Spirit of a Fighter – Chapter 153
मेरा गला भर आया। मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसके हाथ में मिट्टी लगी थी — सूखी, पुरानी, जैसे उसने रात भर कोई चीज़ खोदी हो।
"तू क्या करेगा?" मैंने पूछा।
"जो तू कहेगा," बोला ने कहा। "मैं पागल हूँ। पागल को कोई शक नहीं करता। मैं दरवाज़े पर खड़ा रहूँगा, और अगर भैरव का कोई आया, तो मैं ऐसा चिल्लाऊँगा कि पूरा गाँव जाग जाएगा।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "बोला, तू पागल नहीं है। तू सबसे समझदार है।"
वो हँसा। "ये मेरी माँ को बता देना। वो भी मुझे पागल कहती है।"
फिर हम तीन और घरों में गए। वहाँ से दो और नौजवान आए — एक बारह साल का लड़का, जिसका भाई दो साल पहले मरा था, और एक बुढ़िया का बेटा, जो अब गाँव में मज़दूरी करता है।
जब हम नीम के पेड़ के पास पहुँचे, तो सात लोग थे। मैं, मीरा, टिंकू, कालू काका, रामू, बोला, और बारह साल का लड़का जिसका नाम शंकर था।
कालू काका ने सबको देखा। उनकी आँखें भर आईं, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और बोले, "रास्ता याद है?"
"याद है," मैंने कहा।
"तो चलो।"
नीम के पेड़ के नीचे वो पत्थर था जिसे कालू काका ने हटाया था। उसके नीचे रास्ता था। मैंने पहले लालटेन नीचे भेजा, फिर उतरा।
रास्ता वही था — सींकिया, ठंडी, और हवा में वो गंध जो अब मुझे पहचानी हुई थी। मिट्टी की गंध, पर उसमें कुछ और मिला हुआ — जैसे बहुत पुरानी किताब के पन्नों की गंध, जो बंद अलमारी में पड़ी रह गई हो।
तहखाने में पहुँचकर मैंने लालटेन ऊपर उठाया। दीवारें वही थीं, संदूक वहीं था, और उसके पीछे दीवार पर रघुवीर की लिखाई — ग्यारह नाम, और उनके नीचे जगदीश का नाम।
कालू काका ने सबको इशारा किया। "जल्दी करो। भैरव दस बजे आएगा, और वो घड़ी देखकर नहीं आता — वो अपने आदमियों की आँखों से देखता है।"
मैंने संदूक के पास जाकर झुककर देखा। ताला वही था — जंग लगा, बड़ा, और उस पर एक निशान खुदा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। एक त्रिशूल।
"ये निशान?" मीरा ने पूछा।
कालू काका ने देखा और उनका चेहरा कठोर हो गया। "ये रणवीर सिंह का निशान है। वो अपनी हर चीज़ पर ये बनाते थे — जैसे कह रहे हों, ये मेरा है, कोई छुएगा तो देखेगा।"
"तो संदूक उनका है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे कोई पहेली का टुकड़ा मिल गया हो।
"हाँ," कालू काका ने कहा। "और भैरव ने उनका संदूक अपने तहखाने में रखा है। सोचो — कितना बड़ा गुस्सा होगा उसमें।"
टिंकू ने संदूक के ताले को छुआ। "चाबी?"
"आएगी," मैंने कहा। "भैरव खुद लाएगा।"
तभी बाहर से आवाज़ आई। पहले कदमों की धीमी आवाज़, फिर लालटेन की रोशनी जो सींकिया से नीचे फिसलकर दीवारों पर नाचने लगी।
मैंने सबको इशारा किया। सब संदूक के पीछे और दीवार के कोनों में दब गए। मैंने अपना हाथ मीरा की कलाई पर रखा और उसे अपने साथ खींच लिया।
भैरव नीचे उतरा। उसके पीछे चार आदमी थे, सबके हाथ में लाठियाँ। वो वहीं रुका, लालटेन ऊपर उठाई, और तहखाने में रोशनी घुमाई।
मेरी साँस रुक गई।
"हरनाम," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो ज़हर से पहले आती है। "मुझे पता है तू यहाँ है। तेरी साँस सुन रहा हूँ।"
कोई जवाब नहीं आया।
"हरनाम," भैरव ने दोहराया। "तू जानता है मैं झूठ नहीं बोलता। तू बाहर आ, और मैं तेरा बेटा तेरे पास छोड़ दूँगा।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। हरनाम का बेटा? वो तो मर चुका था — हरनाम ने खुद कहा था। या भैरव झूठ बोल रहा था, या हरनाम ने मुझसे झूठ कहा था।
तभी संदूक के पीछे से एक धीमी आवाज़ आई। हरनाम।
"भैरव," वो बोला। "तू मेरे बेटे को ज़िंदा नहीं ला सकता। तूने उसे भी वही पानी पिलाया था।"
भैरव हँसा। वो हँसी तहखाने की दीवारों से टकराकर मेरे सीने में उतरी।
"हरनाम, तेरा बेटा बीमार था। उसे इलाज की ज़रूरत थी। मैंने उसे ताकत दी थी। अगर वो संभल नहीं पाया, तो इसमें मेरा क्या?"
