Spirit of a Fighter – Chapter 160
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अब भी अपने पापा के पैरों के पास बैठी थी, और उसने अपने आँसू पोंछ लिए थे, पर उसकी आँखें अब भी भरी थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से मुस्कुराई — वो मुस्कान जो बिना शब्दों के बहुत कुछ कहती है।
मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसने पकड़ लिया।
हम सब सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। कालू काका आगे-आगे लालटेन लिए, और उनकी कुबड़ी पीठ सीढ़ियों के सामने सीधी दिख रही थी। मेरी माँ मेरे पीछे थीं, और गुड़िया उनका हाथ पकड़े हुई थी। सुक्खी बुआ सबसे पीछे, और उनकी साड़ी का पल्ला मिट्टी में घसीटता आ रहा था।
जब मैं सीढ़ी के आख़िरी मोड़ पर पहुँचा, तो मैंने एक बार पीछे देखा।
तहखाना खाली था। सिर्फ़ मिट्टी थी, और उस मिट्टी में गड्ढा — जहाँ से मैंने संदूक निकाला था। और उस गड्ढे के किनारे, छोटी-सी, वो हरी शीशी पड़ी थी जो मीरा ने अपने पास रखी थी। शायद उसने जान-बूझकर छोड़ दी। शायद वो भी अब उसी मिट्टी का हिस्सा बन गई थी।
बाहर निकलते ही हवा लगी। ताज़ी, ठंडी, और उसमें अखाड़े की गीली मिट्टी की गंध थी। मैंने गहरी साँस ली। मेरे सीने में जो पत्थर बैठा था, वो कुछ हल्का हुआ।
अखाड़े के आँगन में गाँव के लोग खड़े थे। कोई रो रहा था, कोई चुप था, कोई अपने बेटे का नाम लेकर आसमान की तरफ़ देख रहा था। मैंने सुना — किसी बुढ़िया ने कहा, "बलवंत, तेरा हिसाब आ गया, बेटा।" और वो बैठ गई, ज़मीन पर, और अपने घुटनों पर सिर रख लिया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। हमने कुछ नहीं कहा।
तभी सुक्खी बुआ की आवाज़ सबसे ऊपर उठी।
"अरे, वो देखो! गेट पर गाड़ी!"
मैंने सिर घुमाया।
अखाड़े के बड़े लोहे के गेट के बाहर, सड़क पर, एक लाल रंग की कार खड़ी थी। ऐसी गाड़ी उस गाँव में कभी नहीं आई थी — चमकदार, लंबी, और उस पर धूल की पतली परत जमी थी, जैसे वो बहुत दूर से आई हो।
कार का दरवाज़ा खुला।
उसमें से एक बुज़ुर्ग औरत उतरी। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद बाल, और कमर थोड़ी झुकी हुई। उसके हाथ में एक लकड़ी की छड़ी थी, जो ज़मीन पर टिकती हुई आ रही थी। वो धीरे चल रही थी, पर सीधे हमारी तरफ़।
और मेरी साँस रुक गई।
क्योंकि मैं उस औरत को पहचानता था। वो वही बुढ़िया थी जो हमारे घर आई थी। वही जिसने मेरी माँ को चाय में ज़हर दिया था। वही जिसके हाथों में वो धतूरे वाली चीज़ थी।
मैंने अपने आप को सीधा किया। मेरी मुट्ठी भींच गई।
वो गेट के अंदर आई। सुक्खी बुआ ने अपना पल्ला ऊपर कर लिया, जैसे कोई साँप सामने आ गया हो। गाँव के लोग पीछे हटे।
पर वो बुढ़िया किसी की तरफ़ नहीं देख रही थी। वो सीधे मेरी तरफ़ आ रही थी।
मैंने अपने पैर ज़मीन पर जमा लिए। मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने छुड़ा लिया।
वो मेरे सामने आकर रुकी। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, पर उनमें वो चमक नहीं थी जो भैरव की आँखों में थी। उनमें कुछ और था — थकान, या शायद शर्म।
"बेटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बूढ़ी और रूखी थी, "मैं भैरव की माँ हूँ।"
मेरे पीछे किसी ने साँस रोक ली। शायद मैंने ही रोकी थी।
"और मुझे तुमसे एक बात कहनी है," उसने कहा, और उसकी छड़ी ज़मीन पर एक बार टकराई, "जो तुम्हारे पापा ने मरते वक़्त कही थी।"
मैंने उसे देखा। मेरा गला सूख रहा था। मेरी आवाज़ निकली, पर वो फुसफुसाहट जैसी थी।
"कौन से पापा?"
वो एक पल चुप रही। फिर उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया और कहा, "दोनों के बारे में। पर पहले… मुझे बताओ, वो बात सच है जो अभी-अभी सबके मुँह से निकली? कि रघुवीर को कुएँ में बंद करके छोड़ दिया गया था?"
