Spirit of a Fighter – Chapter 168
"मेरे पास एक चीज़ है।" उसने कहा। और फिर बहुत देर तक चुप रहा। इतनी देर कि मुझे लगा वो सो गया। फिर उसने अपनी उस मुड़ी हुई उँगली से बिस्तर के नीचे इशारा किया। "वहाँ। ईंट के नीचे।"
मैंने बिस्तर के नीचे हाथ डाला। उँगलियों को एक ईंट मिली, जो ढीली थी। मैंने उसे उठाया। नीचे एक छोटी सी पोटली थी — जली हुई, आधी, पर बची हुई।
मैंने उसे खोला। अंदर एक काग़ज़ का आधा टुकड़ा था। उस पर उँगली का निशान था और नीचे भैरव की लिखाई — "श्यामू, खुराक तीसरी, तारीख़…"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"ये तो…"
"हाँ।" श्यामू ने कहा। "मैंने आधा जलने से बचा लिया। क्योंकि मुझे लगा था कि एक दिन कोई आएगा जो इसकी कीमत समझेगा। भैरव को लगा कि लक्ष्मी ने सब जला दिया। पर लक्ष्मी ने आधा बचा लिया और मुझे दे दिया।" उसकी आवाज़ रुँध गई। "मेरी बीवी… मेरी बीवी मुझसे ज़्यादा समझदार है।"
तभी बाहर से चाय की गंध आई। लक्ष्मी लोटा लेकर अंदर आई, पर इस बार उसके हाथ नहीं काँप रहे थे। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में वो जला हुआ काग़ज़ देखा।
"तुमने उसे दिखा दिया?" उसने श्यामू से पूछा। गुस्से में नहीं, थकान में।
"वो जगदीश का बेटा है, लक्ष्मी।"
लक्ष्मी ने लोटा रख दिया। फिर मेरे सामने बैठ गई। "तो तुम वो हो," उसने कहा। "जिसके लिए मेरा आदमी इतने दिन चुप रहा। जिसके लिए उसने खुद को इस हाल में पहुँचाया।"
मैं चुप रहा।
"एक बात बताओ," उसने कहा। "तुम उसे बचा सकते हो?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मैं नहीं जानता।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली — "अच्छा है। जो झूठ नहीं बोलता, वही सच लाता है।"
मैंने वो काग़ज़ सावधानी से मोड़कर अपनी जेब में रखा। फिर उठा। "श्यामू भाई, मैं जा रहा हूँ। पर मैं वादा करता हूँ — जो तुमने मुझे दिया, वो बेकार नहीं जाएगा।"
श्यामू ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें एक ज़िद थी।
"एक बात बताऊँ?" उसने फुसफुसाया। "भैरव का पानी… वो ताकत नहीं देता। वो उधार देता है। और उधार वसूलने वो खुद आता है।"
वो काँपने लगा। उसकी आँखें बाहर की तरफ़ उठीं, दरवाज़े की तरफ़, जहाँ बोरी लटकी थी। उसकी साँस तेज़ हो गई। "देखो," वो फुसफुसाया, "वो आ रहा है।"
मैंने बाहर देखा। रास्ते पर धूल उठ रही थी। एक बैलगाड़ी आ रही थी, उस पर लाल धोती वाला कोई।
पर वो भैरव नहीं था।
वो लुट्टन था।
और उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था, जिस पर मैंने दूर से ही देखा — भैरव की मुहर।
लुट्टन बैलगाड़ी से उतरा, पर उसकी चाल में वो रोब नहीं था। वो झोपड़ी की तरफ़ आया, और जब मेरी नज़र उसकी आँखों से मिली, तो वो रुक गया।
"तुम?" उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी।
"मैं।" मैंने कहा। "तू यहाँ क्या करने आया है?"
उसने डिब्बा अपने सीने से लगा लिया। "मैं… मैं दवा लाया हूँ। भैरव सर ने भेजा है।"
"कौन सी दवा?"
