पुराना काग़ज़, मुड़ा हुआ। मैंने खोला।
वो श्यामू की तस्वीर थी। वही तस्वीर जो उसकी दीवार पर टँगी थी। पर अब फाड़ी हुई। बीच से। जहाँ दोनों हाथ जुड़े थे, वहीं से आर-पार चीर दी गई थी। श्यामू एक तरफ़, गोविंद दूसरी तरफ़।
और तस्वीर के पीछे, कोयले से मोटे अक्षरों में लिखा था।
"अगली तस्वीर तेरी होगी।"
मेरा हाथ काँपा। पर उँगलियों ने काग़ज़ नहीं छोड़ा।
माँ दरवाज़े पर आईं। उन्होंने थैली देखी, मेरा चेहरा देखा, और बिना कुछ पूछे अंदर चली गईं। फिर लौटीं — हाथ में लाल धागा।
"हाथ दे," उन्होंने कहा।
मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने कलाई पर धागा बाँधा। कसकर।
"ये धागा तेरे पापा का था," वो बोलीं। "उन्होंने उस दिन बाँधा था जिस दिन गोविंद को बचाने गए थे। और वो भी भैरव की ही धमकी के बाद बाँधा गया था।" उन्होंने गाँठ कसी। "जब तेरे पापा लौटे, धागा टूटा हुआ था, पर वो छूटा नहीं।"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"आज रात," मैंने कहा, "मैं उस मिट्टी में लेटूँगा।"
माँ ने मेरा माथा चूमा। "जानती हूँ।" उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में भरा। "जब लेटे, तो आँखें बंद रखना। और जो भी दिखे, उसे देखना। डरना मत।"
तभी गुड़िया की आवाज़ आई — "भैया!"
वो दौड़कर आई, हाथ में एक फटी कॉपी लिए। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"भैया," वो हाँफते हुए बोली, "माँ की साड़ी की तरह… दरवाज़े के पीछे कुछ लिखा है। मैंने अभी देखा।"
मैं दौड़ा। दरवाज़े के पीछे, नीचे की तरफ़, कोयले से छोटे अक्षरों में लिखा था। लिखाई वही — भैरव की।
"तेरे पापा ने तीन साल पहले जो काग़ज़ जलाया था, वो जला नहीं था। बस उसकी नक़ल जली थी। असली काग़ज़ मेरे पास है।
और उस पर तेरे पापा की लिखाई में एक नाम है — उस आदमी का जिसने सबसे पहली खुराक पी थी।
तेरे घर में।
तेरे खून में।
सोच।"
मैं पीछे हटा। मेरी साँस रुक गई।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा पहली बार ऐसा था जो मैंने कभी नहीं देखा।
"माँ?" मैंने धीरे से कहा। "पापा ने कौन सा काग़ज़ जलाया था?"
माँ ने अपनी साड़ी का पल्ला कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"माँ?"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"तेरे पापा ने एक काग़ज़ जलाया था," वो बोलीं, इतनी धीमी आवाज़ में कि गुड़िया को भी सुनने के लिए झुकना पड़ा, "उस रात — जिस रात गोविंद मरा था। और उस काग़ज़ पर एक नाम था।" उन्होंने आँखें खोलीं। "मैंने वो नाम पढ़ा था।"
"क्या नाम था?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा।
और फिर वो बोलीं — "रघुवीर।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"क्या?" मेरी आवाज़ फटी। "पापा का नाम?"
"हाँ," माँ ने कहा। "उस काग़ज़ पर लिखा था — पहली खुराक पीने वाला: रघुवीर सिंह।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। गुड़िया ने मेरी कमर पकड़ ली। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा रह गया।
और मेरे भीतर वो सब टूटने लगा जो मैंने बीस साल में सोचा था।
मैंने दीवार का सहारा लिया। पैर नहीं थम रहे थे।
"माँ, तुमने ये बात बीस साल छिपाई?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं, और यही सबसे डरावना था। जिस आदमी के पास रोने के लिए भी पानी न बचा हो।
"छिपाई नहीं," वो बोलीं। "दबाई थी। तेरे पापा उस रात लौटे थे, हाथ जलाकर। बोले — 'अगर वो नाम किसी को पता चला, तो हमारा घर नहीं बचेगा।' और मैंने कसम खाई थी।"
"पर पापा ने खुद ही वो पहली खुराक पी थी?" मेरी आवाज़ काँपी। "अपनी मर्ज़ी से?"
