Spirit of a Fighter – Chapter 170
"तीन," उसने कहा। "और तीन महीने से चौथी के डर से ज़िंदा हूँ। हर रोज़ लुट्टन आता है, गिलास लेकर। हर रोज़ मैं कहता हूँ — आज नहीं। हर रोज़ वो हँसता है और कहता है — कल फिर आऊँगा।" उसने सामने दीवार की तरफ़ देखा। "तीन महीने से मैं कल के डर से जी रहा हूँ।"
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी। फ्रेम टूटा हुआ, काँच में दरार। तस्वीर में दो जवान आदमी खड़े थे, अखाड़े की मिट्टी में, कमर तक नंगे, हाथों में हाथ डाले।
"ये कौन?" मैंने पूछा।
श्यामू ने देखा। बहुत देर तक देखा। उसका हाथ उठा, तस्वीर के काँच को छुआ, दरार पर उँगली रखी, जैसे घाव सहला रहा हो।
"ये मैं हूँ," वो बोला, बाईं तरफ़ की तरफ़ इशारा करके। "जवान। बीस साल पहले।" फिर उसकी उँगली दाईं तरफ़ की तरफ़ खिसकी, और वो रुक गया।
रुका, और रुका रहा।
"ये मेरा दोस्त।" उसकी आवाज़ बदल गई। "गोविंद।"
वो नाम बोलते वक़्त उसका गला भर आया। जैसे नाम बोलना भी भारी हो।
"चौथी पीकर मर गया," उसने कहा। "और उस दिन मैंने अपने हाथ से उसका गिलास भरा था। भैरव ने कहा था — श्यामू, तेरा दोस्त आज कमज़ोर लग रहा है, इसे दे। और मैंने दे दिया।" उसने आँखें बंद कर लीं। "मैंने दे दिया, वीर। उसने मुझ पर भरोसा किया, और मैंने उसे ज़हर पिला दिया।"
कमरे में सन्नाटा था। इतना कि मुझे अपना दिल सुनाई दे रहा था।
मैं उस तस्वीर को देख रहा था। गोविंद। उसकी आँखें। कुछ जानी-जानी सी थीं। कहाँ देखी थीं? कहाँ?
मैं उठा। तस्वीर के पास गया। काँच पर उँगली फेरी। उसकी आँखों की बनावट — थोड़ी झुकी हुई, गहरी — कहीं और देखी थी मैंने।
और तभी मुझे याद आया। पीले काग़ज़ पर, रघुवीर के हाथ की लिखाई में, कुछ नाम थे। मरे हुए पहलवानों की सूची थी। उनमें एक नाम था — गोविंद। और उसके आगे लिखा था — "रघुवीर का साथी।"
मेरा हाथ काँच पर रुक गया।
"ये गोविंद…" मैंने धीरे से कहा, "ये मेरे पापा का साथी था?"
श्यामू की आँखें खुलीं। उसने मुझे देखा, फिर तस्वीर को देखा, फिर मुझे।
"तू रघुवीर का बेटा है?"
"हाँ।"
उसने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। कुछ देर वो मुझे ऐसे देखता रहा जैसे मुझमें कोई और ढूँढ रहा हो।
"तो ये मिट्टी…" वो बोला, "ये मिट्टी तुझे अपने पास इसलिए बुला रही है।"
भैरव ने खाँसा। "बहुत हो गया।" वो अंदर आया। "वीर, बाहर आ। माँ तेरा इंतज़ार कर रही है।"
मैं बाहर आया। माँ की तरफ़ बढ़ा। भैरव ने हाथ उठाया, पर मैं नहीं रुका।
"रस्सी खोल," मैंने कहा।
"पहले मेरी बात सुन।"
"रस्सी खोल।"
भैरव ने मेरी आँखों में देखा। और शायद उसमें कुछ ऐसा दिखा जो उसने पहले नहीं देखा था, क्योंकि उसने रस्सी की गाँठ खोल दी।
माँ की कलाइयाँ लाल थीं। मैंने उन्हें पकड़ा, रगड़ा। माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"मैं ठीक हूँ," वो बोलीं। पहली बात यही कही। "तू ठीक है?"
"मैं ठीक हूँ, माँ।"
भैरव ने पीछे हटकर कहा, "मैंने उसे कुछ नहीं किया। बस बैठाया। मैं तो उससे बात करना चाहता था।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। और उनकी आवाज़ वैसी ही थी जैसे आँगन में चक्की रोककर बोलती थीं।
"तूने मुझसे बात कर ली," उन्होंने कहा। "अब मेरा बेटा तुझसे बात करेगा। और मैं सुनूँगी।"
भैरव मुस्कुराया। "ठीक है। पर एक बात पहले।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "श्यामू अंदर है। तीन खुराक उसके शरीर में हैं। जिस दिन वो चौथी पीता है, उस दिन तेरी माँ की तरह — जो उसे गिलास देगा — वो ही पहला शव होगा।"
मेरा हाथ माँ की कलाई पर कस गया।
"तू चाहता क्या है?"
