Spirit of a Fighter – Chapter 169
"भैया," वो रोई, "माँ को ले गए। और उन्होंने कहा — अगर तू अखाड़े में आया, तो तेरी माँ को ज़िंदा नहीं देखेगा।"
मैंने उसे उठाया और सीने से लगाया। उसका शरीर काँप रहा था।
और तभी मेरी जेब में कुछ चुभा — श्यामू का जला हुआ काग़ज़।
मैंने उसे निकाला और गुड़िया के सामने खोला।
"गुड़िया," मैंने कहा, "डर के मारे मत रो। ये काग़ज़ देख — ये भैरव की लिखाई है। ये सबूत है। और जिसके पास सबूत हो, वो कभी अकेला नहीं होता।"
वो रोते हुए मेरी तरफ़ देखने लगी।
"पर भैया, माँ…"
"माँ लौटेंगी।" मैंने कहा। "और जब लौटेंगी, तो उन्हें अपने बेटे पर गर्व होगा।"
मैंने वो काग़ज़ संभालकर रखा और घर के बाहर देखा। रास्ते पर लुट्टन खड़ा था, साँस फूलती हुई। उसके पीछे, दूर, धूल उड़ रही थी — कोई और आ रहा था।
"कौन है?" मैंने पूछा।
लुट्टन ने पीछे मुड़कर देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"वो…" वो हकलाया, "वो भैरव नहीं है। पर उससे भी बुरा है।"
"कौन?"
"हरनाम का आदमी।" उसने कहा। "और उसके साथ… उसके साथ वो लंगड़ा है जो शीशी लेकर तेरी माँ के पास गया था।"
मैंने गुड़िया का हाथ कसकर पकड़ा और आँगन के बीच खड़ा हो गया।
धूल के बीच से दो आकृतियाँ निकलीं — एक लंबा, दुबला, चश्मे वाला, और दूसरा वो लंगड़ा, जिसकी आँखों में वो अजीब सी शर्म थी जो मैंने गुड़िया की बात में सुनी थी।
लंगड़ा आगे आया। उसके हाथ में एक पर्ची थी।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "भैरव सर ने कहा है — तू अखाड़े में आ, अपनी माँ को ले जा। पर आना अकेले। और वो काग़ज़ लेकर आना जो श्यामू ने तुझे दिया।"
मैंने पर्ची उसके हाथ से ली। उस पर भैरव की लिखाई थी:
"तेरी माँ मेरे पास है।
"तेरी माँ मेरे पास है।
और मैं तुझे वो चीज़ दिखाना चाहता हूँ जो तूने कभी नहीं देखी। रात ढलने से पहले आ। वरना सुबह तेरी माँ की अर्थी उठेगी, और तू अखाड़े का नाम लेता रह जाएगा।"
मैंने पर्ची पढ़ी, दो बार पढ़ी। मेरे हाथ नहीं काँप रहे थे — यही सबसे डरावनी बात थी। पहले जब भी माँ का नाम आता था, मेरी उँगलियाँ काँपने लगती थीं। आज नहीं। आज मेरे अंदर कुछ मर गया था, और उस मरे हुए की जगह एक और चीज़ बैठ गई थी — सिर्फ़ ठंडा गुस्सा।
लंगड़ा मेरी तरफ़ देख रहा था, होंठ काँपते हुए। वो कुछ कहना चाहता था, पर रुक रहा था। मैंने पूछा, "तूने मेरी माँ को छुआ?"
उसने गर्दन हिलाई। "मैंने… मैंने सिर्फ़ शीशी दी थी। बस शीशी। मुझे नहीं पता था वो—"
"तुझे नहीं पता था?" मैं उसके पास गया। "तू शीशी देने आया था, और तुझे नहीं पता था? तेरे हाथ में वो शीशी थी जो मेरे पिता को मार गई। तू पानी बेचने वाला है, या जान बेचने वाला?"
वो पीछे हटा। उसका लंगड़ापन अब और बड़ा लग रहा था, जैसे डर ने उसे और झुका दिया हो।
लंबे आदमी ने कदम बढ़ाया। "वीर सिंह, गुस्सा मत कर। भैरव सर ने हमें सिर्फ़ पहुँचाने को कहा है। हम तो डाक हैं। चिट्ठी फेंककर चले जाते हैं।"
"डाक?" मैं हँसा। "तू डाक है? तो तेरी चिट्ठी तेरे साथ लौटेगी।" मैंने पर्ची उसके मुँह पर फेंक दी। "जा, भैरव को बोल — वीर सिंह ने कहा, अखाड़े का दरवाज़ा आज रात खुला रख। मैं अकेला आऊँगा, पर ये काग़ज़ लेकर नहीं आऊँगा। तेरे हाथ में दे जाऊँगा।"
लंबा आदमी थोड़ा रुका। फिर मुस्कुराया — वो मुस्कान जो ऊपर के होंठ पर आती है, आँखों तक नहीं पहुँचती। "हिम्मत तो है," वो बोला। "पर सुन। भैरव सर ने एक और बात कही थी। बोलने को नहीं कहा था, पर बता दूँ — तेरी माँ ने उनसे एक बात कही थी।"
मेरे पेट में झटका लगा। "क्या?"
