Spirit of a Fighter166 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 166

7 min read November 5, 2026

गुड़िया। जो पूरी रात टिंकू के सिरहाने बैठी रही, जिसने उसका माथा सहलाया, जिसकी आवाज़ में मैंने चिंता सुनी थी। और अभी वो भाग रही थी।

मैं बाहर निकला। गली खाली थी। सिर्फ़ दूर, मोड़ पर, उसकी साड़ी का एक झलक, जो पल भर में गायब हो गया।

टिंकू की दुकान की तरफ़, या भैरव के अखाड़े की तरफ़?

मैं खड़ा सोच रहा था कि तभी मुझे टिंकू याद आया। वो अंदर था। अकेला नहीं — पर उसके पास कोई नहीं था। जो उसके सिरहाने बैठी थी, वो भाग गई।

मैं सीधा टिंकू की तरफ़ लपका। मिट्टी गीली थी, पैर फिसले, पर मैं रुका नहीं। दुकान का शटर आधा खुला था। अंदर अंधेरा। घी जला हुआ बू आ रही थी।

मैं अंदर घुसा। टिंकू कोने में, चूल्हे के पास बैठा था। हाथ में लकड़ी का चमचा, आँखों में पानी। पर रो नहीं रहा था। होंठ खींचकर हँसने की कोशिश कर रहा था।

"भाई," वो बोला, "मिठाई जल गई। आज खीर नहीं मिलेगी।"

मेरा गला रुँध गया। मैंने उसे उठाकर गले लगा लिया। उसका शरीर ठंडा था, काँप रहा था। और तभी मेरी नज़र उसकी कलाई पर पड़ी। अंगूठे के निशान। कोई ज़ोर से पकड़कर खींचा था।

"किसने?" मैंने कलाई पकड़ी। "टिंकू, किसने?"

वो चुप रहा। फिर बोला — "दो आदमी आए थे। बोले — अखाड़े से दूर रह, वरना अगली बार दुकान नहीं, हड्डियाँ जलेंगी।"

मैंने उसकी कलाई अपनी नाक के पास लाई। सूँघा। और मेरे पेट में आग जल उठी।

वही कड़वी गंध। वही जो भैरव के पानी में थी। जो उस बुढ़िया की चाय में थी।

"वो दोनों कैसे दिखते थे?"

"एक लंगड़ा था, भाई।" टिंकू ने धीरे से कहा। "और दूसरा… दूसरा वो था जो सुबह हमारे घर के बाहर खड़ा था।"

मेरा दिल धक् से रह गया।

"कौन—"

"पता नहीं। पर उसने मुझे देखकर मुस्कुराया था। ऐसे, जैसे मुझे पहले से जानता हो।"

मैं उठ खड़ा हुआ। गुस्सा सातवें आसमान पर था। मैं सीधे अखाड़े की तरफ़ मुड़ा। पर टिंकू ने मेरी कमर में हाथ डालकर रोक लिया।

"भाई, रुक।"

"हट, टिंकू।"

"मैं ज़िंदा हूँ।" उसने मेरी आँखों में देखा। "बस इतना काफ़ी है।"

मैंने उसके हाथ से चमचा खींचा और ज़मीन पर पटक दिया। चमचा टूटकर दो टुकड़े हो गया।

"आज से तू दुकान बंद कर दे।" मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैं रुका नहीं। "अब ये लड़ाई मेरी है। और मैं इसे अकेले लड़ूँगा।"

टिंकू ने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर तक। फिर धीरे से बोला — "भाई, तू अकेला लड़ेगा तो हार जाएगा। ये बात मैंने तेरी आँखों में देखी है।"

॥

टिंकू की बात मेरे सीने में तीर की तरह लगी। मैं रुक गया। मेरी मुट्ठियाँ अब भी कसी थीं, पर उसकी आवाज़ में जो सच था, वो मेरे गुस्से से भारी था।

मैं वापस उसके पास बैठ गया। चूल्हे की जली हुई घी की गंध अब भी उठ रही थी, और उसके बीच टिंकू का चेहरा पीला पड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराने की कोशिश की, पर होंठ काँप गए।

"भाई, एक बात पूछूँ?" उसने धीरे से कहा। "जब तू अकेले लड़ेगा और गिर जाएगा, तो मैं किसके लिए खीर बनाऊँगा?"

मेरा गला भर आया। मैंने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। वो कुछ देर चुप बैठा रहा, फिर बोला — "मेरे हाथ जल गए हैं, पर ज़ुबान नहीं जली। सोच सकता हूँ।"

"तो सोच।" मैंने कहा। "मैं भी सोचता हूँ।"

हम दोनों वहीं चूल्हे के पास बैठ गए। जली हुई लकड़ी की गंध, टिंकू की जली हुई उँगलियों की गंध, और बाहर से आती गीली मिट्टी की गंध — तीनों मिलकर मेरे दिमाग़ में एक ही बात ठोक रही थीं: भैरव के पास पुलिस है, अखाड़े की चाबी है, और वो तीन रात में तहखाने की मिट्टी उठा लेगा।

"टिंकू," मैंने कहा, "हम उससे सीधे नहीं लड़ सकते। वो हमारे हर रास्ते पर पहले से खड़ा है।"

"तो रास्ता बदल दे।" उसने कहा। "जिस रास्ते से वो नहीं आता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो जली हुई उँगली से ज़मीन पर कुछ खींच रहा था। मैंने झुककर देखा — एक आदमी का आकार, और उसके चारों तरफ़ छोटे-छोटे गोले।

"ये क्या है?"