"मैं चाहता हूँ कि तू रात को तहखाने से आए," भैरव ने कहा। "अकेला। मेरे साथ। और जो मैं कहूँ, सुन। बस सुन। अगर तूने सुना, तो तेरी माँ घर जाएगी। श्यामू घर जाएगा। और वो ग्यारह नाम जो तेरे पीले काग़ज़ पर लिखे हैं — वो कभी किसी के सामने नहीं आएँगे।"
"और अगर मैंने नहीं सुना?"
"तो मैं कुछ नहीं करूँगा," वो बोला। "मैं बस… तेरे अंदर वो बात डाल दूँगा जो बीस साल से मेरे अंदर है।" उसने मेरी छाती पर उँगली रखी। "शक। कि तेरे पापा भी उसी पानी से मरे थे, या उससे भी बुरी किसी चीज़ से।"
मैंने उसकी उँगली हटाई। "आज रात," मैंने कहा। "पर माँ और श्यामू अभी जाएँगे।"
"अभी?"
"अभी।" मैं उसकी आँखों में देख रहा था। "वरना मैं तेरी अलमारी की चाबी आज ही खोल दूँगा, और यकीन मान — मैं उसे उसी तरह खोलूँगा जैसे तूने कुएँ की सीढ़ियाँ तुड़वाईं। सबके सामने।"
भैरव की आँखें ठंडी हो गईं। बहुत ठंडी। फिर उसने हाथ हिलाया।
"जाओ," वो बोला। "दोनों।"
माँ ने जाते वक़्त मेरा कान पकड़कर धीरे कहा, "आधी रात तक लौट। वरना मैं सच में आऊँगी, और फिर तू मुझे नहीं रोक पाएगा।"
गुड़िया पड़ोस में थी। माँ और श्यामू को लेकर मैं बाहर निकला। श्यामू चल नहीं पा रहा था, मैंने उसका हाथ अपने कंधे पर रखा। उसका शरीर सूखा था, त्वचा में ढील, जैसे अंदर से खोखला हो गया हो।
रास्ते में उसने मुझसे कहा, "वीर, तू उसके पास मत जा।"
"मुझे जाना होगा।"
"वो तुझे अपनी बातों में ले लेगा। वो सबको ले लेता है।" उसकी आवाज़ रुकी। "मुझे भी लिया था। मैं उस वक़्त सत्रह का था, अखाड़े में नया-नया आया था। उसने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा — बेटा, तेरे अंदर ताकत है, बस उसे जगाना बाकी है। और मैंने गिलास पी लिया। पहली खुराक से मैंने तीन महीने में उस आदमी को पछाड़ दिया जिसे पछाड़ने के लिए मेरे पापा ने पूरी ज़िंदगी लगा दी थी।" उसने आँखों में पानी लाकर मेरी तरफ़ देखा। "और उस दिन मैंने सोचा — ये तो रब का पानी है।"
माँ चुप चल रही थीं। फिर बोलीं, "रब का पानी मिट्टी से आता है, बेटा। बोतल से नहीं।"
श्यामू रुक गया। उसने माँ की तरफ़ देखा। और फिर वो पहली बार रोया — सच में रोया, बच्चे की तरह, दोनों हाथों में मुँह छिपाकर। माँ ने उसका सिर सहलाया।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे भीतर कुछ कड़ा हो रहा था।
श्यामू को उसके घर छोड़कर मैं और माँ लौटे। घर पहुँचकर गुड़िया को लाया। वो मुझे देखकर दौड़ी और सीधे माँ से चिपक गई।
"माँ, तू ठीक है?"
"ठीक हूँ।" माँ ने उसका सिर सहलाया। "जा, पानी गरम कर। तेरे भैया को जाना है।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र में सवाल था, पर उसने कुछ नहीं पूछा। वो उठी और चूल्हे की तरफ़ चली गई।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। "श्यामू की बात सुन ली?"
"हाँ।"
"तो तू जानता है वो क्या करेगा? वो तुझे तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी दिखाएगा। और बोलेगा — देख, ये तेरे पापा की गलती थी।"
"माँ," मैंने कहा, "पापा की गलती क्या थी?"
माँ कुछ देर मेरे चेहरे को देखती रहीं। फिर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और दीवार पर टँगी टूटी घड़ी की तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने एक बार गोविंद को बचाया था," वो बोलीं। "गोविंद उस वक़्त अखाड़े का सबसे मज़बूत जवान था। उसने भैरव का पानी पीना शुरू किया था। तेरे पापा ने देखा, और उस रात वो गोविंद के घर गए और उसकी बोतल उठाकर दीवार पर पटक दी। गोविंद ने कहा — रघुवीर, तू मेरा दुश्मन हो गया है। और तेरे पापा ने कहा — हाँ, दुश्मन हूँ, क्योंकि तेरा भाई नहीं बन सकता।" माँ ने साँस ली। "फिर गोविंद ने दूसरे दिन फिर पी लिया। और तीन महीने बाद वो मर गया। तेरे पापा खुद उसका दाह-संस्कार करने ले गए थे। उस दिन वो घर लौटे और बोले — सरस्वती, मैंने उसे नहीं बचाया। मैंने उसे रोका था, बचाया नहीं।"
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