"मुझे नहीं पता।" उसने कहा। "बस इतना कहा है कि श्यामू को दे दूँ और बदले में…" वो रुक गया।
"बदले में क्या?"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने उस दिन अखाड़े में देखा था — जब उसने कबूल किया था कि उसने ज़हर पिया है।
"बदले में," उसने धीरे से कहा, "श्यामू को एक काग़ज़ पर उँगली का निशान लगाना है। जिस पर लिखा है कि उसने खुद पानी पिया और उसकी हालत के लिए भैरव सर ज़िम्मेदार नहीं हैं।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। "लुट्टन, तू खुद जानता है कि वो पानी क्या है। तूने खुद पिया है।"
लुट्टन का चेहरा बिगड़ गया। "मुझे पता है।" उसकी आवाज़ टूटी। "पर मेरे पास कोई रास्ता नहीं है। मेरी बहन बीमार है। भैरव सर ने कहा है कि अगर मैं ये काम कर दूँ, तो वो उसका इलाज करवाएँगे।"
"वो झूठ बोल रहा है।"
"मुझे पता है!" लुट्टन चिल्लाया। फिर उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। "मुझे पता है, वीर। पर मैं क्या करूँ? जब कोई तुम्हारे सामने एक डोर लटका दे और कहे — ये पकड़, तो तुम पकड़ते हो। भले ही डोर ज़हरीला हो।"
वो वहीं बैठ गया। डिब्बा उसके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिरा और खुल गया। अंदर एक शीशी थी, जिसमें हरा पानी था — वही रंग, वही गंध।
मैंने शीशी उठाई और सूँघा। वही कड़वाहट। पर इसके नीचे कुछ और भी था — मीरा की दवा की गंध। सोंठ, काली मिर्च, और कुछ जो मैं नहीं पहचान पाया।
"लुट्टन," मैंने कहा, "ये दवा नहीं है। ये वही ज़हर है, बस इसमें कुछ मिलाया गया है ताकि इसे दवा जैसा दिखाया जा सके।"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया।
"तो मेरी बहन…"
"तेरी बहन को ये नहीं चाहिए।" मैंने कहा। "उसे सच्ची दवा चाहिए। और सच्ची दवा मीरा के पास है।"
लुट्टन कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर उसने अपना सिर उठाया और बोला — "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।"
"क्या?"
"मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।" उसने दोहराया। "मैं भैरव के खिलाफ गवाही दूँगा। मैं सब बताऊँगा — कौन कौन पानी पीता है, कब पीता है, कहाँ बनता है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बस मेरी बहन को बचा लो।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे उठाया। "तेरी बहन को कुछ नहीं होगा। पर पहले हमें श्यामू को बचाना है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। लक्ष्मी दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखों में पानी, पर होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान।
"तुम वो हो," उसने धीरे से कहा, "जिसका इंतज़ार मेरे आदमी ने बीस साल से किया था।"
मैंने श्यामू की तरफ़ देखा। वो बिस्तर पर लेटा था, आँखें बंद, साँस धीमी। पर उसके होंठ हिल रहे थे — कुछ फुसफुसा रहा था।
मैं झुककर उसके पास गया।
"जगदीश…" वो फुसफुसा रहा था। "जगदीश, तेरा बेटा आ गया।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसका माथा छुआ। "श्यामू भाई, मैं जा रहा हूँ। पर मैं लौटूँगा। सच्ची दवा लेकर।"
वो मुस्कुराया। "मुझे पता है।" उसने कहा। "तेरी आँखों में वो बात है जो रघुवीर की आँखों में थी। वो भी ऐसे ही मुस्कुराता था जब झूठ बोलता था।"
मैं हँसा। पहली बार कई दिनों में हँसा।
बाहर निकलकर मैंने लुट्टन की तरफ़ देखा, जो अब भी वहीं खड़ा था, डिब्बा हाथ में लिए। "चल," मैंने कहा। "पहले मीरा के पास।"
हम नहर की तरफ़ चल पड़े। रास्ते में लुट्टन चुप था। फिर बोला — "वीर, एक बात बताऊँ?"
"बोल।"
"भैरव ने आज सुबह कुछ और भी भेजा है। तीन आदमी। वो तेरी माँ के घर की तरफ़ गए हैं।"
मैं रुक गया।
"कब?"
"जब मैं निकल रहा था। लगभग एक घंटे पहले।"
मेरे हाथ से शीशी फिसल गई और ज़मीन पर गिरकर टूट गई। हरा पानी मिट्टी में फैल गया, और उसके साथ एक अजीब सी गंध उठी — जली हुई दवा की, और उसके नीचे धतूरे की।
मैंने लुट्टन की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"वीर, मैंने सोचा तुझे पता होगा—"
मैं भागा। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। मेरे कानों में सिर्फ़ अपनी साँस की आवाज़ थी, और माँ की वो बात — "तीन रात में लौट आ, वरना मैं खुद अंदर आऊँगी।"
मैंने तीन रात नहीं लिए। मैंने एक घंटा भी नहीं लिया।
और घर पहुँचकर जो देखा, वो मेरे पैरों तले ज़मीन खींच ले गया।
आँगन में चक्की टूटी पड़ी थी। दरवाज़े पर कोयले से लिखा था — "अब बारी तेरी माँ की।"
और माँ वहाँ नहीं थीं।
गुड़िया दरवाज़े के पीछे दुबकी बैठी थी, हाथ में रोटी का टुकड़ा, आँखों में वो डर जो मैंने कभी नहीं देखा था। वो मेरी तरफ़ देखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
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