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "नहीं। धोखे से। भैरव ने उन्हें कहा था कि ये शक्ति का पानी है, अखाड़े के बुज़ुर्गों ने भेजा है। तेरे पापा ने पिया। और जब पता चला कि पिया क्या है, तब तक…" उन्होंने गला साफ़ किया। "तब तक तीन और लोग पी चुके थे। तेरे पापा ने सबसे पहले भैरव को पहचाना। और उसी दिन से उसके ख़िलाफ़ लड़ने लगे।"
गुड़िया ने धीरे से पूछा, "तो पापा भी… बाँधे हुए थे?"
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। "पापा की खुराक पूरी नहीं हुई थी। तभी तो वो लड़ पाए।"
मैं ज़मीन पर बैठ गया। घुटने टूट गए थे। जो आदमी मेरी नज़र में हीरा था, वो भी उसी पानी की एक घूँट में बँधा हुआ था। कोई भी साफ़ नहीं था।
टिंकू ने दरवाज़े से कहा, "वीर, मतलब भैरव जानता है कि तू उसका बेटा है? यही तो धमकी का मतलब है।"
"नहीं," मैंने कहा। "वो जानता है कि मैं पता लगा रहा हूँ। इसलिए खेल खेल रहा है।" मैंने माँ की तरफ़ देखा। "माँ, उस काग़ज़ पर और क्या था? सिर्फ़ नाम?"
माँ ने होंठ भींचे। "एक लाइन और थी। छोटी सी।" उन्होंने आँखें बंद कर लीं, जैसे याद कर रही हों। "उस पर लिखा था — 'पानी जिसे देता है, उसे अपना बना लेता है। जो सबसे पहले पिया, वो सबसे पहले गया।'"
मैंने साँस रोक ली। "मतलब पापा…"
"पापा ने खुद को बचाने के लिए कोई और नहीं चुना," माँ ने आँखें खोलते हुए कहा। "तेरे पापा ने अपनी चौथी खुराक कभी नहीं पी। और उसने अपनी जगह भरने के लिए… भैरव को उसकी ही किताब से हराया। जब पानी को हराने का कोई रास्ता नहीं मिला, तो उन्होंने पानी की जगह बदल दी।"
"क्या मतलब?"
"पापा ने उस नहर का रास्ता बदल दिया था," माँ ने कहा। "एक रात, चुपचाप। भैरव का पानी उस जगह से हट गया जहाँ उसने बीस साल से जमाया था। इसीलिए भैरव ने तुझे याद दिलाया कि तेरे पापा ने काग़ज़ जलाया था — वो जानता है कि तू खोदेगा।"
मेरे भीतर कुछ हिला। "तो अब भी उसे हराया जा सकता है। पापा ने कर दिखाया था।"
"पापा ने एक बार किया," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार भारी हुई। "भैरव उसी को बीस साल से सुधार रहा है। वो रास्ता अब बंद है।"
मैं उठा। हाथ जल रहे थे, पसीने से नहीं, किसी और चीज़ से।
"तो नया रास्ता खोदूँगा," मैंने कहा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराई। पहली बार आज। "तेरे पापा भी यही बोलते थे।"
तभी बाहर गली में किसी ने तेज़ सीटी बजाई। टिंकू गेट की तरफ़ भागा और दो पल में लौटा। उसका मुँह खुला था।
"वीर," वो हाँफते हुए बोला, "बाहर वही आदमी खड़ा है। काला कुर्ता।"
मैं दौड़कर बाहर गया। गली खाली थी। बस नहर की तरफ़ जाते हुए लंबे साए को देखा, जो मुड़कर नहीं देखा।
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