Spirit of a Fighter164 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 164

6 min read November 5, 2026

"मीरा मैडम?"

"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में कुछ बदला। "उसे मैडम मत कह। वो… वो मीरा है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके दर्द के बीच भी एक चमक आई। "अच्छा?"

"चुप रह।"

"भाई, तूने उसका नाम ऐसे कहा जैसे माँ तेरे पापा का नाम लेती है।"

"मैंने कहा चुप रह।"

वो हँसा — छोटी, टूटी हँसी, पर पहली बार असली। "अब पता चला," उसने कहा, "क्यों तूने भैरव से लड़ने का सोचा। डर के मारे नहीं, उस लड़की की खातिर।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मुझे गुस्सा आना चाहिए था। पर आया नहीं।

"हाँ," मैंने कहा। "शायद।"

टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं। "भाई, तूने सच कह दिया? मुझे लगा तू मना करेगा।"

"क्या फ़ायदा मना करने का?" मैंने कपड़ा उसके घाव पर दबाया। "जब दिल में बात हो और ज़ुबान मना करे, तो आदमी खोखला हो जाता है। मैं खोखला नहीं बनना चाहता।"

टिंकू कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, "भाई, मैं तुझसे एक बात कहूँ?"

"कह।"

"तू भैरव से लड़ने जा रहा है। पर तू उससे अकेले नहीं लड़ रहा।"

"मुझे पता है। माँ है, गुड़िया है—"

"नहीं, तू समझा नहीं।" उसने अपना जला हुआ हाथ उठाया। "जब वो दो आदमी मेरा हाथ पकड़ रहे थे, तो मुझे सिर्फ़ एक बात सूझी — कि अगर मैं बोलूँगा, तो तू उन तक पहुँच जाएगा। और फिर वो तुझे पकड़ेंगे। इसलिए मैं चुप रहा।" उसकी आवाज़ भर्राई। "पर जब वो गए, तब मुझे लगा कि मैंने गलती की। क्योंकि अगर मैंने उन्हें भैरव के पास जाने दिया, तो वो तेरे साथ वही करेंगे जो उन्होंने रघुवीर के साथ किया। और मैं यह सोचकर मर जाऊँगा कि मैंने तुझे बचाया नहीं।"

मेरा गला भर आया।

"टिंकू—"

"सुन भाई।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "तू अकेले लड़ेगा तो हार जाएगा। ये बात मैंने तेरी आँखों में देखी है। जब तू भैरव का नाम लेता है, तेरी आँखें ऐसी हो जाती हैं जैसे किसी ने तेरे पीछे दरवाज़ा बंद कर दिया हो। तू बदला लेने के लिए लड़ना चाहता है। पर बदला लेने वाला आदमी — वो सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है। और जो अपने बारे में सोचता है, वो अकेला होता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू कब से इतना अक्लमंद हो गया?"

"मैं हमेशा से था।" उसने कंधे उचकाए, और छाले फटने से उसका चेहरा बिगड़ा। "बस तू मुझे मिठाई वाला समझता रहा।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन में। और वो हँसी भी आधी रह गई, क्योंकि उसी पल मेरे कानों में बाहर से एक आवाज़ आई — चप्पलों की, जल्दी से आती हुई।

मैं सतर्क हो गया। शटर के पास पहुँचा और झाँका।

गुड़िया दौड़ती हुई आ रही थी। उसकी चोटी हवा में उड़ रही थी और हाथ में एक लालटेन थी जो हिल रही थी। उसके पीछे माँ थीं — साड़ी का पल्लू सिर पर, चेहरे पर वो डर जो वो कभी नहीं दिखातीं।

"भैया!" गुड़िया ने दूर से ही चिल्लाया। "भैया, तू ठीक है?"

"हूँ," मैंने कहा। "टिंकू भी।"

माँ शटर के पास पहुँचीं। उन्होंने अंदर झाँका, टिंकू को देखा, जले हुए घाव देखे, और उनके होंठ एक लाइन में सिकुड़ गए। फिर वो बोलीं, "ये कैसे हुआ?"

"दो आदमी आए थे," मैंने कहा। "भैरव के।"

माँ ने कुछ नहीं कहा। वो अंदर आईं, टिंकू के पास बैठीं, और उसके घाव की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी साड़ी का कोना पकड़ा और ज़ोर से खींचकर फाड़ लिया।

"माँ—"

"चुप।" उन्होंने कपड़ा पानी में भिगोकर टिंकू के घाव पर रखा। टिंकू ने दाँत भींचे। "बेटा, ये जलन कुछ देर रहेगी। पर सूजन उतर जाएगी।"

"आंटी, मैं ठीक हूँ—"

"तू ठीक है, मैं जानती हूँ।" माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। "पर जो ठीक नहीं है, उसे भी ठीक होना पड़ेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, टिंकू को अपने साथ ले चल।"

