Spirit of a Fighter – Chapter 171
मेरी आँखें जल रही थीं।
"भैरव तुझे यही दिखाएगा," माँ बोलीं। "कहेगा — तेरे पापा भी अपने दोस्त को नहीं बचा पाए, तो तू क्या बचाएगा।"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। "तो मैं उसे क्या कहूँ?"
माँ ने मेरी मुट्ठी खोलकर उसमें अपनी उँगली रखी। "तू कुछ मत कह। बस सुन। जो डर दिखाए, उसे देख। पर उसके आगे झुकना मत।" उन्होंने मेरी हथेली थपथपाई। "और हाँ — आधी रात तक लौट। मैं जाग रही हूँ।"
रात नौ बजे मैं अखाड़े की तरफ़ चला। टिंकू साथ आया, पर गेट से पहले उसने कहा, "मैं यहीं रहूँगा। ज़रूरत पड़ी तो सीटी बजाऊँगा।" उसने जेब से एक छोटी सीटी निकाली। "मेरी दुकान वाली।" वो मुस्कुराया। "अब तो दुकान ही नहीं, पर सीटी बची है।"
मैंने उसका कंधा थपथपाया और अंदर चला गया।
अखाड़ा सुनसान था। मिट्टी में पानी सूख रहा था, उसकी सतह पर पपड़ी बन रही थी। मैंने पैर रखा तो वो पपड़ी चटकी। उसके नीचे से वही गंध उठी — नम, भारी, और उसमें वो कड़वाहट जो मैं अब बंद आँखों से भी पहचान लेता हूँ। पर आज कुछ और था उसमें। थोड़ी सी मिठास। जैसे सड़ती हुई मिट्टी के नीचे कोई मीठा फल रखा हो।
मैं रुका। मैंने नाक से गहरी साँस ली।
हरी शीशी की गंध नहीं थी। ये कुछ और था। ज़्यादा पुराना। ज़्यादा गहरा।
मैंने मिट्टी पर झुककर हाथ रखा। परत हटाई। नीचे की मिट्टी ठंडी थी। और उस ठंडक में एक हल्की गर्मी थी, जैसे कोई साँस ले रहा हो।
तभी पीछे से आवाज़ आई, "तू मिट्टी से बातें करता है।"
मैं उठा। भैरव दीवार के पास खड़ा था। उसके हाथ में लालटेन नहीं थी आज। उसके हाथ खाली थे, और यही सबसे डरावना था।
"तूने मुझे बुलाया," मैंने कहा। "मैं आ गया।"
"आ जा।" वो मुड़ा। "कुएँ की तरफ़।"
कुएँ की सीढ़ियाँ टूटी थीं, ऊपर पत्थर रखे थे। भैरव ने एक पत्थर हटाया। नीचे से हवा आई — ठंडी, भारी, और उसमें वो मिठास।
"तू नीचे आया था?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"तो तू जानता है वहाँ क्या है।"
"मिट्टी है।"
भैरव हँसा। "मिट्टी।" उसने अपना हाथ मिट्टी में डुबोया। "ये मिट्टी नहीं है, वीर। ये ज़िंदा है। ये साँस लेती है। जो इसमें लेटता है, उसकी थकान खींच लेती है।" उसने हाथ निकाला, उँगलियों से मिट्टी झाड़ी। "पर एक शर्त है। ये सिर्फ़ उसी की थकान खींचती है जिसका मन साफ़ हो। जिसके अंदर लालच हो, उसके लिए ये बस मिट्टी है।"
"तो तू क्यों नहीं लेटता इसमें?"
भैरव की आँखें सिकुड़ीं। "क्योंकि मेरा मन साफ़ नहीं है।" वो बोला, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहली बार सच्चा लगा। "और मैंने बीस साल पहले ये बात कबूल कर ली थी। इसीलिए मैंने दूसरा रास्ता चुना।"
"ज़हर?"
"ताकत," उसने सुधारा। "मैंने पाया कि अगर मिट्टी सिर्फ़ साफ़ आदमी को ताकत देती है, तो मैं उन साफ़ आदमियों को अपने पास रखूँ जो मेरी ताकत बनें। पानी मेरा हथियार बना। मैंने खुद को नहीं बदला, मैंने उन्हें बदला।"
"और मार डाला।"
"जो मेरी ताकत बनता है, वो मेरी ताकत है," भैरव ने कहा। "जिस दिन उसकी ताकत खत्म हो जाए, वो मेरे काम का नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर हँसी नहीं थी। कोई गर्व नहीं था। बस एक थकान।
"तेरे पापा," वो बोला, "तेरे पापा ने यही नहीं समझा। वो सोचते थे मिट्टी सबको बराबर बाँटनी चाहिए। मैंने उनसे कहा — रघुवीर, मिट्टी जिसके पैरों के नीचे हो, वो उसकी है। और उन्होंने कहा — नहीं, ये मिट्टी किसी की जागीर नहीं।" वो हँसा। "बीस साल बाद भी वही बोलते हैं। कुर्सी पर बैठकर भी।"
"तूने उन्हें कुर्सी पर बैठाया," मैंने कहा। "ये तेरा काम था।"
"ये मेरा सबसे बड़ा पछतावा है," भैरव ने कहा। "मैंने उन्हें पूरा पानी नहीं दिया। आधी खुराक दी। सोचा — ये टूट जाएगा, और मेरे पैरों में गिरेगा। पर वो नहीं टूटे। वो बस बैठ गए। और बैठे-बैठे बीस साल मेरी मिट्टी पर नज़र रखी।"
वो मेरे पास आया। उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "आज मैं तुझे एक बात बताऊँगा जो मैंने किसी को नहीं बताई। तू जानता है मैंने अपना नाम क्यों बदला?"
