Spirit of a Fighter167 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 167

6 min read November 5, 2026

मैं नहर पार करके आगे बढ़ा। रास्ते में सूखी घास और टूटी ईंटें थीं। दूर एक झोपड़ी दिखी — टूटी छप्पर, झुकी हुई दीवार, दरवाज़े की जगह बोरी लटकी हुई। सामने सूखा हुआ कुआँ और एक पुरानी चारपाई।

मैंने बोरी हटाई और अंदर झाँका।

अंधेरा था, पर मेरी आँखों को रोशनी की ज़रूरत नहीं थी। गंध ने मुझे रास्ता दिखा दिया। कोने में एक बिस्तर पर कोई लेटा था। हड्डियाँ निकली हुईं, चेहरा इतना दुबला कि आँखें गड्ढों में धँसी लग रही थीं, होंठ सूखे और फटे हुए। साँस चल रही थी, पर ऐसे जैसे हर साँस के लिए उसे मोल भरना पड़ता हो।

मैं उसके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखें धीरे से खुलीं। पहले डर, फिर पहचानने की कोशिश, फिर थकान।

"पानी," उसने फुसफुसाया।

मैंने उसके सिरहाने रखा लोटा उठाया और उसके होंठों से लगाया। वो दो घूँट पीकर रुक गया, जैसे पानी भी उसके शरीर में जगह नहीं पा रहा हो।

"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा, जैसे सोच रहा हो कि बताऊँ या नहीं। फिर बोला — "श्यामू।"

"श्यामू भाई," मैंने उसका हाथ पकड़ा। हाथ ठंडा था, नसें उभरी हुईं। "तुमने भैरव सर का पानी पिया था, है ना?"

श्यामू की आँखों में पहले डर आया। फिर पानी। और फिर उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, जैसे शर्म से।

"मैंने पिया," उसने धीरे से कहा। "और अब…"

वो चुप हो गया। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने अपनी उँगलियों से बिस्तर की चादर मुट्ठी में भर ली, इतनी ज़ोर से कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं। मैंने उसके हाथ को देखा — उँगलियाँ अजीब तरह से मुड़ी हुई थीं, जैसे कोई पुरानी चोट हो जो कभी ठीक न हुई हो।

"कितनी खुराक?" मैंने पूछा।

"तीन।" उसने कहा। "पहली के बाद मैंने अखाड़े में सबको पछाड़ा। दूसरी के बाद मुझे लगा मैं कभी नहीं हारूँगा। तीसरी के बाद…" उसकी आवाज़ रुक गई। "तीसरी के बाद मैंने अपना नाम भूलना शुरू किया।"

मेरा सीना भर आया।

"श्यामू भाई, तुम्हारा कोई परिवार है?"

उसने आँखें बंद कर लीं। "बीवी है। लक्ष्मी। वो रोज़ सुबह जाती है, किसी के घर बर्तन माँजने। और शाम को लौटकर मुझे खिलाती है।" उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हिचकी आई। "मैं उसे नहीं बता सकता कि मैं उसके बिना मर जाऊँगा।"

तभी बाहर पैरों की आहट आई। श्यामू का शरीर एक झटके में सख़्त हो गया। उसने अपना चेहरा दीवार की तरफ़ घुमा लिया, जैसे बच्चा छिपता है।

बोरी हटी और एक औरत अंदर आई — दुबली, सूखे हाथों में पानी का लोटा, सिर पर पुरानी साड़ी का छोर। मुझे देखते ही वो रुक गई, लोटा उसके हाथ से थोड़ा ढुलक गया।

"तुम कौन हो?" उसकी आवाज़ में डर था। "उसे कोई नहीं मिलता। भैरव सर ने मना किया है कि कोई उससे बात न करे।"

मैं उठ खड़ा हुआ। "मैं कोई नहीं हूँ, बस एक पहलवान।"

"पहलवान?" उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा। "तुम तो भूखे लगते हो। तुम्हारे पास क्या है जो भैरव सर के पास नहीं है?"

मैं चुप रहा। सच कहता तो क्या कहता? कि मेरे पास सिर्फ़ अपनी नाक है और एक टूटी हुई घड़ी है जो अभी चलती नहीं?

