Spirit of a Fighter – Chapter 165
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "वो ग्यारहवाँ चेहरा… जो मैंने बचपन में देखा था… वो किसका था?"
माँ ने मेरे सामने घुटने टेके। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया — उनके हाथ ठंडे थे, सूखे, चक्की वाले।
"वीर," उन्होंने कहा, "अगर वो चेहरा किसी का है जिसे तू जानता है, तो वो तेरे और मेरे बीच नहीं है। वो तेरे और उसके बीच है। और जब तक तू उसे खुद नहीं पहचानता, मैं तुझे बताकर तेरे दिल पर पत्थर नहीं रखूँगी।"
"पर माँ—"
"सुन।" उन्होंने मेरा चेहरा छोड़ा। "कल सुबह जब अलमारी खुलेगी, तू वो डायरी अपने हाथ में लेगा। और जब तू उस ग्यारहवें चेहरे को देखेगा, तो तू अकेला नहीं होगा। मैं वहाँ रहूँगी। मीरा रहेगी। टिंकू रहेगा। गुड़िया रहेगी। और अगर तेरी याददाश्त तुझे छोड़ भी दे, तो हम तुझे बताएँगे कि तू कौन है।"
मेरी आँखें भर आईं। "माँ, अगर वो चेहरा किसी ऐसे का है जिससे मैं प्यार करता हूँ—"
"तो भी सच सच रहेगा।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "झूठ से प्यार बचाना, उस प्यार को मारना है। सच से जो टूटे, वो प्यार पहले से टूटा हुआ था।"
हम आँगन में बैठे रहे। तारे ऊपर थे, और उनकी रोशनी ऐसी लग रही थी जैसे कोई दूर से हमें देख रहा हो।
अंदर से गुड़िया की आवाज़ आई, "माँ, टिंकू भैया का हाथ ठीक लग रहा है! सूजन कम है।"
माँ मुस्कुराईं — थोड़ी-सी, पर मुस्कुराईं। "जा," उन्होंने कहा। "टिंकू के पास बैठ। मैं चाय बनाती हूँ।"
"रात को चाय?"
"आज रात नींद नहीं आएगी किसी को।"
वो उठकर रसोई में गईं।
मैं अंदर गया। टिंकू चारपाई पर लेटा था, गुड़िया उसकी कलाई पर पट्टी बाँध रही थी। उसके चेहरे का कालापन धुल गया था, पर आँखों के नीचे काला घेरा रह गया था।
"भैया," गुड़िया ने कहा, "टिंकू भैया ने कहा कि उन्होंने आज दुकान पर एक अजीब आदमी देखा था, जो मिठाई खरीदकर ले गया, पर पैसे नहीं दिए।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"कैसा आदमी?"
"लंबा," टिंकू ने धीरे से कहा। "लंगड़ाता हुआ। एक टाँग छोटी थी। और हाथ में एक छोटी बोतल थी — हरी।"
मेरी साँस रुक गई।
"हरी बोतल?"
"हाँ। उसने मिठाई उठाई, बोतल मेज़ पर रखी, और बोला — 'ये तेरे भाई के लिए है।' और फिर वो चला गया। और फिर… वो दो आदमी आए।"
मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। "बोतल कहाँ है?"
गुड़िया ने चारपाई के नीचे से एक छोटी हरी शीशी निकाली। वही शीशी — जैसी माँ ने चूल्हे में जलाई थी, जैसी मैंने ज़मीन पर पटकी थी और नहीं टूटी थी।
"मैंने इसे छुआ नहीं," गुड़िया ने कहा। "टिंकू भैया ने दिया था, बोले इसे भैया को देना।"
मैंने शीशी ली। उसे अपनी नाक के पास लाया।
और वो गंध आई — कड़वी, धातु जैसी, जिसके नीचे एक और गंध थी। मीठी। जानी-पहचानी।
धतूरे की गंध।
वो ही गंध जो लज्जो की मिठाई में थी। वो ही गंध जो उस बुढ़िया की चाय में थी।
पर इस बार कुछ और था। एक तीसरी गंध — बहुत हल्की, नीचे दबी हुई। मैंने शीशी को और करीब लाया, आँखें बंद करके।
सोंठ। काली मिर्च। तुलसी।
ये गंध मैंने पहले कहीं सूँघी थी।
मेरी आँखें खुलीं।
"माँ!" मैं दौड़कर रसोई में गया।
वो चूल्हे पर बैठी थीं, चाय की पत्ती डाल रही थीं।
"माँ, ये शीशी—"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर शीशी की तरफ़। उनका चेहरा बदल गया।
"ये तो वही है," उन्होंने कहा। "जो मैंने जलाई थी।"
"नहीं।" मैंने शीशी उनके सामने रखी। "ये दूसरी है। और इसमें कुछ और मिला है। माँ, इसे सूँघो।"
माँ ने शीशी उठाई। उन्होंने ढक्कन खोला — मैंने रोका नहीं — और हल्का-सा सूँघा।
और फिर उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये… ये तो—"
"क्या, माँ?"
