Spirit of a Fighter154 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 154

7 min read November 5, 2026

"तो सब आ गए," भैरव ने कहा। उसकी नज़र टिंकू पर, फिर बोला पर, फिर रामू पर पड़ी। "गाँव के सारे यतीम इकट्ठे हो गए।"

"यतीम तूने बनाए," रामू ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो डटा रहा। "मेरा भाई तेरे पानी से मरा।"

"मेरे पानी से नहीं," भैरव ने कहा। "उसकी कमज़ोरी से।"

"चुप हो जा!" ये आवाज़ मीरा की थी। वो मेरे पीछे से निकली और सामने आई। उसकी आँखें भैरव पर जमी थीं। "तूने मेरे पापा को भी वही पानी दिया। तेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है।"

भैरव ने मीरा को देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला। "मीरा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक थकान आई। "तू मेरी बेटी जैसी है। मैंने तुझे हमेशा बेटी ही माना है।"

"तूने मेरे पापा को व्हीलचेयर पर बैठाया," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने पहली बार सुनी। "और अब बेटी की बातें करता है?"

"मैंने तेरे पापा को मारा नहीं," भैरव ने कहा। "मैंने उन्हें छोड़ दिया था। उनकी हालत देखकर मुझे तरस आया था।"

"तरस?" कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो बीस साल से जमा थी। "तूने उन्हें तरस खाकर छोड़ा था? तो बता, कुएँ में रघुवीर को भूखा क्यों मारा? तरस खाकर?"

भैरव ने कालू काका को देखा। उसकी मुट्ठी चाबी पर कस गई।

"कालू," उसने कहा, "तू चुप रहता, तो आज भी ज़िंदा रहता।"

"मैं ज़िंदा हूँ," कालू काका ने कहा। "और तेरे सामने खड़ा हूँ।"

भैरव ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसके आदमी भी आगे बढ़े। मैंने अपने हाथ आगे किए, और मेरे पीछे से सब आगे आ गए — टिंकू, रामू, बोला, शंकर।

तहखाने में सात लोग खड़े थे, और भैरव के पाँच।

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे पीछे खड़े लोगों की तरफ़। उसकी आँखों में वो चीज़ फिर आई — डर।

"तुम सब मुझसे लड़ने आए हो?" उसने पूछा। "मेरे पास पुलिस है। मेरे पास पैसा है। मेरे पास ताकत है। तुम्हारे पास क्या है?"

"मिट्टी," मैंने कहा।

उसके चेहरे पर कुछ बदला।

"मिट्टी?" वो हँसा, पर हँसी फीकी थी। "तू अब भी वही बोलेगा?"

"मेरे पास मेरी माँ की दुआ है," मैंने कहा। "मेरे पास मेरे पापा की लिखी बातें हैं। मेरे पास ये सब लोग हैं जिनके घर तूने उजाड़े। और मेरे पास वो सच है जो तू बीस साल से छिपा रहा है। ये काफ़ी है?"

भैरव ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला, और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये ले," उसने कहा। "ये तेरे पापा का लिखा है। उन्होंने लिखा है कि रणवीर सिंह ने उन्हें ज़हर दिया था। ये सबूत है।"

मेरा हाथ रुक गया।

"क्या?" मैंने कहा।

"तेरे पापा रघुवीर ने खुद लिखा है," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो मिठास लौटी। "कि उन्हें रणवीर सिंह ने ज़हर दिया। मैं तो बस बीच में फँस गया। ये ले, पढ़।"

काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा। मैंने उसे नहीं लिया।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।

"अगर ये सच है," भैरव ने कहा, "तो तेरे पापा की मौत का ज़िम्मेदार रणवीर सिंह है। और तू उसकी बेटी से शादी करने की सोच रहा है। मज़ा आएगा ना?"

मेरा दिल धड़क रहा था। मेरे हाथ ठंडे हो गए थे।

"वीर," मीरा ने धीरे से कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें साफ़ थीं। उसमें शक नहीं था — उसमें भरोसा था।

"भैरव," मैंने कहा, "अगर ये काग़ज़ सच होता, तो तू इसे बीस साल से अपने पास क्यों रखता? तू इसे पहले क्यों नहीं दिखाया? तू इसे अभी क्यों दिखा रहा है?"

भैरव रुका।

"क्योंकि तू डर गया है," मैंने कहा। "तू अभी, इसी वक़्त डर गया है। और डरा हुआ आदमी आख़िरी हथकंडा चलाता है।"

भैरव का चेहरा बदला। उसने काग़ज़ मुट्ठी में कसा, और फिर उसने उसे ज़मीन पर पटक दिया।

"तू समझता है," उसने कहा, "कि तू मुझे हरा सकता है?"