"तूने उसे तीन खुराक दी थीं," हरनाम की आवाज़ काँप रही थी। "तीसरे के बाद वो उठ ही नहीं पाया।"
"तो पहली नहीं देनी थी," भैरव ने ठंडे मुँह से कहा। "अब बातें बहुत हो गईं। मुझे काग़ज़ दे।"
"नहीं दूँगा।"
"तो मैं ले लूँगा," भैरव ने कहा, और वो आगे बढ़ा।
उसने अपनी कमर से चाबी निकाली। चाबी की आवाज़ तहखाने में गूँजी, और मेरी साँस फिर रुक गई।
मीरा का हाथ मेरे हाथ पर आया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत थी।
मैंने उसके कान के पास झुककर कहा, धीरे से, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके, "अगर कुछ हो जाए, तो तुम भाग जाना।"
उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसने मेरा हाथ पकड़कर कस लिया। और फिर बोली, "मैं भागने के लिए नहीं आई।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था। पर डर से नहीं।
भैरव संदूक के पास पहुँचा। उसने चाबी ताले में डाली। धातु की आवाज़ आई — चट्।
और तभी अंधेरे से एक आवाज़ आई। धीमी, पर हर शब्द साफ़।
"भवानी सिंह।"
भैरव का हाथ चाबी पर ही रुक गया।
कालू काका दीवार के सहारे से हटकर सामने आए। उनकी लाठी ज़मीन पर ज़ोर से टिकी, और वो आवाज़ पूरे तहखाने में गूँजी।
"बीस साल पहले तूने जो किया था, उसका हिसाब आज होगा।"
भैरव पलटा। उसका चेहरा लालटेन की रोशनी में दिखा — और वो चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। सफ़ेद, दर्द से कसा हुआ, जैसे किसी ने उसे अंदर से चीर दिया हो।
"कालू," उसने कहा। उसकी आवाज़ पहली बार तेज़ थी। "तू अब भी ज़िंदा है?"
"मैं मर नहीं सकता," कालू काका ने कहा। "जब तक तेरा हिसाब बाकी है, मैं मर नहीं सकता।"
भैरव के आदमी हिले, पर भैरव ने हाथ उठाकर उन्हें रोका। उसने कालू काका को देखा, और फिर उसकी आवाज़ में वो मिठास लौटी — पर अब वो मिठास नकली थी, चीनी की तरह जो ज़ुबान पर रेत बन जाए।
"कालू," उसने कहा, "तू मुझे भवानी क्यों बुलाता है? मेरा नाम भैरव है।"
"तेरा नाम वो नहीं जो तूने खुद रखा," कालू काका ने कहा। "तेरा नाम वो है जो तेरे बाप ने दिया था। और तेरे बाप ने तुझे भवानी कहा था — क्योंकि तू उनकी ताकत था। और तूने उसी बाप की मौत का बदला लेने के लिए रणवीर सिंह को ज़हर दिया।"
तहखाने में सन्नाटा छा गया। भैरव का हाथ चाबी पर था, पर वो जम गया था।
"तू झूठ बोल रहा है," भैरव ने धीरे से कहा।
"मैं वहीं था," कालू काका ने कहा। "उस रात। जब तूने रघुवीर को कुएँ में बंद किया था। मैंने तेरी आवाज़ सुनी थी। तू कह रहा था — 'भैया, तुमने मेरे बाप को मारा। अब मैं तुम्हारे बेटे को मारूंगा।'"
मेरे अंदर कुछ फट गया। जैसे किसी ने मेरे सीने में एक गाँठ खोल दी हो जो बचपन से बंधी थी।
भैरव ने कालू काका की तरफ़ देखा। फिर उसकी नज़र मेरी तरफ़ घूमी — और मैं जानता था कि वो मुझे देख रहा है, संदूक के पीछे, अंधेरे में।
"वीर सिंह," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ अब मिठी नहीं थी। "तू अंदर है। मैं तेरी साँस सुन रहा हूँ।"
मैं संदूक के पीछे से निकला। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, और मेरे हाथ नहीं काँप रहे थे। ये मैंने खुद को बताया।
"हाँ," मैंने कहा। "मैं हूँ।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — डर। नहीं, डर नहीं था। कुछ और था। जैसे कोई चीज़ अंदर से टूट रही हो और वो उसे रोक नहीं पा रहा।
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