Spirit of a Fighter – Chapter 161
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें पीछे छिपा लिया, पर मेरी माँ ने देख लिया।
और तभी मेरी माँ आगे बढ़ीं।
वो धीरे चलीं, बुढ़िया के सामने आकर रुकीं, और उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया। बुढ़िया चौंक गई। उसकी आँखें फैल गईं।
मेरी माँ ने उसके चेहरे को गौर से देखा — जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना पलट रही हों।
"कमला?" मेरी माँ की आवाज़ फुसफुसाहट थी। "तू… तू कमला है न?"
बुढ़िया के होंठ काँपे।
"सरस्वती," वो फुसफुसाई। "सरस्वती, तूने मुझे पहचान लिया?"
और फिर वो दो औरतें वहीं मिट्टी में बैठ गईं — मेरी माँ और वो बुढ़िया — एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, और बुढ़िया रोने लगी। ऐसे रोई जैसे बीस साल का सूखा हुआ कुआँ एक बारिश में भर गया हो।
मैं जड़ हो गया। मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में भी पानी था।
"माँ?" मैंने धीरे से कहा। "ये क्या…"
मेरी माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मुझे अपने पास बैठाया — मिट्टी में। मेरे घुटने मिट्टी में धँस गए।
"बेटा," माँ ने कहा, "ये कमला है। मेरी सहेली। हम दोनों एक ही गाँव में पली-बढ़ीं। एक ही नदी में नहाया, एक ही चक्की पर आटा पिसा।" उन्होंने बुढ़िया का हाथ और कसकर पकड़ा। "फिर इसकी शादी उस घर में हुई जहाँ से मेरी शादी टूट गई थी।"
बुढ़िया ने सिर उठाया। उसका चेहरा लाल था, आँखें सूजी हुईं।
"तेरी शादी नहीं टूटी थी, सरस्वती," उसने कहा। "तेरी शादी तोड़ी गई थी। और उसका इल्ज़ाम मेरे ससुराल पर था। और मैं… मैं उस घर की बहू बनकर बैठी रही। मैं कुछ नहीं बोली। यही मेरा सबसे बड़ा पाप है।"
मेरी माँ ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
"अब बोल," माँ ने कहा। "जो सीने में दबाकर बैठी है, वो सब बोल दे। ये बच्चे सुन रहे हैं। और सच के बिना ये मिट्टी नहीं सुधरेगी।"
बुढ़िया ने एक लंबी साँस ली — ऐसी साँस जैसे सालों की धूल उड़ रही हो।
"भैरव के पापा," उसने शुरू किया, "धनीराम सिंह। रघुवीर के सबसे पक्के दोस्त थे। दोनों एक ही अखाड़े में पसीना बहाते थे। एक ही चटाई पर सोते, एक ही लोटे से पानी पीते। धनीराम कहते थे — रघुवीर मेरा भाई है।"
गाँव के लोग और करीब आ गए। किसी ने खाँसा भी नहीं।
"फिर वो मुकाबला आया," बुढ़िया ने कहा, "जिसमें रघुवीर ने धनीराम को पछाड़ दिया। बड़ा मुकाबला था। पूरे इलाक़े के पहलवान आए थे। और रघुवीर ने धनीराम को चित कर दिया। सबने तालियाँ बजाईं। मैं भी खड़ी थी। मैं भी ताली बजा रही थी।"
उसकी आवाज़ रुक गई। उसने अपनी आँखें मलीं।
"उस रात धनीराम घर आया और बोलता ही नहीं था। बस बैठा रहा, आँगन में, आधी रात तक। मैंने खाना दिया, उसने छोड़ दिया। मैंने कहा — हार-जीत तो खेल में होती है। उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने भी उसे हराया हो।"
"फिर?" मेरी माँ ने धीरे से कहा।
"फिर सुबह वो अखाड़े में मिला," बुढ़िया ने कहा, "मिट्टी में पड़ा। उसके हाथ में शीशी थी। खाली शीशी। उसने खुद को ज़हर दे दिया था। मेरे हाथ में एक काग़ज़ छोड़ गया था, जिस पर लिखा था — 'रघुवीर, तूने मेरी जान नहीं ली। तूने मेरी इज़्ज़त ली। ये ज़हर तेरे हाथ का है।'"
मैंने पलटकर मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा सफ़ेद था।
"और भैरव?" मीरा की आवाज़ निकली, सूखी। "तब भैरव कितने साल का था?"
