Spirit of a Fighter – Chapter 176
हवा में वो कड़वाहट थी, और मेरे हाथ में बीज। दोनों एक साथ मेरे सीने पर बोझ डाल रहे थे।
मैं अखाड़े की तरफ़ जा ही रहा था कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी।
"वीर!"
मैं रुका। ये मीरा की आवाज़ थी। वो दौड़ती हुई आ रही थी, हाथ में अपना बैग, साँस फूली हुई। मेरे पास रुकी, और दो पल के लिए झुककर अपनी साँस सीधी की।
"मैंने सोचा," वो हाँफते हुए बोली, "तू अकेले जाएगा। और मैं साथ चलूँगी।"
"मीरा, ये तेरा काम नहीं।"
"मेरा काम?" उसने सिर उठाया। उसके माथे पर पसीना था और आँखें चमक रही थीं। "वीर, मेरे पापा बीस साल से उस कुर्सी पर बैठे हैं। और तू मुझे बोलता है कि ये मेरा काम नहीं?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो सही थी, और सही आदमी के सामने चुप रहना ही पड़ता है।
"पर रास्ते में एक जगह रुकना है," उसने कहा।
"कहाँ?"
"श्यामू के पास।"
मेरे पेट में एक झटका लगा। "मीरा, अभी वक़्त नहीं है। भैरव कुएँ पर इंतज़ार कर रहा है।"
"और श्यामू साँस ले रहा है," उसने सीधा मेरी आँखों में देखकर कहा। "वीर, अगर हम आज रात भैरव से लड़ने जा रहे हैं, तो मुझे पता होना चाहिए कि उसका ज़हर क्या करता है। मैं अंधेरे में नहीं लड़ूँगी। मुझे देखना है।"
मैं झिझका। मेरे भीतर कुछ कह रहा था कि हर पल कीमती है। पर मीरा की आँखों में वो बात थी जो माँ की आँखों में थी — ज़िद, और उसके पीछे एक डर जिसे वो छिपा रही थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर जल्दी।"
हम नहर की तरफ़ मुड़ गए। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, और अंधेरा इतना था कि मुझे मीरा की आहट से चलना पड़ रहा था। वो मेरे पीछे थी, और उसकी चप्पल की आवाज़ मेरे दिल की धड़कन से मिल रही थी।
"तूने कभी सोचा," वो चलते-चलते बोली, "कि भैरव ने ये ज़हर किसी से बनवाया कैसे?"
"सोचा है।"
"और?"
"और मुझे लगता है," मैंने कहा, "कि जिस आदमी ने इसे बनाया, वो अब भी ज़िंदा है। कुएँ में।"
मीरा के कदम रुक गए। मैंने पलटकर देखा। उसका चेहरा चाँद की रोशनी में सफ़ेद पड़ गया था।
"कुएँ में? वीर, तूने मुझे ये नहीं बताया था।"
"मैंने किसी को नहीं बताया। सिर्फ़ कालू काका जानते हैं। और अब तू।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "और वो आदमी… उसने तुझे कुछ बताया?"
"बताया कि मेरे पापा जानते थे मेरी नाक के बारे में। और उन्होंने कहा था — इसे अखाड़े से दूर रखो।"
मीरा ने एक गहरी साँस ली। फिर वो आगे बढ़ी और मेरे साथ चलने लगी।
"तो तेरे पापा जानते थे," उसने कहा, "कि तेरी नाक तुझे अखाड़े तक खींच लाएगी। और वो तुझे बचाना चाहते थे।"
"पर मैं आ गया," मैंने कहा।
"हाँ," वो बोली, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैं समझ नहीं पाया। "तू आ गया।"
हम श्यामू की झोपड़ी के पास पहुँचे। ये गाँव के किनारे पर थी, एक टूटी दीवार और टीन के छत वाली। अंदर से एक दीये की रोशनी आ रही थी, हल्की पीली, काँपती हुई। दरवाज़े पर एक पर्दा लटका था, फटा हुआ।
मैंने पर्दा उठाया। अंदर श्यामू चारपाई पर पड़ा था। उसका चेहरा पीला था, गाल धँसे हुए, और आँखें बंद। उसकी साँस आवाज़ कर रही थी, जैसे किसी बाँसुरी में हवा भर रही हो, पर बज नहीं रही हो।
उसकी पत्नी कोने में बैठी थी, एक बर्तन में कुछ पकला रही थी। उसने हमें देखा और उठ खड़ी हुई। उसकी आँखें लाल थीं।
"तुम फिर आए?" उसने मुझसे कहा। "डॉक्टर बोल गए हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता।"
"ये डॉक्टर नहीं है," मैंने मीरा की तरफ़ इशारा किया। "ये… ये जानती है। इसे देखने दो।"
औरत ने मीरा को ऊपर से नीचे देखा। मीरा ने अपना बैग खोला, और उसमें से एक छोटा-सा कपड़े का थैला निकाला। उसे खोलते ही हवा में एक तेज़ गंध फैल गई — काली मिर्च, सोंठ, और कुछ और जो मैं पहचान नहीं पाया।