"क्यों?"
"क्योंकि भवानी सिंह नाम का आदमी एक बार अखाड़े में लड़ा था, और हार गया था। उसे रघुवीर सिंह ने पछाड़ा था।" उसकी आवाज़ काँपी। "और उस दिन भवानी सिंह को किसी ने नहीं पूछा — बेटा, कैसा है? भवानी सिंह की माँ को किसी ने नहीं कहा — तेरा बेटा भी लड़ा था। भवानी सिंह बाज़ार से गुज़रा तो लोगों ने कहा — वो देखो, जो रघुवीर से हारा।"
मैं चुप खड़ा रहा।
"तो मैंने नाम बदला," वो बोला। "और क़सम खाई — अब इस अखाड़े में जो भी पहलवान बनेगा, वो पहले मेरा नाम लेगा, फिर अपना। जो भी जीतेगा, उसकी जीत का पैसा मेरे हाथ से गुज़रेगा। और जिस दिन रघुवीर सिंह का बेटा अखाड़े में उतरेगा…" उसने मेरी तरफ़ देखा, "…उस दिन वो मेरे पानी से लड़ेगा, अपनी ताकत से नहीं।"
मैंने साँस ली। मेरे भीतर कुछ ठंडा था, पर अब वो ठंडक दर्द नहीं कर रही थी। वो साफ़ हो रही थी।
"तूने मुझे बुलाया," मैंने कहा। "ताकत दिखाने?"
"नहीं।" भैरव ने सिर हिलाया। "मैंने तुझे बुलाया क्योंकि तू वो आख़िरी आदमी है जो मेरी मिट्टी को समझ सकता है। और मैं तुझे एक सौदा देना चाहता हूँ।"
"सौदा?"
"तेरे पास दो चीज़ें हैं — तेरे पापा की लिखाई, और तेरी नाक। मेरे पास ताकत है, पैसा है, और बीस साल का सबूत।" उसने हाथ बढ़ाया। "मैं तुझे अखाड़े का मालिक बना दूँगा। रणवीर सिंह की कुर्सी तेरी। इस शर्त पर कि तू मेरा पानी नहीं छोड़ेगा। बस उसे साफ़ करेगा। तू मिट्टी जानता है — तू पानी को ऐसा बना सकता है जिसमें उम्र न खाए, सिर्फ़ ताकत दे।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। बीस साल का आदमी, इतनी बड़ी बात कह रहा था, और उसकी आवाज़ में गिड़गिड़ाहट थी।
"तूने ग्यारह लोग मारे," मैंने कहा। "अब बारहवें को मारने से पहले उससे मदद माँग रहा है?"
"ग्यारह नहीं," भैरव ने धीरे से कहा। "बारह। तेरे पापा तेरहवें थे, पर वो मरे नहीं।" उसने साँस ली। "और तू चौदहवाँ होगा, अगर तू मेरे साथ नहीं आया।"
मैं चुप रहा।
"सोच," उसने कहा। "माँ को चक्की से हटा। गुड़िया को स्कूल भेज। अपने लिए एक घर बना। बस एक शर्त।"
मैंने मिट्टी में हाथ डाला। ठंडी थी, पर उसमें वो हल्की गर्मी अब भी थी।
"मेरे पापा ने कहा था," मैंने धीरे से कहा, "कि अगर वो न रहें, तो उनका बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा। तू जानता है क्यों?"
भैरव ने सिर हिलाया।
"क्योंकि मिट्टी में डाला ज़हर पानी से दस गुना ज़हरीला होता है," मैंने कहा। "और मिट्टी में डाले ज़हर का इलाज मिट्टी में ही है।"
मैं उठा। भैरव के सामने खड़ा हो गया।
"मैं तेरा सौदा नहीं लूँगा," मैंने कहा। "पर मैं तुझे एक बात बताऊँगा। तेरी मिट्टी जिसकी थी, वो आज भी ज़िंदा है। और वो मुझसे बात कर रही है।"
भैरव रुक गया।
"वो मुझे बुला रही है," मैंने कहा। "और जिस दिन मैं उसमें लेटूँगा, उस दिन तेरा पानी कोई मायने नहीं रखेगा।"
भैरव की मुस्कान पहली बार पूरी तरह मिट गई।
"तू मेरे साथ नहीं आएगा?"
"नहीं।"
वो कुछ देर खड़ा रहा। फिर उसने अपना हाथ नीचे किया। "ठीक है।" वो बोला, और उसकी आवाज़ अब वैसी नहीं थी। "फिर तू वो रास्ता चुन रहा है जो तेरे पापा ने चुना था। और तुझे पता है उस रास्ते का अंत क्या होता है?"
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