"ये वो दवा है," उन्होंने धीरे से कहा, "जो तेरे पापा को मैं देती थी। जब वो बीमार पड़े थे। सोंठ, काली मिर्च, तुलसी — मैंने खुद ये मिलाया था उनके लिए।"
मैं जड़ हो गया।
"तो ये शीशी… इसमें पापा की दवा है?"
"नहीं।" माँ ने शीशी को करीब से देखा। "इसमें पापा की दवा की गंध है। पर ये दवा नहीं है।" उन्होंने शीशी को हिलाया। "देख, रंग हरा है। दवा का रंग ऐसा नहीं होता। इसमें ज़हर है, और उस ज़हर को छुपाने के लिए तेरे पापा की दवा की गंध मिलाई गई है।"
"किसने मिलाई?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो भाव था जो अब मैं पहचानता था — डर और गुस्सा, दोनों एक साथ।
"जो व्यक्ति तेरे पापा की दवा जानता था," उन्होंने कहा। "जो जानता था कि उन्हें क्या दिया जाता था।"
"माँ, वो तो कोई अपना ही होगा।"
"हाँ।" माँ ने शीशी मेज़ पर रखी। "कोई अपना ही।"
रसोई में सन्नाटा छा गया। चूल्हे की आग चटक रही थी। चाय की पत्ती उबल रही थी।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "आपको किसी पर शक है?"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने चाय छानी, दो गिलास भरे, और एक मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"कल सुबह," उन्होंने कहा, "अलमारी खुलेगी। तू वो डायरी लाएगा। और जब तू उसे पढ़ेगा, तो तुझे वो नाम मिल जाएगा जो तू ढूँढ रहा है।"
"और अगर वो नाम… किसी अपने का हो?"
माँ ने अपनी चाय की चुस्की ली। "तो ये चाय कड़वी हो जाएगी।"
हम चुपचाप बैठे रहे। टिंकू अंदर से कराह रहा था, गुड़िया उसके सिर पर हाथ रखकर कुछ गुनगुना रही थी।
और तभी मुझे कुछ याद आया।
"माँ, उस लंगड़े आदमी ने… टिंकू से कहा था कि ये बोतल मेरे भाई के लिए है।"
"तो?"
"तो उसने शीशी… टिंकू को दी थी। टिंकू को।" मैं उठ खड़ा हुआ। "माँ, वो लंगड़ा आदमी जानता था कि टिंकू मेरा दोस्त है। उसे कैसे पता?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि वो लंगड़ा आदमी," उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे पापा के साथ उस रात चला था।"
"कौन सा रात?"
"जिस रात तेरे पापा ने आख़िरी बार वो पानी पिया था।" माँ उठीं। "मैंने तुझे नहीं बताया था कि उस रात तेरे पापा अकेले नहीं गए थे। उनके साथ एक आदमी था। लंगड़ा। और वो आदमी… वो इस गाँव का है।"
मेरे हाथ की चाय ठंडी हो रही थी।
"कौन?"
"मुझे नाम नहीं पता।" माँ ने आँखें मूंद लीं। "तेरे पापा ने कभी नाम नहीं बताया। पर उस रात जब वो लौटे, तो उनके होंठ काँप रहे थे और उन्होंने बस इतना कहा — 'सरस्वती, जिस आदमी पर मैंने सबसे ज़्यादा भरोसा किया, उसी ने मुझे बेच दिया।'"
मैंने गिलास मेज़ पर रखा।
"और वो लंगड़ा आदमी… वो आज टिंकू की दुकान पर आया। मतलब वो अभी भी यहाँ है। मतलब वो भैरव के साथ है।"
"या वो भैरव के साथ नहीं है, और वो भैरव से डरकर भाग रहा है।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"डरकर भाग रहा है तो किससे डर रहा है?" मैंने पूछा। "भैरव से, या उस आदमी से जिसने पापा को बेचा?"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। बस चूल्हे की आग को देखती रहीं। बर्तन से भाप उठ रही थी, और उनका चेहरा उस भाप के पार धुँधला लग रहा था।
मैंने अपना गिलास उठाया ही था कि बाहर से आवाज़ आई। कोई दौड़ रहा था। जूते पहने हुए, सड़क की मिट्टी पर फिसलते हुए।
दरवाज़ा खुला रह गया था। और मैंने देखा — गुड़िया की साड़ी का कोना, हवा में उड़ता हुआ।
"वो अभी-अभी आई थी ना?" मैंने पूछा।
माँ भी उठ खड़ी हुईं। "दरवाज़े पर। सुबह। जब तू बाहर आया था।" उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "मैंने सोचा तेरी दोस्त होगी।"
मेरे हाथ से गिलास छूट गया। चाय फर्श पर फैल गई, पर मैंने गिलास को उठाया भी नहीं।
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