"आठ साल का," बुढ़िया ने कहा। "आठ साल का बच्चा अपने पापा को मिट्टी में पड़ा देख रहा था। उसने शीशी अपने हाथ में ली थी। उसने उसे सूँघा था। और उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा था — 'माँ, ये बदला मैं लूँगा।'"
अब बुढ़िया ने अपने पल्ले में हाथ डाला और एक पुरानी पोटली बाहर निकाली। वो पोटली जैसे ही खुली, उसमें से सोंठ और लौंग की महक आई — कोई पुरानी चीज़, बहुत पुरानी।
"ये रघुवीर की लिखाई है," उसने कहा। "धनीराम की मौत के दूसरे दिन रघुवीर मेरे घर आया था। वो रोया था। एक बड़ा पहलवान, आँगन में बैठकर रोया था। उसने कहा — 'कमला, मैंने ये नहीं चाहा था। मैंने तो बस कुश्ती लड़ी थी।' और उसने ये काग़ज़ मेरे हाथ में रख दिया और कहा — 'जिस दिन मेरा बेटा बड़ा हो, इसे उसके हाथ में देना।'"
बुढ़िया ने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मेरे हाथ काँप रहे थे। काग़ज़ पीला पड़ गया था, किनारों से फटा हुआ। मैंने उसे खोला।
लिखाई काँपती हुई थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ न रुका हो।
"अगर मैं न रहूँ," मैंने धीरे पढ़ा, "तो मेरा बेटा वीर भैरव को माफ़ कर दे। क्योंकि उसका गुनाह उसके पापा का गुनाह नहीं है। धनीराम मेरा भाई था। उसकी मौत का बोझ मेरे सीने पर है। और मैं चाहता हूँ कि जिस दिन ये बात खुले, उस दिन मेरा बेटा मिट्टी में खड़ा हो — ज़हर में नहीं।"
काग़ज़ मेरे हाथ में काँप रहा था। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, और मुझे लगा जैसे काग़ज़ के नीचे से कोई हाथ मेरा हाथ पकड़ रहा है।
मैं चुप हो गया।
बहुत देर चुप रहा। इतनी देर कि सुक्खी बुआ ने भी कुछ नहीं कहा।
फिर मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ ठंडा था, पर उसमें वो ज़ोर था जो मुझे सीधा कर देता है।
"तुम क्या करोगे?" उसने पूछा।
मैंने काग़ज़ मोड़ा। फिर मैंने उसे अपनी जेब में नहीं रखा — मैंने उसे अपनी मुट्ठी में रखा।
"मैं माफ़ नहीं करूँगा," मैंने कहा।
गाँव में सन्नाटा छा गया। बुढ़िया का सिर झुक गया।
"पर मैं उससे बदला भी नहीं लूँगा," मैंने कहा, और बुढ़िया का सिर उठ गया। "मैं उसकी कहानी सबको सुनाऊँगा। ग्यारह पहलवानों की मौत की कहानी। मेरे दोनों पापाओं की कहानी। और उस काग़ज़ की कहानी जिसमें एक आदमी ने अपने बेटे को माफ़ी लिखकर छोड़ी थी। मैं माफ़ी की माँग नहीं करूँगा। मैं बस सच को इतना बड़ा बना दूँगा कि वो सबके सामने खड़ा हो जाए। और फिर जो मिट्टी का हिसाब है — वो मिट्टी खुद लेगी।"
मेरी माँ उठीं। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा — वो हाथ जिसमें बीस साल की चक्की का बोझ था — और उनकी आँखें मेरी आँखों में डूब गईं।
"यही फर्क है मिट्टी और ज़हर में, बेटा," उन्होंने कहा। "मिट्टी सबको अपना बना लेती है। ज़हर सबको जला देता है। तूने आज मिट्टी चुनी।"
पीछे से रणवीर सिंह की आवाज़ आई। वो अपनी कुर्सी पर बैठे थे, और उनके दोनों हाथ कुर्सी की बाहों पर जमे हुए थे। बुढ़िया ने उनकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें एक पल के लिए झुक गईं।
"कमला," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार भर्राई। "तूने मुझे पच्चीस साल बाद ये बताया कि धनीराम ने खुद को मारा था। मैं इतने साल ये सोचता रहा कि मैंने उसे मार डाला।"
"मैं डर गई थी, रणवीर," बुढ़िया ने कहा। "मेरा बेटा मेरे ही घर में ज़हर बनाता था। मैं तुझसे क्या कहती?"
रणवीर सिंह ने अपना सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया — बुढ़िया की तरफ़।
"पकड़," उन्होंने कहा। "अब कोई डर नहीं। मेरा बेटा… मेरी बेटी ने उस ज़हर को पकड़ लिया है।"
बुढ़िया ने उनका हाथ पकड़ा, और जैसे ही पकड़ा, वो फिर रोई — पर इस बार धीरे, जैसे कोई बहुत रो चुका हो और अब सिर्फ़ आराम चाहता हो।
और तभी गुड़िया आगे आई।
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