"मैं नहीं," मैंने कहा। "हम।"

और तभी बाहर से आवाज़ आई। बहुत सारी आवाज़ें। लोगों की, जो चिल्ला रहे थे। और उनमें एक आवाज़ सबसे ऊँची थी — सुक्खी बुआ की।

"अरे भैरव! तेरी माँ तुझे ढूँढ रही है! बाहर आ!"

भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"मेरी माँ?" उसने कहा। "मेरी माँ मर चुकी है।"

"नहीं मरी," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब एक अलग ही बात थी। "वो ज़िंदा है। और वो तेरा इंतज़ार कर रही है। बाहर। सबके सामने।"

भैरव ने एक कदम पीछे हटाया। उसका हाथ चाबी पर से हट गया।

तभी मीरा ने आगे बढ़कर कहा, "तू ये सब अकेले नहीं कर सकता। तेरे पीछे कोई था। कौन था?"

भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

"तेरे पापा," मीरा ने कहा। "तेरे पापा की मौत का बदला। तू अकेले नहीं था। तेरे साथ कौन था?"

भैरव ने कोई जवाब नहीं दिया। पर उसकी आँखें कुछ कह रही थीं।

और तभी ऊपर से फिर आवाज़ आई। इस बार साफ़ शब्दों में, और वो आवाज़ भैरव की माँ की थी।

"भवानी! बेटा! बाहर आ! मैं तुझसे कुछ कहना है!"

भैरव ने ऊपर देखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने किसी के चेहरे पर नहीं देखा था — एक बच्चे का भाव। डरा हुआ, खोया हुआ, अकेला।

"माँ?" उसने धीरे से कहा।

और फिर उसने अपनी चाबी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। उसका हाथ काँप रहा था।

"ये ले," उसने कहा। "मैं सब बताऊँगा। पर पहले माँ से मिलना है।"

मैंने चाबी नहीं ली।

"पहले ये बता," मैंने कहा। "तेरे पापा की मौत का बदला। तू अकेले नहीं था। तेरे साथ और कौन था?"

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था — या शायद लालटेन का उजाला। उसने एक लंबी साँस ली।

"हरनाम," उसने कहा। "हरनाम मेरे साथ था। उसने ज़हर बनाया। मैंने पिलाया। दोनों साथ थे।"

हरनाम ने संदूक के पीछे से अपना सिर उठाया। उसका चेहरा गीला था।

"हाँ," उसने कहा। "मैं था। पर मैंने सिर्फ़ पहले साल में किया था। बाद में मैंने मना कर दिया था। भैरव ने तब मेरे बेटे को ज़हर दिया।"

भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। "तेरे बेटे को मैंने नहीं, तूने मारा। तू जानता था कि मैं उसे क्या दे रहा हूँ।"

"मैंने तुझे रोका था!" हरनाम चिल्लाया। उसकी आवाज़ तहखाने में गूँजी। "मैंने कहा था, मेरे बेटे को मत छू! तूने सुना नहीं।"

भैरव चुप हो गया।

मीरा ने आगे कदम बढ़ाया। "तो तुम दोनों ने मिलकर बीस साल तक पहलवानों को मारा। और अब तुम एक-दूसरे को दोष दे रहे हो?"

दोनों चुप हो गए।

"ये काग़ज़," मीरा ने कहा, और उसने ज़मीन से वो काग़ज़ उठाया जो भैरव ने फेंका था। "ये रघुवीर का लिखा नहीं है। ये तेरे हाथ से लिखा है। मैं तेरी लिखाई पहचानती हूँ। तूने ये काग़ज़ अभी बनाया है।"

उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने देखा। स्याही अभी ताज़ी थी — उँगली लगाने पर पोंछा लग जाता।

"तू जाल बिछा रहा था," मीरा ने कहा। "तू चाहता था कि वीर को शक हो जाए। कि वो मेरे पापा से लड़ पड़े। ताकि हम दोनों टूट जाएँ।"

भैरव का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।

"तुझे सब पता है," उसने कहा। "तो अब क्या करेगी?"

"जो तूने कभी नहीं किया," मीरा ने कहा। "सच बोलूँगी।"

और तभी ऊपर से फिर आवाज़ आई। इस बार सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं थी। बहुत सारे लोग थे, और उनके कदमों की आवाज़ सींकिया से नीचे आ रही थी।

भैरव ने ऊपर देखा। उसके चार आदमी पीछे हट गए।

"भवानी!" वो आवाज़ फिर आई, और अब वो बहुत करीब थी। "नीचे आ रही हूँ! तुझसे मिलने!"

भैरव ने एक कदम पीछे हटाया। फिर दूसरा।

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