"उसने कहा — 'मेरे बेटे को बता देना, मैंने उसे ईंट ढोने के लिए नहीं पाला।'"
वो दोनों मुड़े और धूल में गायब हो गए। मैं वहीं खड़ा रहा।
माँ। उस वक़्त, उस कमरे में, भैरव के सामने, उसने यही कहा होगा। डरकर नहीं। रोकर नहीं। वैसे ही जैसे वो मुझे छोटी उम्र में बोलती थी जब मैं स्कूल से भाग आता था।
गुड़िया ने मेरी कमर पकड़ ली। "भैया, माँ ने वो कहा?"
मैंने उसका सिर सहलाया। मेरा गला भरा हुआ था, पर आवाज़ साफ़ रखी। "हाँ। और अब मैं भी कहूँगा।"
लुट्टन ने धीरे से कहा, "वीर, ये जाल है। वो चाहता है तू अकेले आए।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर जाल में भी तो जाना पड़ता है। कभी-कभी मछली जाल को खींच ले जाती है।"
रात ढल गई। गुड़िया को पड़ोस की काकी के यहाँ छोड़ा। जाते वक़्त वो मेरी उँगली पकड़कर बोली — "भैया, माँ को लेकर आना। और अपनी भी आना।"
अखाड़े का दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा। मिट्टी की गंध, और उसके नीचे वही कड़वाहट।
बीच में भैरव बैठा था। उसके पीछे,रस्सी से बँधी माँ।
मैंने एक कदम बढ़ाया — और तभी मैंने अपने पैरों के नीचे कुछ महसूस किया। मैंने झुका। मेरे हाथ में एक टूटी शीशी की फुटकी आई — वही हरी फुटकी जो कल मेरी माँ के शरीर से चिपकी थी।
और तभी अखाड़े की सबसे दूर कोठरी से एक आवाज़ आई — धीमी, टूटी, जैसे बहुत दूर से कोई रो रहा हो।
वो श्यामू की आवाज़ थी। वो यहाँ था।
भैरव मुस्कुराया और बोला, "देखा? मैंने तुझे बोला था न — मैं तुझे वो चीज़ दिखाऊँगा जो तूने कभी नहीं देखी।"
॥
मैं उस मुस्कान को देख रहा था, और मेरे भीतर कुछ ऐसा जाग रहा था जो ठंडा था। माँ पीछे बँधी थीं, आँखें खुली, होंठ हिल रहे थे — कुछ कह रही थीं, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। जैसे रस्सी ने उनका गला भी बाँध दिया हो।
"तूने मुझे बहुत कुछ दिखाया," मैंने कहा। "अब मैं तुझे कुछ दिखाऊँगा।"
भैरव हँसा। वो हँसी अखाड़े की दीवारों से टकराकर लौटी और मेरे कानों में बैठ गई।
मैं श्यामू की तरफ़ बढ़ा। कोठरी का दरवाज़ा लोहे का था, बाहर से कुंडी लगी थी। मैंने कुंडी खींची तो वो चरमराई, जैसे सालों से कोई नहीं खोली हो।
श्यामू अंदर कोने में बैठा था। घुटने सीने से चिपके, दोनों हाथों में एक कटोरी पकड़े — खाली कटोरी। उसकी आँखें मुझे देखकर भी नहीं देख रही थीं। जैसे वो कहीं और था, किसी पुराने कमरे में।
"श्यामू भाई," मैंने धीरे से कहा। घुटने के पास बैठ गया।
उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर रो नहीं रहा था — बस भीगी थीं।
"तू आ गया," वो बोला। "मैंने सोचा था कोई नहीं आएगा।"
"मैं आ गया।" मैंने उसका कटोरा लिया और किनारे रख दिया। "माँ बाहर बँधी हैं। तेरे साथ ये सब क्यों किया?"
उसने कुछ नहीं कहा। उसकी उँगलियाँ ज़मीन पर चलने लगीं, जैसे कोई गिनती कर रहा हो। फिर वो रुका।
"वीर," वो बोला, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे झुकना पड़ा। "तू मुझसे एक बात पूछ।"
"क्या?"
"पूछ — मैं अभी ज़िंदा क्यों हूँ?"
मैं चुप हो गया। और उसी चुप्पी में भैरव की आवाज़ आई — "क्योंकि उसने चौथी नहीं पी।"
मैं पलटा। भैरव दरवाज़े के पास खड़ा था, कंधे से टेक लगाए, मूँछों में हँसी।
"तीन खुराक," वो बोला। "तीसरी के बाद लोग मेरे पास आते हैं, हाथ जोड़ते हैं, कहते हैं — सर, और दीजिए। ताकत का नशा पानी के नशे से बड़ा होता है, वीर।" उसने उँगली उठाई। "पर चौथी नहीं। चौथी वो गिलास है जिसके बाद आदमी खुद नहीं उठता।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। मैंने श्यामू की तरफ़ देखा।
"तीन पी हैं तूने?"
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