मैंने सिर हिलाया।
उसने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ हिले, जैसे कोई पुरानी दुआ पढ़ रही हो।
"तो फिर," उसने आँखें खोलकर कहा, "तुम्हें वो बात सुननी पड़ेगी जो मैंने बीस साल अपने सीने में दबाकर रखी है। और उसके बाद तुम जो चाहो, मुझे कोसना।"
मेरी माँ मेरे पास आईं और मेरे काँधे पर हाथ रखा। उनका हाथ काँप रहा था, पर उन्होंने कहा, "सुन लो, बेटा। सच कभी एक ही तरफ़ से नहीं आता।"
मैंने उस बुढ़िया की तरफ़ देखा। अखाड़े की मिट्टी उसके पैरों के नीचे थी, और वो उसमें धँस रही थी — जैसे मिट्टी भी उसे पहचानती हो, और उससे हिसाब माँग रही हो।
"बोलिए," मैंने कहा।
उसने अपनी छड़ी पर झुककर एक लंबी साँस ली। और तभी उसकी नज़र मेरे पीछे खड़ी मीरा पर पड़ी। उसके चेहरे पर पहली बार कुछ बदला — जैसे किसी पुराने दर्द ने उसकी आँखों में झाँका हो।
"ये बात," उसने कहा, "मैं तुम्हें अकेले में नहीं कहूँगी। क्योंकि जिसके बारे में ये बात है, वो तुम्हारे साथ खड़ी है।"
मैंने पलटकर देखा। मीरा मेरे ठीक पीछे थी, और उसका चेहरा सफ़ेद था, जैसे उसने कुछ सोच लिया हो जो मैंने अभी नहीं सोचा था।
बुढ़िया ने मीरा की तरफ़ देखकर धीरे से कहा, "मीरा बेटी, ये बात तुम्हारे पापा की है। और तुम्हारी माँ की।"
मीरा ने एक कदम पीछे रखा। उसका हाथ मेरे हाथ से छूट गया।
और उस बुढ़िया ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाकर, धीरे, बहुत धीरे, वो चार शब्द कहे जिन्होंने मेरे पैरों तले की मिट्टी ही खींच ली।
"रणवीर ने जो किया था… वो भी उसी मिट्टी की गलती थी।"
॥
वो चार शब्द हवा में लटके रहे, और मैंने अपनी मुट्ठी और कस ली।
"कौन-सी गलती?" मेरी आवाज़ खुद मुझे पराई लगी। "साफ़ बोलिए।"
बुढ़िया ने छड़ी पर और ज़ोर डाला। उसकी पीठ और झुक गई, जैसे बात कहने से पहले शरीर ही हार मान रहा हो।
"ये मैदान," उसने अपनी छड़ी मिट्टी पर टिकाई, "बीस साल पहले एक आदमी की जान लेने वाला था। और उस आदमी का नाम रघुवीर था।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"मेरा बेटा भैरव," बुढ़िया ने कहा, "उस रात यहाँ आया था — इसी मिट्टी में — और उसने रघुवीर को कुएँ के पास खींचकर लिटाया था। उसने मुझे खुद बताया था। बड़े गर्व से बताया था। कहा था — माँ, आज मैंने उस आदमी को मिट्टी में मिला दिया जिसने मेरे पापा को मारा।"
"और आपने?" मेरी आवाज़ कड़क हुई। "आपने क्या किया? आपने अपने बेटे को रोका नहीं?"
"मैंने रोका।" उसकी आवाज़ टूटी। "बहुत रोका। उस रात मैं यहाँ दौड़कर आई थी। मेरे पैरों में चप्पल भी नहीं थीं। पर जब मैं पहुँची, तो रघुवीर कुएँ में थे और भैरव कुएँ का ढक्कन उठाए खड़ा था। मैंने उसका हाथ पकड़ा। मैंने कहा — बेटा, ये गुनाह है। और उसने मुझे देखा। ऐसे देखा जैसे मैं उसकी माँ नहीं, कोई दुश्मन हूँ।"
बुढ़िया ने आँखें बंद कर लीं।
"उसने कहा — माँ, अगर तूने किसी को बताया, तो कल तेरी चाय में वही डालूँगा जो मैंने इन सबको दिया है। और मैं जानती थी वो ऐसा कर सकता है। मैंने अपने बेटे की आँखों में देखा था। वो पागल था। मैं चुप रह गई।"
मेरे पीछे गाँव के लोग खड़े थे। किसी ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ मेरी माँ की साँस सुनाई दे रही थी, धीमी और भारी।
फिर बुढ़िया ने अपनी छड़ी दूसरे हाथ में ली और धीरे-धीरे मेरे सामने झुकने लगी। मैं समझ नहीं पाया कि वो क्या कर रही है। फिर उसने अपनी छड़ी मिट्टी में गाड़ दी और दोनों हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़ी हो गई।
"बेटा," उसने कहा, "मैंने तुम्हारी माँ को ज़हर दिया। मैंने खुद उस चाय में डाला। मैं जानती हूँ कि इसका कोई बहाना नहीं हो सकता। पर सुन लो — मैंने ये अपने बेटे की जान बचाने के लिए किया था। उसने कहा था — अगर तूने नहीं किया, तो तेरी बारी आएगी। चाय में, खाने में, कहीं भी। वो मेरे ही घर में बैठा था। और मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, बेटा। मैंने अपने बेटे से डरना सीख लिया था।"
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