"भैरव।" उसने कहा। "और ये गोले — उसके आदमी।" फिर उसने एक गोले पर उँगली रखी और मिटा दिया। "पर भाई, इस गोले में लुट्टन है। और लुट्टन ने आज सबके सामने कबूल किया कि उसने ज़हर पिया है। ज़हर पीने वाला भैरव का रहता है क्या? वो तो उसका डरा हुआ गुलाम है।"

मेरे दिमाग़ में एक चिंगारी जली।

"टिंकू," मैंने उसका कंधा पकड़ा, "तू जीनियस है।"

"पता है।" उसने कहा। "पर खीर बनाने में ज़्यादा।"

मैंने उसे उठाया और उसके घर ले चला। रास्ते में सोचता रहा। भैरव के चार गोले हैं — लुट्टन, जो डरा हुआ है। हरनाम, जो अपनी कॉपी हमें दे चुका है। हरनाम का आदमी, जो रोज़ गुड़-अदरक वाली चाय पीता है, वो तो बातचीत से ही टूट जाएगा। और चौथा — लज्जो। भांजी। वो सबसे ख़तरनाक है, क्योंकि वो भैरव से डरती नहीं, प्यार करती है।

टिंकू को उसकी माँ के हवाले करके मैं घर लौटा। माँ ने गुड़िया के भागने की बात सुनी तो चूल्हे के पास खड़ी रह गईं, हाथ में लोटा पकड़े हुए। फिर उन्होंने लोटा रखा और बोलीं — "वो बच्ची डर के मारे भागी है। डरा हुआ आदमी कभी भैरव के पास नहीं जाता। वो कहीं छिपी है।"

माँ सही थीं। गुड़िया रात को लौट आई, आँगन की मुंडेर के पीछे दुबकी हुई, साड़ी में मिट्टी और आँखों में सूजन। मैंने उसे देखा तो गुस्सा आया, पर माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली — "पहले सुन।"

वो काँप रही थी। "भैया, वो लंगड़ा आदमी… वो मुझे रास्ते में मिला। बोला — तेरे भैया की माँ को कुछ नहीं होगा, अगर तू चुपचाप ये शीशी उनके पानी में डाल दे।"

"और तूने?" मेरी आवाज़ सख़्त थी।

"मैंने शीशी फेंक दी।" उसने रोते हुए कहा। "नहर में। और भागी। पर भैया, एक बात बोलूँ?"

"बोल।"

"वो लंगड़ा… वो रो रहा था। जब मैंने शीशी फेंकी, तो वो बैठ गया और अपना सिर हाथों में पकड़ लिया। बोला — 'मैं मजबूर हूँ। मेरा बेटा भी उसी बीमारी में है।'"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक आई जो सिर्फ़ तब आती थी जब कोई सच उनके सामने खुल रहा होता था।

"वो लंगड़ा," माँ ने धीरे से कहा, "हरनाम का आदमी है। जिसे तूने चाय वाला बताया था।"

"पर वो भैरव के लिए काम क्यों कर रहा है?"

"क्योंकि उसका बेटा बीमार है," माँ ने कहा, "और भैरव के पास दवा है। या कम से कम, भैरव उसे यकीन दिलाता है कि उसके पास दवा है।"

मैं आँगन में बैठ गया। रात ठंडी थी, पर मेरे कान गरम थे। भैरव सिर्फ़ ज़हर नहीं बेच रहा था — वो उम्मीद बेच रहा था। और उम्मीद का सौदा ज़हर से भी महँगा है।

सुबह मैंने अपनी धोती कसी और घर से निकला। माँ ने पूछा कहाँ, मैंने कहा — "उस आदमी के पास जाना है जिसे भैरव ने अखाड़े से बाहर निकाल दिया था।"

"कौन?"

"जिसे मैंने उस दिन दीवार के सहारे बैठे देखा था। जिसकी गंध में दवा और पसीने की कड़वाहट थी।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा और एक पुड़िया मेरी जेब में डाल दी। "सोंठ और काली मिर्च। अगर वो बहुत कमज़ोर हो, तो एक चुटकी पानी में घोल देना।"

मैं निकल पड़ा। रास्ते में मैंने अपनी नाक खुली रखी। गाँव के बाहर, नहर के पार, हवा में एक गंध आ रही थी जो मैंने कई महीने पहले सुनी थी — मिट्टी में मिली दवा की गंध, थोड़ी कड़वी, थोड़ी फीकी, और उसके नीचे पसीने की वो बू जो सिर्फ़ बीमार शरीर देता है।

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