"मैं इसे छू सकती हूँ?" मीरा ने पूछा।
औरत ने एक पल सोचा। फिर सिर हिलाया।
मीरा श्यामू की चारपाई के पास बैठ गई। उसने उसकी कलाई पकड़ी और उँगलियाँ उसकी नाड़ी पर रख दीं। फिर आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे, जैसे वो कोई गिनती कर रही हो।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा था। मेरे हाथ में बीज अब भी गरम था, और मेरी नाक में दो गंधें लड़ रही थीं — मीरा की थैली की तेज़ गंध, और श्यामू के शरीर से आती वो कड़वी बू जो मैंने उसकी साँस में पकड़ी थी।
मीरा ने आँखें खोलीं। उसने श्यामू की आँखों की पुतलियाँ देखीं, फिर उसकी जीभ निकलवाकर देखी। फिर वो चुप बैठ गई, बहुत देर तक।
कमरे में सिर्फ़ श्यामू की साँस की आवाज़ थी और कोने में पक रहे बर्तन की खदबद।
फिर मीरा उठी। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर से बाहर का इशारा किया।
हम बाहर निकले। रात की हवा ठंडी थी और मुझे लगा कि मेरी साँस अब भी रुकी हुई है।
मीरा ने दीवार का सहारा लिया। उसका चेहरा गंभीर था, और उसकी आवाज़ धीमी।
"उसके शरीर में ज़हर नहीं बचा," उसने कहा। "जो पी लिया गया, वो जल गया, पसीने से निकल गया, उल्टी से निकल गया। पर जो ज़हर ने खाया है, वो लौटेगा नहीं।"
"मतलब?"
"मतलब, वीर, उसकी उम्र के दस साल शरीर से गए हैं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "उसकी कमर ऐसे मुड़ गई है जैसे वो साठ साल का हो। उसकी आँखें धुँधली हो रही हैं। और उसकी नाड़ी… वो मुझे कह रही थी कि अंदर कोई चीज़ अभी भी जल रही है।"
मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई।
"मैं उसके दर्द को कम कर सकती हूँ," मीरा बोली। "कुछ दिन, कुछ हफ़्ते, वो आराम से सो सकेगा। पर मैं उसे पहलवान नहीं बना सकती। वो फिर कभी अखाड़े में नहीं उतरेगा।"
मैंने दीवार पर हाथ रखा। पत्थर ठंडा था, और मेरी हथेली पर बीज उससे भी ज़्यादा गरम लग रहा था।
"मुझे पहलवान नहीं चाहिए," मैंने कहा। "मुझे उसकी जान चाहिए।"
"जान तो है," मीरा ने कहा। "पर वीर, सबूत चाहिए। अगर कल को हम भैरव पर इल्ज़ाम लगाएँ, तो मेरे पास श्यामू का लिखा हुआ होना चाहिए — कि उसने कब पिया, कितनी खुराक पी, किसने दी, और पीने के बाद क्या हुआ। बिना उसके लिखे, भैरव का कोई वकील इसे अदालत में हवा में उड़ा देगा।"
"सबूत बाद में," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में सख़्त लगी। "पहले दवा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में कुछ बदला — वो चमक जो अब तक ज़िद की थी, अब थोड़ी सख़्त हो गई।
"तुम सबूत को हल्के में लेते हो, वीर," उसने कहा। "यही तुम्हारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। तुम्हें लगता है कि सच बोल देना काफ़ी है। पर सच जो साबित न हो, वो सच नहीं होता — वो सिर्फ़ एक आवाज़ होती है जिसे लोग भूल जाते हैं।"
"और तुम्हें लगता है," मैंने पलटकर कहा, "कि जब तक तुम काग़ज़ भरती रहोगी, लोग मरते नहीं? श्यामू इस चारपाई पर पड़ा है, मीरा। उसकी साँस गिनी जा रही है। और तुम मुझे काग़ज़ की बात सुना रही हो?"
"मैं उसकी जान बचाने की बात कर रही हूँ।"
"नहीं, तुम अपने पापा की बात कर रही हो।" शब्द मेरे मुँह से निकल गए, और निकलते ही मुझे पता चल गया कि मैंने ग़लत कहा। पर अब लौटाया नहीं जा सकता था।
मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया। वो एक पल के लिए जड़ हो गई, जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मार दिया हो।
"तुम्हें नहीं पता," उसने धीरे से कहा, "कि तुमने क्या कहा।"
"मीरा—"
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