पर श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोला — "लक्ष्मी, ये वही है। जिसके बारे में अखाड़े में सब बात करते हैं। जो भैरव का पानी नहीं पीता।"

लक्ष्मी का लोटा अब भी काँप रहा था, पर उसने उसे ज़मीन पर रख दिया। फिर मेरी तरफ़ देखकर बोली — "तो तुम वो हो। जिसने लुट्टन को सबके सामने हराया।" उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "इस घर में उसकी एक ही इच्छा बची है — भैरव के पानी से जो बीमारी आई है, उसका इलाज मिल जाए।"

"इलाज है?" मैंने पूछा।

"मीरा मैडम आती थीं।" लक्ष्मी ने कहा। "वो कहती थीं कि ये ज़हर नहीं, उम्र का उधार है। और उधार चुकाना पड़ता है।" उसने श्यामू की तरफ़ देखा, आँखों में पानी था पर आवाज़ सख़्त थी। "पर वो उधार चुकाने के लिए पैसा चाहिए। और भैरव सर कहते हैं कि पैसा तभी मिलेगा जब मेरा आदमी चुप रहेगा।"

श्यामू ने अपना चेहरा दीवार से हटाया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वो रो नहीं रहा था। वो बस अपनी बीवी को देख रहा था, और उसकी नज़र में वो शर्म थी जो आदमी को सबसे ज़्यादा तोड़ती है — अपनी ही बीवी के सामने इस हाल में बैठने की शर्म।

"लक्ष्मी," उसने धीरे से कहा, "मुझे चाय चाहिए।"

वो समझ गई। ये उसका बहाना था — मुझसे अकेले बात करने का। वो बाहर चली गई, पर जाते वक़्त मेरी तरफ़ देखकर बोली — "ज़्यादा देर मत करना। उसे ज़्यादा बोलने से साँस फूलती है।"

जब वो गई, मैं वापस श्यामू के पास बैठ गया।

"श्यामू भाई," मैंने धीरे से कहा, "मुझे बताओ — भैरव का पानी असल में क्या है?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर बहुत धीरे से, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ बोल रहा हो, कहा — "वो ताकत नहीं देता। वो उधार देता है।"

मैं रुक गया। "मतलब?"

"शुरू में लगता है जैसे अंदर आग जल गई। हाथ हल्के, पैर तेज़, हर कुश्ती में जीत। पर फिर एक दिन तू अपनी बीवी की आवाज़ सुनता है और उसका नाम याद नहीं आता। फिर तेरी उँगलियाँ मुड़ने लगती हैं। फिर तेरी पीठ में ऐसा दर्द उठता है जैसे कोई अंदर से रस्सी खींच रहा हो।" उसने अपनी उँगली उठाई, जो मुड़ी हुई थी। "देखो। मैंने ये उँगली कभी नहीं तोड़ी। ये खुद मुड़ गई।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

"और जो उधार लेता है," श्यामू ने धीरे से कहा, "उससे वसूलने वाला खुद आता है। भैरव खुद आता है। वो आता है और कहता है — बेटा, तेरा हिसाब बाकी है। और तेरे पास चुकाने को कुछ नहीं होता। फिर वो तुझसे एक चीज़ माँगता है जो तेरे पास है — तेरी चुप्पी।"

"और अगर कोई चुप न रहे?"

श्यामू हँसा। पर वो हँसी नहीं थी, खाँसी थी। "तो उसका काम तमाम। जैसे जगदीश का हुआ। जैसे रघुवीर का हुआ।"

मैंने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। "तुम जगदीश को जानते थे?"

श्यामू की आँखें फैल गईं। "तुम… तुम जगदीश के बेटे हो?"

मैंने सिर हिलाया।

श्यामू ने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ाया और अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। उसके कंधे हिलने लगे। "हे भगवान," वो फुसफुसाया। "मैंने उस आदमी के बेटे से क्या कह दिया।"

"कुछ ऐसा नहीं कहा जो मुझे न पता हो।" मैंने कहा।

वो धीरे से हाथ नीचे करके मेरी तरफ़ देखने लगा। "तू उसके जैसा दिखता नहीं। वो मोटा था, तगड़ा। तू तो…" वो रुक गया।

"भूखा हूँ।" मैंने कहा। "पता है।"

"नहीं," उसने कहा। "तू उसके जैसा इसलिए नहीं दिखता क्योंकि तेरी आँखों में वो डर नहीं है जो उसकी आँखों में था। वो डरता था, वीर। वो भैरव से डरता था। और डरने वाला आदमी कभी नहीं जीतता।"

मैं चुप बैठा रहा। उसकी बात मेरे अंदर उतर रही थी।

"श्यामू भाई, मुझे एक बात बताओ।" मैंने कहा। "जब तुमने भैरव का पानी पिया, तो क्या उसने तुम्हें कुछ और भी दिया था? कोई काग़ज़? कोई वादा?"

श्यामू ने धीरे से सिर हिलाया। "एक काग़ज़। जिस पर लिखा था कि मैंने अपनी मर्ज़ी से पानी पिया और मेरी बीमारी का ज़िम्मा कोई नहीं लेता। मैंने उँगली का निशान लगा दिया। बिना पढ़े।"

"वो काग़ज़ कहाँ है?"

"लक्ष्मी ने जला दिया।" उसने कहा। "जिस दिन मैं बिस्तर से उठ नहीं पाया उस दिन उसने चूल्हे में डाल दिया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तो तुम्हारे पास कुछ नहीं है।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho