Spirit of a Fighter – Chapter 163
वो चिट्ठी मेरी हथेली पर रखी थी, और घड़ी की तीन सेकंड की टिक-टिक अभी भी मेरे कानों में बज रही थी। मैं उठा — धीरे नहीं, झटके से। आँगन की मिट्टी पैरों से फिसली, पर मैं रुका नहीं। मेरे हाथ में मीरा की घड़ी और टिंकू की टूटी मिठाई की डिब्बी थी, जो उसने दोपहर में दी थी — "भाई, आधी तो तू खा, आधी माँ को दे देना।"
डिब्बी उठाते ही मुझे कुछ अजीब लगा था। उसका ढक्कन ठीक से बंद नहीं था, जैसे किसी ने जल्दी में बंद किया हो। पर मैंने उस वक़्त ध्यान नहीं दिया। अब दिया।
मैं दौड़ा।
गली का मोड़ आया, नीम का पेड़ आया, सूखा कुआँ आया — सब कुछ पीछे छूटता गया। मेरी चप्पल एक बार उतरी, मैंने उसे उठाया भी नहीं। नंगे पैर दौड़ता रहा। मिट्टी में काँटा लगा, पर दर्द कहीं पीछे रह गया।
टिंकू की दुकान तक पहुँचा तो मेरी साँस फट रही थी।
शटर आधा खुला था। आधा — न पूरा बंद, न पूरा खुला। जैसे किसी ने भागते-भागते नीचे खींचा हो और बीच में ही छोड़ दिया हो।
और गंध।
घी जलने की बू। वो काली, कड़वी बू जो रसोई में कुछ जल जाने पर आती है — जो नाक में नहीं, गले में लगती है। उसके नीचे एक और बू थी। हल्की। मीठी-सी। चीनी जलने की बू, जो दाँतों में खट्टी लगती है।
मैंने शटर ऊपर धकेला। ज़ंग लगी पट्टी चरमराई, और अंधेरा बाहर निकलकर मेरे चेहरे पर आ गिरा।
अंदर अंधेरा था — पर वो अंधेरा नहीं था जैसा रात का होता है। ये वो अंधेरा था जो आग के बाद कमरे में बैठ जाता है। दीवारें काली, छत काली, और हवा में तैरती राख।
"टिंकू!"
कोई जवाब नहीं।
"टिंकू!"
चूल्हे के पास से आवाज़ आई — हल्की, टूटी, जैसे किसी ने बोलने की कोशिश की हो और आवाज़ गले में ही अटक गई हो।
"भाई… यहाँ।"
मैं चूल्हे की तरफ़ भागा। एक कोने में टिंकू बैठा था — घुटने सीने से लगाए, पीठ दीवार से टिकाई, हाथ में लकड़ी का चमचा। उसका चेहरा काला पड़ा था, आँखों में पानी भरा था — पर वो रो नहीं रहा था।
वो हँस रहा था।
हँसने की कोशिश कर रहा था। उसके होंठ काँप रहे थे, दाँत दिख रहे थे, और आवाज़ ऐसी निकल रही थी जैसे किसी टूटी हुई बाँसुरी से हवा गुज़र रही हो।
"भाई," उसने कहा, "मिठाई जल गई। आज खीर नहीं मिलेगी।"
मेरे अंदर कुछ टूटा।
मैं उसके पास घुटनों के बल बैठ गया और उसे उठाकर गले लगा लिया। उसका शरीर काँप रहा था — पूरा, सिर से पैर तक। उसके कपड़ों से जली चीनी की बू आ रही थी। मेरे हाथ उसकी पीठ पर थे और मुझे लगा कि वो मेरी गोद में सिकुड़ता जा रहा है, जैसे कोई बच्चा।
"तू ठीक है?" मैंने उसका चेहरा पकड़कर पूछा। "कहीं लगी तो नहीं? जल गया?"
"नहीं भाई, मैं ठीक हूँ।" उसने मेरा हाथ हटाया। "बस… बस चूल्हे पर से कड़ाही गिर गई।"
"गिर गई?" मैंने आस-पास देखा। कड़ाही ज़मीन पर पड़ी थी — उलटी, और उसके नीचे जली हुई मिठाई फैली थी। "अपने आप गिरी?"
टिंकू ने नज़र नीची कर ली।
और तभी मैंने उसकी कलाई देखी।
दाहिनी कलाई पर अंगूठे के दो निशान थे — गहरे, नीले पड़ते हुए। किसी ने ज़ोर से पकड़ा था। इतना ज़ोर से कि खाल दब गई थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"ये क्या है?"
"कुछ नहीं। चूल्हे से—"
"टिंकू।" मेरी आवाज़ ऐसी निकली जो मैंने खुद नहीं सुनी थी। "ये चूल्हे से नहीं है। ये किसी के हाथ के निशान हैं। कौन था?"
टिंकू चुप रहा। उसके होंठ काँपे। उसने चमचा कसकर पकड़ लिया, जैसे वो उसका सहारा हो।
"भाई, तू बैठ जा। तेरे पैर से खून आ रहा है।"
"पैर की बात बाद में।" मैंने उसकी कलाई को अपनी नाक के पास लाया — बिना सोचे, आदत से। और फिर मैं जड़ हो गया।
उसकी त्वचा से एक गंध आ रही थी, जो उसकी अपनी नहीं थी। कोई और उसे छूकर गया था, और उसका पसीना उसकी खाल पर रह गया था।
कड़वी। धातु जैसी। वो ही गंध।
वो ही गंध जो भैरव के पानी में थी। वो ही गंध जो लुट्टन की साँस में थी। वो ही गंध जो मुंशीजी के बुढ़ापे में घुली थी।
मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई।
"दो आदमी आए थे," टिंकू ने आख़िर कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे हर शब्द निकालने में उसे ताकत लग रही हो। "शाम को। जब मैं दुकान बंद कर रहा था। एक लंबा, एक ठिगना। मुझे नाम नहीं पता। उन्होंने कहा —"
वो रुका।
"क्या कहा?"
"कहा — 'अखाड़े से दूर रह। वरना अगली बार दुकान नहीं, हड्डियाँ जलेंगी।'"
मेरे अंदर कुछ ऐसा जला जो आग से भी ज़्यादा गरम था।
"और तूने क्या कहा?"
"मैंने कहा," टिंकू ने धीरे से कहा, "कि भाई की दुकान है, मैं नहीं जानता।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो पानी फिर आया। "भाई, मैंने झूठ बोला। मैंने कहा कि मैं वीर को नहीं जानता। मुझे शर्म आ रही है।"
"शर्म?" मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। "तूने अपनी जान बचाने के लिए झूठ बोला, और तुझे शर्म आ रही है? टिंकू, तू पागल है।"
"नहीं भाई।" उसने मेरे हाथ हटाए। "मैंने झूठ इसलिए बोला ताकि वो मुझे छोड़ दें और मैं तुझे बता सकूँ। अगर मैं सच बोलता, तो वो मुझे बाँधकर ले जाते, और तुझे पता भी नहीं चलता।"
मैं उसके सामने बैठा रह गया।
"फिर क्या हुआ?"
"फिर वो चले गए। और मैंने… मैंने सोचा कि उन्हें पता नहीं चलेगा।" उसकी आवाज़ टूटी। "पर भाई, मैं डर गया था। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कड़ाही उठाई और वो हाथ से छूट गई। और फिर आग लग गई।"
उसने अपनी जली हुई कलाई की तरफ़ देखा — वो दूसरी कलाई थी, बाईं, जिस पर आग लगी थी। उस पर पानी के छाले उभर आए थे, लाल और सफ़ेद।
"और तूने मुझे बताया नहीं?" मेरी आवाज़ भारी हो गई।
"मैंने सोचा… तू भैरव से लड़ने जा रहा है। मैं तुझे और टेंशन नहीं देना चाहता था।"
वो यह कहकर मुस्कुराया। जली हुई कलाई लिए, काला चेहरा लिए, आँसुओं से भरी आँखों से — और मुस्कुराया।
"आज खीर नहीं मिलेगी," उसने फिर कहा। "पर कल बना दूँगा। सुबह उठकर।"
मुझे लगा मेरा सीना फट जाएगा।
मैंने उसकी बाईं कलाई पकड़ी और अपने पास खींचा। छाले थे, बड़े। मैंने करीब से देखा। फिर मैंने उसका चेहरा देखा — काला, घबराया, पर हँसता हुआ।
और मेरे दिल में कुछ ऐसा उठा जो मैंने पहले कभी नहीं महसूस किया था। गुस्सा तो था, पर उसके नीचे एक और चीज़ थी — डर। ऐसा डर जो मुझे अपने बारे में कभी नहीं हुआ था।
मुझे अपनी जान का डर नहीं था। मुझे इनका डर था। टिंकू का। माँ का। गुड़िया का। मीरा का।
भैरव मुझे मार नहीं रहा था। भैरव मेरे आस-पास वालों को मार रहा था, ताकि मैं अकेला रह जाऊँ।
और अकेला आदमी — चाहे कितना भी ताकतवर हो — हार जाता है।
"उठ," मैंने कहा। "मैं तुझे घर ले चलता हूँ।"
"नहीं भाई, मैं ठीक हूँ।"
"उठ।"
मैंने उसे उठाया। वो मेरे कंधे पर हाथ रखकर खड़ा हुआ, और तभी मैंने देखा कि उसका बायाँ पैर भी जला हुआ था — कपड़ा चिपक गया था और उसके नीचे खाल उतर रही थी।
"तू बैठ, मैं पानी लाता हूँ।"
"भाई—"
"बैठ!" मेरी आवाज़ गरजी। दुकान की छत से राख गिरी। मैंने अपनी आवाज़ धीमी की। "बैठ जा, टिंकू। प्लीज।"
वो बैठ गया। और मैं पानी लेने दौड़ा।
पानी का घड़ा बाहर था, टूटा हुआ, आधा। मैंने उसमें से जो बचा था, कपड़े पर डाला और उसके घाव पर रखा। उसने दाँत भींचे, पर चीखा नहीं।
"आज तू ऐसे ही सो जा," मैंने कहा। "कल मैं मीरा को लेकर आऊँगा। उसके पास औषधि है।"
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