"माँ, उसकी दुकान—"

"दुकान जल गई।" माँ की आवाज़ सपाट थी, पर उसमें वो ठंडक थी जो आँधी से पहले आती है। "अब ये दुकान नहीं है। अब ये जगह है जहाँ भैरव का आदमी आया था। और भैरव के आदमी जहाँ आते हैं, वहाँ कोई नहीं रुकता।"

टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उसे रोक दिया।

"तू मेरे बेटे का दोस्त है। तूने उसके लिए अपना हाथ जलाया। अब तू मेरे घर में रहेगा, मेरी छत के नीचे, और मेरी रोटी खाएगा। बाकी बात सुबह।"

टिंकू की आँखें भर आईं। "आंटी—"

"चुप।" माँ उठीं। "गुड़िया, टिंकू का हाथ पकड़। वीर, तू उसका दूसरा हाथ। हम घर चलते हैं।"

गुड़िया ने टिंकू का हाथ पकड़ा और उसकी लालटेन उठाकर रास्ता दिखाया। मैंने उसका दूसरा हाथ पकड़ा — वही जला हुआ — और वो सिसककर रह गया, पर चला।

हम बाहर निकले। रात गहरी थी, और गाँव सो रहा था। पर हमारी गली में एक-दो दरवाज़ों के पीछे से आवाज़ें आ रही थीं, जैसे लोग झाँक रहे हों।

रास्ते में माँ ने कुछ नहीं कहा। पर जब हम घर के आँगन में पहुँचे, तो उन्होंने मुझे रोका।

"वीर, तू अंदर आ। टिंकू, तू गुड़िया के साथ जा। उसकी कलाई पर और घाव हैं, उन्हें देखना है।"

टिंकू अंदर गया। गुड़िया उसके पीछे गई। और मैं आँगन में माँ के साथ खड़ा रहा।

"कल सुबह अलमारी खुलेगी," मैंने कहा।

"मुझे पता है।"

"और उसमें डायरी मिलेगी।"

"मुझे पता है।"

"माँ, उसमें ग्यारह चेहरे हैं। उनमें से एक चेहरा—"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो भाव था जो मैंने कभी नहीं देखा था — जैसे वो जानती हों कि मैं क्या कहने वाला हूँ।

"एक चेहरा किसका है?" उन्होंने धीरे से पूछा।

"पता नहीं। पर मुझे लगता है… मुझे लगता है वो चेहरा मेरे जानने वाला किसी का है।"

माँ ने आँखें बंद कीं। एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने आँखें खोलीं।

"वीर," उन्होंने कहा, "तेरे पापा की लिखाई वाला काग़ज़ जो मिला था — उसमें एक लाइन थी जो मैंने तुझे नहीं पढ़ी थी।"

मैं जड़ हो गया। "कौन सी लाइन?"

माँ ने अपनी साड़ी की जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला — पीला, जर्जर, जिसके किनारे फटे हुए थे। उन्होंने उसे खोला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"ये… ये तो वही काग़ज़ है—"

"हाँ। पर तूने इसे पूरा नहीं पढ़ा था। नीचे, आख़िरी में, एक लाइन है। मैंने इसे तेरी नज़र से छुपाया था, क्योंकि मुझे डर था कि तू पागल हो जाएगा।"

मैंने काग़ज़ पढ़ा।

ऊपर वही बातें थीं जो मैं जानता था — ज़हर, खुराक, भैरव। और फिर, आख़िरी लाइन में, पापा की काँपती लिखाई में:

"अगर मेरा बेटा ये पढ़े, तो उससे कहना कि ग्यारहवाँ चेहरा उसने खुद डायरी में देखा है — बचपन में। वो उस रात मेरे साथ था। और उसने जो देखा, वो उसने भूल दिया है।"

मेरे हाथ काँपने लगे। "बचपन में? मैं… मैं कब गया था भैरव के कमरे में?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रोई नहीं।

"तेरे पापा जब आख़िरी बार उस पानी को लेने गए थे," उन्होंने धीरे से कहा, "तो तू साथ गया था। तेरी उम्र सात साल की थी। तूने वो डायरी खुली देखी थी — भैरव कमरे में नहीं था। तूने उसमें चेहरे देखे थे। और फिर तू बेहोश हो गया था।"

"बेहोश?"

"बुखार आ गया था। तूने चार दिन तक बुखार में बड़बड़ाया — 'काले चेहरे, काले चेहरे'। तेरे पापा ने तुझे गोद में उठाकर घर लाया था और मुझसे कहा था — 'इसे कभी मत बताना। इसे भूल जाने देना।'"

मैं ज़मीन पर बैठ गया।

मेरे हाथ में काग़ज़ था, और उसका वज़न मेरे पूरे शरीर पर पड़ रहा था। सात साल का बच्चा। बुखार। काले चेहरे।

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